आरक्षण पर नया दांव

स्रोत: प्रेम कुमार मणि: राष्ट्रीय सहारा

भारतीय समाज में जाति ,जातिवाद और उसके उन्मूलन के प्रश्न सदियों से सामाजिक दार्शनिकों के समक्ष चुनौती बन कर रहे हैं। आज़ादी के बाद काका कालेलकर की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग बना और उसने एक विवादित रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी। बहुत बाद में 1978 में जनता पार्टी सरकार ने एक नए राष्ट्रीय आयोग का गठन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री वीपी मंडल की अध्यक्षता में किया, जिसने 1981 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। इसकी सिफारिशों के मुख्य हिस्से जिसमें सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों अर्थात ओबीसी केलिए 27 फीसद आरक्षण की व्यवस्था थी, को 1990 में जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लागू करने की घोषणा की।

आरक्षण विवाद ने राजनीति के चाल, चरित्र और चेहरे को पूरी तरह बदल दिया। उत्तर प्रदेश और बिहार में सामाजिक न्याय-केंद्रित एक नयी राजनीति विकसित हुई, जिसे कुछ लोगों ने जाति-केंद्रित राजनीति भी कहा। हमारा जाति आधारित भारतीय समाज मुख्यत: चार हिस्सों में विभाजित है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के दो अलग-अलग हिस्से हैं।अन्य पिछड़े वर्गों का एक हिस्सा है और इन तीनों से जो अलग हैं, उन्हें सामान्य वर्ग कहा जाता है। इसी सामान्य वर्ग के एक हिस्से से ओबीसी आरक्षण के प्रति विरोध उभरे थे।

सामान्य वर्ग भारतीय समाज का वह हिस्सा है जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा नहीं है। इसीलिए इस तबके का कार्यपालिका और न्यायपालिका में दबदबा है। पिछड़े वर्ग के कुछ लोग आर्थिक रूप से तो संपन्न हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति ठीक नहीं है। इन्हें इस वर्ग में रखकर इन्हें विशेष अवसर देने की कोशिश की गई है। लेकिन आर्थिक सम्पन्नता पिछड़े वर्ग के एक बहुत ही छोटे हिस्से में है और सरकार यदि नया आयोग बनाकर इन जाति समूहों या व्यक्तियों को आरक्षण से वंचित करना चाहती है, तब शायद ही इसका कोई विरोध होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर का जो प्रावधान किया है, वह व्यक्ति तौर पर सम्पन्न लोगों को आरक्षण से मुक्त रखने के लिए ही। इसे प्राय: स्वीकार लिया गया है। लेकिन सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों के आरक्षण की जो बात उठी है, उसका रूपाकार अस्पष्ट है। क्या उनका आरक्षण पिछड़े तबकों के लिए तय 27 फीसद में ही होगा या अलग से उनका कोटा होगा? राष्ट्रीय स्तर पर अब भी 50 फीसद सीटें अनारक्षित हैं। इन तमाम सीटों में आधे यानी 25 फीसद आर्थिक तौर पर पिछड़े और भूमिहीन-रोजगारहीन अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित कर दिया जाय तो सहमति बन सकती है। लेकिन ओबीसी के लिए तय आरक्षण में किसी को भागीदारी देने कि बात होगी तो कोहराम खड़ा होना स्वाभाविक है।

ऐसी ही बे सिर-पैर की बात कुछ कांग्रेसी नेताओं ने कुछ वर्ष पूर्व मुसलमानों के प्रसंग में की थी। उन्हें शायद यह भी पता नहीं था कि पिछड़े वर्ग में मुसलमानों का एक बड़ा समूह शामिल है। लोगों को यह भी नहीं मालूम है कि कई अद्विज जातियां पिछड़े वर्ग से बाहर हैं और कुछ द्विज जातियां पिछड़े वर्ग में शामिल हैं।गुजरात में कुर्मी पाटीदार-पटेल कहे जाते हैं। वे सामान्य वर्ग में हैं। वहां राजपूत सवर्ण हैं, लेकिन पिछड़े वर्ग में हैं। बिहार यूपी में कुर्मी पिछड़े वर्ग में हैं और राजपूत सामान्य वर्ग में। बिहार-यूपी में ब्राह्मणों की एक जाति भी पिछड़े वर्ग में है। इसलिए पिछड़े वर्गों और आरक्षण के मामले पर जब हम विचार करें तो इन तयों को देख-समझ लें।

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान, ने हाल में ब्राह्मणों की दयनीयता इस रूप में व्यक्त की है कि वे लोग हल तो नहीं चला सकते न। यह वक्तव्य प्रथमदृष्टया आपत्तिजनक और दकियानूसी ख्याल का है। क्या हल चलाने के लिए किसी जाति विशेष या समुदाय के लोग होंगे? और क्या यह सही नहीं है कि आज ब्राह्मण हर तरह के चुनौतीपूर्ण काम पूरी संलग्नता से नहीं कर रहे हैं? आरक्षण पर बात करते हुए हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि क्या इसके साथ हम आधुनिक समाज के निर्माण के लक्ष्य से भटक तो नहीं रहे हैं। यदि यह भटकाव दिखता है,तब हमें इस पर गंभीरता से विमर्श करना चाहिए। आरक्षण वस्तुत: विशेष अवसर है,जो ऐसे लोगों या तबकों को देना है,जो पीछे छूट गए हैं। लेकिन प्राथमिक स्तर पर ही लोग यह भूल कर जाते हैं कि यह रोजगार देने का एक साधन है। यह इसलिए कि सरकारी नौकरियों में वेतन-भत्ते और कुछ दूसरी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन नहीं इसका उद्देश्य कार्यपालिका में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

न्यायपालिका में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। नतीजतन, समाज के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व वहां नहीं होता। उसके कुफल समय-समय पर दृष्टिगोचर होते हैं। सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। निजी क्षेत्रों में रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध हैं। लेकिन सरकारी महकमों,पुलिस और जुडिसियरी में होने के जनतांत्रिक अर्थ है। यहां सभी तबकों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए और किसी का भी वर्चस्व स्थापित न हो इसकी देखरेख भी। आर्थिक दैन्य सबके दूर होने चाहिए और रोजगार तो सबके लिए होना ही चाहिए। लेकिन आरक्षण में भागीदारी का एक जूनून जो भारत भर में फ़ैल रहा है, वह हमारी सामाजिक अधोगति का संकेत देता है। इससे सावधान होने की जरूरत है।

जाति-केंद्रित पुराने समाज को जातिविहीन आधुनिक समाज में परिवर्तित करना हमारे सामाजिक-राजनीतिक चिंतन का आवश्यक पाठ होना चाहिए। आरक्षण के व्याकरण को बार-बार यानी लगातार संशोधित-परिवर्धित भी किया जाना चाहिए। मैं कहता रहा हूं कि बीमार आदमी को अस्पताल जरूर भेजो। लेकिन हमेशा के लिए वहीं छोड़ मत दो। अर्थात जिन लोगों को विशेष अवसर मिल रहे हैं, उन्हें लम्बे समय तक नहीं मिलने चाहिए अन्यथा एक और जातिवाद उभरेगा, जो पुराने जातिवाद से अधिक खतरनाक होगा। आरक्षण का आधार जाति है। जाति समूह वाचक है, जो हमारी आधुनिकता से मेल नहीं खाता। हम समूह के आधार पर किसी का गुण या चरित्र आंकते हैं, तब इसका मतलब है पुरातन ख्याल के हैं। इसलिए इसे अधिक से अधिक व्यक्ति केंद्रित करने की कोशिश हो। एक व्यक्ति में पिछड़ेपन के कितने अंश हैं, यदि इसकी शिनाख्त और आकलन हो, तो कोई रास्ता निकल सकता है। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन की जगह यदि हमने राजनीतिक फायदे निकालने तय कर लिए हैं, तब बात ही कुछ और है।

 

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