आर्थिक मॉडल में छिपा भारत के लिए जवाब

स्रोत: द्वारा मिहिर शर्मा: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कारों के इतिहास में वर्ष 2018 मील का पत्थर है।व्यावहारिक एवं राजनीतिक निहितार्थ रखने वाले आर्थिक सिद्धांत का सम्मान कई मायनों में अनुकरणीय है। यह सम्मान अमेरिकी अर्थशास्त्रियों- विलियम नॉर्डहॉस और पॉल रोमर को देने की घोषणा की गई है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के मुताबिक, दोनों ने जलवायु परिवर्तन और तकनीकी नवाचार को दीर्घकालिक वृहद आर्थिक विश्लेषण में शामिल किया है। नॉर्डहॉस और रोमर की मौलिक अपेक्षा रही है कि आर्थिक क्रियाकलाप की दिशा बदलने में मानवीय क्षमता हासिल की जा सके। नॉर्डहॉस के मुताबिक सम्मिलित अंतरराष्ट्रीय प्रयास से मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से निपटने की उम्मीद बंधती है। वहीं रोमर ने नवाचार और मानवीय पूंजी को विकासशील एवं विकसित अर्थव्यवस्थाओं दोनों में लागू करने पर बल दिया है।

दोनों विजेताओं की जिंदगी एवं कार्य को 1950 के दशक में विकास एवं वृद्धि के प्रभावी परंपरागत मॉडल के बरक्स देखा जा सकता है। भारत जैसे देशों में यह अब भी आर्थिक नीति का बुनियादी मकसद बना हुआ है। इससे पहले आर्थिक वृद्धि के अध्ययन में 1987 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री रॉबर्ट सॉलो का मॉडल प्रभावी था। सॉलो मॉडल आर्थिक वृद्धि के स्रोतों पर आधारित है। इसके मुताबिक लंबे समय तक जारी आर्थिक प्रगति के लिए कार्यबल वृद्धि और उपलब्ध पूंजी के बीच रिश्ता होता है। हालांकि यह मॉडल आंकड़ों का ही लेखा-जोखा बनकर रह गया। आंकड़ों से साफ हुआ कि असली वृद्धि का बड़ा हिस्सा एक रहस्यमयी अवशिष्ट घटक से आ रहा है जिसे अर्थशास्त्री 'कुल घटक उत्पादकता' कहते हैं। उत्पादकता के आकलन में इस बढ़ोतरी का कारण क्या रहा? रोमर के मुताबिक नवाचार और मानवीय पूंजी आर्थिक प्रगति के मॉडल के लिए जरूरी हैं।

सॉलो मॉडल को ध्वस्त करने में नॉर्डहॉस का योगदान अधिक रहा है क्योंकि उन्होंने प्रगति की धारणा ही बदल दी। उन्होंने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की धारणा को समस्या का कारण माना क्योंकि इसमें गुणवत्तापूर्ण बदलावों को जगह नहीं मिलती है। इससे भी बुरा यह है कि यह सीमित प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपभोग करने वाली उत्पादन गतिविधि को बढ़ावा देती है। भारत के संदर्भ में इसका क्या मतलब है? नॉर्डहॉस खनिजों और वनभूमि के अनुचित उपभोग से हासिल दो अंकों वाली विकास दर पर कभी भी भरोसा नहीं करते। इन संसाधनों के खत्म होने के बाद अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले असर को गणना में शामिल नहीं किए जाने तक इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकते हैं। यह भारतीय सरकारों की विकास संबंधी समूची कवायद पर सवाल खड़े करता है। नॉर्डहॉस के पास इसका विकल्प भी है। उन्होंने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री जेम्स टॉबिन के साथ मिलकर राष्ट्रीय बैलेंस शीट में बदलावों का संकेतक तैयार किया जिसमें वन-क्षेत्र भी शामिल थे।

नॉर्डहॉस पर्यावरण के आर्थिक मूल्य के बारे में उस समय सोच रहे थे जब यह चलन में भी नहीं था। बाद में वह जलवायु परिवर्तन पर मुखर आवाज बनकर उभरे। जनसंख्या वृद्धि,जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल, आय वृद्धि और वैश्विक तापन जैसे घटकों को आत्मसात करने वाले उनके मॉडल वैश्विक तापन-रोधी समाधानों की लागत और लाभ की गणना का आधार भी बने। नॉर्डहॉस का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का समाधान ईंधन जैसे प्रदूषणकारी साधनों के सटीक मूल्य-निर्धारण से ही निकाला जा सकता है। यानी सरकार को पेट्रोल और डीजल पर अधिक शुल्क लगाना चाहिए। नॉर्डहॉस कहते हैं, 'सरकारों, कंपनियों और घरों को कार्बन उत्सर्जन की ऊंची कीमत चुकाने के लिए कहना होगा

अगर यह कीमत अधिक होती तो लोग नवीकरणीय ऊर्जा जैसे विकल्पों के बारे में सोचते।' लेकिन जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में कार्बन शुल्क का मसला नदारद रहता है। खासकर भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा है कि प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों पर असामान्य रूप से सक्रिय भारत में प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से सर्वाधिक कार्बन शुल्क है। नॉर्डहॉस के मुताबिक ऊंचा कार्बन शुल्क लगाने में देरी से जलवायु परिवर्तन से निपटने की लागत काफी बढ़ गई है लेकिन जैवमंडल संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयास को लेकर वह अब भी आशावान हैं। हालांकि पेरिस समझौते के कमतर लक्ष्यों ने नॉर्डहॉस का उत्साह कम कर दिया है। वैश्विक तापमान में औसत वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के नीचे रख पाना अब संभव नहीं लगता है।

इस बीच रोमर नीतिगत अर्थशास्त्रियों के बीच एक असरदार ताकत बने हुए हैं। एक समय विकासशील देशों में सॉलो के अनुयायियों के अलावा माक्र्सवादी-लेनिनवादी योजनाकारों का दबदबा होता था। उनका मानना था कि पूंजी जैसे संसाधनों का जुटाव विकास प्रक्रिया में केंद्रीय तत्त्व है। लेकिन आज रोमर की राह पर चलने वाले और सतत विकास के असली संसाधनों के तौर पर तकनीकी नवाचार एवं कुशल कार्यबल को तवज्जो देने वालों का वर्चस्व है। लेकिन भारत यहां भी पिछड़ता दिख रहा है। प्रगति पर भारत सरकार का रवैया ऐसा रहा है मानो रोमर का वजूद ही नहीं है। हम अब भी सस्ती पूंजी और ढांचागत व्यय को लेकर आसक्त हैं जबकि अपने लोगों की निम्न स्तर की कुशलता भारत के विकास में सबसे बड़ी बाधा है।

रोमर अर्थशास्त्रियों के लिए रोल मॉडल भी हैं। वह गणना में इस्तेमाल डेटा की शुद्धता और निकाले गए निष्कर्ष की स्पष्टता को सबसे ऊपर रखते हैं। इस सोच ने उन्हें भारत में पहले भी सुर्खियां दिलाई हैं। रोमर ने विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत को 30 स्थानों की छलांग लगाने को लेकर सवाल उठाए थे। रोमर ने खुद विश्व बैंक का मुख्य अर्थशास्त्री रहते हुए यह मुद्दा उठाया था और इसके चलते पद भी छोड़ दिया था।

 

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