दादागिरी बनाम धंधागिरी

स्रोत: द्वारा आलोक पुराणिक: राष्ट्रीय सहारा

भारत ने अमेरिका की परवाह न करते हुए रूस के साथ तीन अरब डॉलर का डील फाइनल कर दिया, जिसके तहत परमाणु क्षमता से संपन्न पनडुब्बी भारत को दी जाएगी। रूस के इस तरह के डील का अमेरिका लगातार विरोध करता रहा है। इस डील की टाइमिंग अहम है, कुछ ही दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि भारत से आने वाले उत्पादों में आयात छूट नहीं दी जाएगी। इस आयात छूट भारत को करीब 1300 करोड़ रुपये की रियायत मिलती थी।

ट्रंप की रियायत वापसी की घोषणा के कुछ ही दिनों में भारत ने रूस के साथ एक डील करके यह संदेश दिया है कि एक हद के बाद उसे अमेरिका की परवाह नहीं है। वह अपने हिसाब से कारोबारी डील करता रहेगा। भारत ने इसी तरह के डील के ईरान में किए हैं, खास तौर पर चाबहार बंदरगाह को लेकर जो डील भारत ने ईरान के साथ किए हैं, वह अमेरिका को लगभग यह बताकर किए हैं कि आपकी परवाह हमें एक हद तक ही है, क्योंकि न अब दुनिया पहले वाली है, न अमेरिका पहले वाला है और न भारत पहले वाला है।

डोनाल्ड ट्रंप की शिकायत लगातार यह रहती है कि भारत तो अपने यहां अमेरिकी साज-सामान को आसानी से नहीं आने देता और अमेरिका से आने वाले आइटमों पर खास तौर पर खासा कर ठोकता है। इससे अमेरिकन कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है। खास तौर पर दिल में डाले जाने वाले स्टेंट की कीमतों पर बंदिश लगाने के मोदी सरकार के फैसले से ट्रंप खासे नाराज दिखते हैं। बहुत पहले ट्रंप ने इस बात की भी शिकायत की थी कि अमेरिकन मोटरसाइकिल हार्ले डेविडसन पर भारत ने बहुत कर लगा दिया है। बाद में भारत ने कर में कटौती की थी। पर ट्रंप फिर भी संतुष्ट नहीं हुए थे।

इससे पहले तमाम कार्ड कंपनियों ने भी अमेरिका से शिकायत की थी कि भारत का रु पे कार्ड कहीं-न-कहीं अमेरिका की कार्ड कंपनियों के कारोबार को भारत में प्रभावित कर रहा है। यानी अमेरिका के कारोबारी हित प्रभावित हो रहे हैं, तो वहां की कंपनियों ने लगातार ट्रंप को सक्रिय किया है कि वह भारत को संदेश दें कि भारत के निर्यात अमेरिका में लगातार महंगे करके ट्रंप भारत को दंडित करने के मूड में हैं। पर इन सारे मसलों को एक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है।

ट्रंप कभी तो विश्व के दादा के तौर पर बरताव करना चाहते हैं, दादा के तौर पर बरताव करने के लिए सिर्फ धमकाना काफी नहीं होता। कई बार कई जगह छूट देनी होती है। छूट देकर तमाम देशों, संस्थानों में एक सॉफ्ट कार्नर पैदा करना होता है। चीन इस काम को बहुत तेजी से कर रहा है। दुनिया की निगाह में यह बात कम आ रही है कि चीन आर्थिक तौर पर मदद करके तमाम देशों को अपने पक्ष में कर रहा है। इसे मोटे तौर ‘‘आर्थिक राजनय’ की संज्ञा दी जा सकती है, जिसमें अपना कुछ घाटा करके भी राजनीतिक हित, सामरिक हित, रणनीतिक हित सुनिश्चित किए जाते हैं।

चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है-सीपैक यानी ‘‘चाइना पाक इकोनॉमिक कॉरिडोर’ में। इसके जरिये पाकिस्तान को लगभग चीनी कब्जे में लाने की योजना बन गई है। चीन पाकिस्तान को कई तरह की छूट देता है, आर्थिक तौर पर घाटा सहता है पर विश्व में प्रभुत्व रखने की इच्छा की पूर्ति बिना आर्थिक घाटा सहे नहीं हो सकती। चीन ने 2017 में ही करीब 77 अरब डॉलर की नई परियोजनाएं अफ्रीका में ली हैं, यह रकम कितनी बड़ी इस बात का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि समूची पाक अर्थव्यवस्था का साइज 304.97 अरब डॉलर का है।

मिकिन्सी सलाहकार फर्म के आंकड़ों के मुताबिक 2012 के बाद अफ्रीकन देशों को दिए गए कर्ज तीन गुना हो लिये हैं। मिकिन्सी के मुताबिक 2025 तक अफ्रीका में चीनी फर्मो की आय 440 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगी, यानी अभी की पाक अर्थव्यवस्था के साइज से बड़ा रेवेन्यू चीनी फम्रे अफ्रीका में खड़ा कर चुकी होंगी। चीन को विश्व में शक्ति के तौर पर रेखांकित होना है, इसके लिए वह श्रीलंका से लेकर मलयेशिया तक अपनी रकम को लगभग झोंकता है। यह तो होता है विश्व पर प्रभुत्व हासिल करने के लिए दादागिरी वाला रुख। एक होता है-कारोबारी रुख-जिसमें कारोबारी यह देखता है कि मैंने इसे इतने का मुनाफा कराया, तो बदले में इसने इतने रु पये का मुनाफा क्यों नहीं कराया?

यह कारोबारी रु ख भी अपनी जगह सही है, पर कारोबारी फिर दादागिरी का ख्वाब नहीं देखना चाहिए। दादागिरी की ताकत कुछ अतिरिक्त खर्च करके आती है,यह बात चीन समझने लगा है। पर अमेरिका के कारोबारी ट्रंप को यह बात समझ में नहीं आती। अमेरिका चीन की बढ़ती ताकत से परेशान है, पर उसके मुकाबले के लिए अमेरिका को जो रणनीतिक घेराबंदी करनी चाहिए, उसमें ट्रंप के कारोबारी दृष्टिकोण आड़े आ जाते हैं और भारत विरोधी या किसी और देश के विरोध में ट्रंप ऐसी घोषणाएं कर जाते हैं, जिनका ठोस महत्त्व कम होता है पर बयानबाजी के हिसाब से बहुत ज्यादा महत्त्व होता है।

चीन का नजरिया साफ है-छूट देकर, जैसे भी हो, हमें किसी देश पर वर्चस्व स्थापित करना है। अमेरिका का मामला इसमें भ्रामक हो गया है-उसे दादागिरी भी दिखानी है और कारोबारी डील भी करने हैं। ये दोनों चीजें साधना बहुत मुश्किल है। इसलिए अमेरिका का दबदबा न तो बतौर दादा कायम रह पाएगा और न ही बतौर कारोबारी कायम रह पाएगा। आर्थिक ताकत के मामले में अब भारत तीस-चालीस साल पुराना भारत नहीं है, जो आर्थिक तौर पर कमजोर हो। इस बात को अमेरिका को भी समझना चाहिए और रूस इस बात को बखूबी समझता है इसलिए पाकिस्तान के प्रति एक हद तक रु झान दिखाने के बाद भी रूस समग्र तौर पर भारतीय हितों के खिलाफ काम करता हुआ नहीं दिखता।

ट्रंप को यह बात समझनी होगी कि किस अनुपात में दादागिरी करनी है और किस अनुपात में कारोबार करना है? तमाम अमेरिकन कंपनियों को भारत में ग्राहकों की तलाश है। ये कंपनियां भारत को नाराज नहीं कर सकतीं। गूगल, माइक्रोसाफ्ट, फेसबुक, ट्विटर को भारत से खासे ग्राहक और मुनाफे कमाने हैं, यह बात ये कंपनियां जानती हैं। पर ट्रंप दादागिरी के मूड में इन बातों को भूल जाते हैं। दादागिरी और कारोबार आम तौर पर साथ-साथ नहीं चलते। भारत अमेरिका का अहम कारोबारी सहयोगी है। रणनीतिक सहयोगी है। ट्रंप को यह बात समझनी होगी। इस बारे में ट्रंप चीन से सबक लें तो बेहतर कि दुनिया भर में प्रभुत्व मुफ्त में नहीं आता।

 

 

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