विलयन सही दिशा में

स्रोत: द्वारा अनिल उपाध्याय: राष्ट्रीय सहारा

सरकारी बैंकों का विलय का मुद्दा ऐसा ही है मानों इक्कीस साल से पहले किसी पुरुष की शादी की वैधता। जी हां, लगभग इक्कीस वर्ष पूर्व जब नरसिम्हन कमेटी की रिपोर्ट, जिसे नरसिम्हन कमिटी रिपोर्ट 2 कहा जाता है, आयी थी तो किसी को यह अनुमान नहीं था कि इसके क्रियान्वयन में 20-21साल लग जायेंगे। सिर्फ र्चचा और र्चचा ही होती रही। कई सौ करोड़ रुपये तो इस विषय पर मीटिंगों पर ही खर्च किये गए होंगे। मगर नतीजा सिफर ही रहा।

हां, मगर नरेन्द्र मोदी सरकार ने इस दिशा में अवश्य ही ठोस कदम उठाये और इस वित्त वर्ष के आरम्भ में हम एक बड़े मर्जर को देख रहे हैं। विजया बैंक और देना बैंक ने अपने अस्तित्व को समाप्त करते हुए बैंक ऑफ़ बड़ौदा में खुद को अमलगमेट किया है-मर्ज किया है-अपना विलयन किया है। कानूनी भाषा में मर्जर को अमलगमेशन कहा जाता है। मोदी सरकार जब सत्ता में आयी तो बैंकों की सेहत में सुधार की एक योजना से शुरुआत की। इस नाम रखा गया इंद्रधनुष। मगर इस इंद्रधनुष में सिर्फ लाल रंग ही था-घाटे का द्योतक।

इस योजना हेतु पुणो में करोड़ों रुपये खर्च कर महासम्मेलन हुआ। मगर जब बैंकों की आलमारियां खुलीं तो एक-एक कंकाल निकलने लगे। नीरव मोदी जैसे भूकंपकीय फ्रॉड ने इस आग में घी का काम किया। पंजाब नेशनल बैंक जैसा मजबूत बैंक घुटनों पर आ गया। बैंकिंग चरमरा गयी। फिर वही हुआ जिसको होना था। सरकार ने इंद्रधनुष छोड़ धनुष बाण अपने हाथ में ले लिया। उसको मौका मिल गया उस लंबित सुधार को लागू करने का, जिसकी र्चचा से ही बैंकों की मजबूत यूनियनें खड़गहस्त हो जाती थीं और मर्जर नहीं हो पाता था। पर इस बार यह ऐसे हुआ मानों घर में कोई मरणासन्न हो और लंबित विवाह संपन्न हो जाए।

वर्षो से बैंकों के विलयन को एक राजनैतिक मुद्दा बना कर रखा गया है। सरकार के पास विभिन्न सरकारी उपक्रमों के रूप में वह ऐसे चरागाह हैं, जहां वह स्वतंत्रता से विचरण करती है, नियुक्तियां करती है, ट्रांसफर करती है और बैंकों के मामले में तो आरोप है कि वह कर्ज देने में अपने प्रभाव का इस्तेमाल भी करती है। इन सब कारणों के चलते सरकार अपने नियंतण्र को कम नहीं करना चाहती है। हालांकि मर्जर के बाद भी सरकार का बैंकों पर नियंतण्रकम नहीं हो रहा है मगर उनकी संख्या में कमी सरकार और यूनियन पदाधिकारियों की प्रभुता को तो आंच पहुंचाती ही है जबकि बैंकों के निदेशक मंडलों में कर्मचारी निदेशकों की नियुक्ति का भी प्रावधान होता है।

इन सब बातों के चलते बैंकों के मर्जर में नाहक देरी होती रही। मगर बढ़ते हुए एनपीए ने उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया। दूसरा कारण बासेल के नियमों का अनुपालन भी रहा जिसके अनुसार बैंकों को जोखिम प्रबंधन हेतु पूंजी पर्याप्तता के कड़े नियमों का पालन करना होता है। इन नियमों के चलते बाजार से पूंजी सिर्फ वही ले सकते थे, जहां सरकार की पूँजी इक्यावन प्रतिशत से कम न हो जाए। इसलिए भी बैंकों का विलयन आवश्यक हो गया था। इस प्रकार कई तरह के सामंजस्यों के चलते बैंकों के परिचालन में दक्षता एवं इस कारण आय में वृद्धि होती ही है।

आप सोच के देखिये की आसपास दो मिठाई की दुकानें हों जो लगभग एक जैसी मिठाई और एक जैसे दाम पर ही बेचती हों। आपस में स्पर्धा भी रखती हों और मार्केटिंग पर खर्च भी करती हों। मगर इन दोनों दुकानों का मालिक एक हो तो यह बात हास्यास्पद ही लगेगी, यही दशा आज सरकारी बैंकों की है वह आपस में स्पर्धा करते हैं और उनका मालिक एक ही है-भारत सरकार।

विशेषज्ञों का विचार है कि इस संदर्भ में पहली गलती 1969 में हुई थी, जब 14 प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। उस समय उन बैंकों को आपस में बड़ी आसानी से मिलाया जा सकता था। दूसरी बार यही गलती 1980 में दोहराई गयी जब 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। यहां यह बात विशेष रूप से उल्लेख करने वाली है कि 1956 जब एलआईसी का गठन हुआ था तो लगभग 245 निजी बीमा कंपनियों को मर्ज किया गया था। मगर बैंकों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। अब जो हुआ और जैसी उम्मीद है कि भविष्य में होगा, वह इस बात पर निर्भर करेगा कि लोक सभा के चुनावों के बाद किस प्रकार के समीकरण बनते हैं।

आज तकनीक ने बैंकिंग परिदृश्य बदल कर रख दिया है। राष्ट्रीयकरण के मुख्य उद्देश्य आम जनता तक बैंकिंग को पहुंचाना था, परंतु इस उद्देश्य में सरकारी बैंक विफल रहे जब तक कि जनधन खातों का एक आंदोलन के रूप में जुड़ना न हो पाया। यह अकाउंट ही अपने मकसद में विफल रहते अगर उनको मोबाइल क्रांति से न जोड़ा जाता। यह दो नई तकनीक-आधारित परिवर्तन ही आम जनता को बैंक तक लाया है, राष्ट्रीयकरण से कुछ नहीं हुआ। अब छोटे-छोटे ऋण आसानी से फिनटेक कंपनियां ही पहुंचा रही हैं, जिनकी संख्या हज़ारों में हैं।

छोटे-छोटे भुगतानों के लिए पोस्टपेड स्कीम बाजार में आ चुकी हैं, जिसे एक प्रकार से क्रेडिट कार्ड का सरलतम अवतार कहा जा सकता है। इसके लिए कोई फॉर्म नहीं भरना होता। यह सब संभव हो रहा है डाटा से। ऐसे वातावरण में बैंकों का आपस में विलय होना उतना जोखिम भरा भी नहीं है। एक ही सॉफ्टवेयर प्लेटफार्म पर काम कर रहे बैंकों का आपस में विलय तो बहुत ही सुगम है। बैंक कर्मचारियों की पगार एक सी हैं। काम के चैलेंज एक सामान है। आज बैंकों का मर्जर सिर्फ उनके नाम के बोर्ड बदलना मात्र ही है। रोजगार की दृष्टि से ताज़ा विलयित हुए देना बैंक-विजया बैंक और बैंक ऑफ़ बड़ौदा के मर्जर में कोई वीआरएस नहीं दी गयी; बल्कि भर्ती के लिए प्रोसेस शुरू किये जाने की सुगबुगाहट है।

यह राजनैतिक दृष्टि से भी उचित है और भविष्य में होने वाले मर्जर में कोई अड़चन न आये इस लिहाजन भी जायज है। इसके पहले स्टेट बैंक का अपने सहायक बैंकों को अपने में मिलाने का काम शांतिपूर्वक सम्पन्न हो गया। आज देश में तरह-तरह के नए-नए बैंक आ गए हैं, कोई पेमेंट बैंक है- कोई स्माल फाइनेंस बैंक है। वॉलेट कंपनियां तेजी से डिजिटल क्रांति को ला रही हैं। आज का भारत विकासशील से विकसित होता हुआ भारत है इसकी जरूरतें उसी मुताबिक पहले से अलग हैं। आज उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियां फाइनेंस कंपनियों की सुविधा अपने स्टोर में देती हैं। बढ़ते ढांचागत विकास के लिए एक तरफ बड़े और बहुत बड़े टिकट साइज को संभालने वाले बैंक चाहिए। दूसरी तरफ वित्तीय समावेशन के लिए तकनीकी दृष्टि से मजबूत फिनटेक वित्तीय संस्थान। आगे जब रुपये के संपूर्ण परिवर्तन का विचार बने तो उस प्रवाह में छोटे बैंक कहीं बह न जाएं;इसलिए भी छह-सात बड़े बैंक बहुत आवश्यक हैं।