निर्यात-आयात बैंक की भूमिका का वक्त

स्रोत: द्वारा विनायक चटर्जी: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

बीते 20 वर्ष के दौरान देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र में जो उछाल आई है उसका सबसे बड़ा फायदा हमें ऐसी कंपनियों के निर्माण के रूप में मिला है जिन्हें उच्च गुणवत्ता वाला बुनियादी ढांचा विकसित करने का गहरा अनुभव है और साथ ही जो इंजीनियरिंग में भी प्रवीण हैं। जाहिर तौर पर अगला कदम देश की सीमाओं से जाकर विदेशों में परियोजनाओं की तलाश का होना चाहिए। परंतु जब हम हमने पूर्व में स्थित बड़े पड़ोसियों से तुलना करते हैं तो पता चलता है कि भारत को अभी काफी कुछ करना है।

चीन की एक बेल्ट एक मार्ग (ओबीओआर) जैसी भीमकाय पहल की बात करें तो वह इसके तहत समूचे एशिया में सड़क नेटवर्क बिछाना चाहता है। यह ऐसे पैमाने पर होना है जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ। भारतीय परियोजना निर्यात संवद्र्धन परिषद के मुताबिक वर्ष 2016-17 में देश का परियोजना निर्यात करीब 810 करोड़ डॉलर का था। जबकि अकेले ओबीओआर पहल के अधीन ही चीन अरबों डॉलर का निवेश करने जा रहा है। इसमें हम उन परियोजनाओं को तो शामिल ही नहीं कर रहे हैं जो वह ओबीओआर के अलावा दुनिया के विभिन्न देशों में संचालित कर रहा है।

चीन खुशी-खुशी परियोजनाओं के लिए सस्ता ऋण मुहैया कराता रहा है। अफ्रीका, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के देशों को यह ऋण बहुत लुभावना लगता है। यह बात भी सभी जानते हैं कि जापान भी जाइका के माध्यम से दुनिया भर के देशों में बुनियादी ढांचा क्षेत्र को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना भी ऐसी ही परियोजनाओं में से एक है। जाइका यानी कि जापान इंटरनैशनल कोऑपरेशन एजेंसी, एक सरकारी एजेंसी है जो आधिकारिक विकास सहायता कार्यक्रमों का संयोजन करती है। कोरिया एक्जिम बैंक ऑफ कोरिया के माध्यम से संचालित इकनॉमिक डेवलपमेंट कोऑपरेशन फंड के जरिये यही काम करता है।

वैश्विक स्तर पर एक्जिम बैंक अक्सर परियोजना निर्यात से जुड़ी पहल को बढ़ावा देने वाले साबित हुए हैं। चूंकि उनका स्वामित्व सरकारों के पास होता है इसलिए ये आकर्षक दरों पर धन जुटाने में कामयाब रह पाते हैं। बदले में वे उस लाभ को निर्यातकों को देते हैं और निर्यातकों को ऋण और गारंटी ऐसी शर्तों पर मुहैया करा पाते हैं जिससे किसी बोली के हासिल होने या न होने का असली फर्क पैदा होता है। राष्ट्रीय स्वामित्व होने के कारण वे वाणिज्यिक संस्थानों की तुलना में अधिक जोखिम उठाने की स्थिति में रहते हैं और इसी के चलते वे लंबी अवधि के बॉन्ड बाजार से प्रतिस्पर्धी दरों पर फंडिंग हासिल कर पाते हैं।

बहरहाल, भारत का एक्जिम बैंक लंबे समय से दो कमियों से जूझता रहा है। पहली बात तो यह कि अन्य बड़े देशों के एक्जिम बैंकों की तुलना में उसका पूंजीगत आधार काफी छोटा रहा है। दूसरी बात यह कि बतौर बैंक इसके नियमन मानक भी अन्य बैंकों जैसे ही हैं जबकि हकीकत में यह अन्य आम वित्तीय संस्थानों से काफी अलग है।  वर्ष 2014 में देश के एक्जिम बैंक का पूंजीगत आधार करीब 80 करोड़ डॉलर था। यह चीन के एक्जिम बैंक की पूंजी से बहुत अलग नहीं था। परंतु वर्ष 2016 आते-आते चीन के एक्जिम बैंक के पूंजीगत आधार में नाटकीय वृद्धि हुई और यह 2,100 करोड़ डॉलर तक जा पहुंचा। इस अवधि में भारत के एक्जिम बैंक की कुल पूंजी केवल 100 करोड़ डॉलर तक पहुंची। उस वर्ष जापान, कोरिया और ब्राजील के एक्जिम बैंकों का पूंजी आधार पर 800 से 1,100 करोड़ डॉलर के बीच था।

वैश्विक स्तर पर बैंकों का नियमन इस आधार पर होता है कि वे दी गई पूंजी के आधार पर कितना कारोबार (ऋण और अन्य वित्त पोषण) कर सकते हैं और खुदरा जमाकर्ताओं के हितों की किस हद तक रक्षा कर सकते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक्जिम बैंकों को अक्सर उन कड़े संचालन मानकों से रियायत दे दी जाती है जो वाणिज्यिक बैंकों पर लागू होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे जनता से अपेक्षाकृत कम पैसा जुटाते हैं और इसलिए भी क्योंकि उन्हें प्राय: सरकार का पूर्ण समर्थन हासिल होता है। भारत के एक्जिम बैंक ने 31 मार्च, 2018 तक खुदरा जमाकर्ताओं से महज 58 करोड़ डॉलर की राशि जुटाई थी। यह राशि उसकी बैलेंस शीट के बमुश्किल 0.02 फीसदी के बराबर है।

भारत में एक्जिम बैंक द्वारा पूंजी पर ली जा सकने वाली उधारी के लिए उसके कुल फंड के 10 गुना तक की सीमा तय की गई है। वर्ष 2016 तक एक्जिम बैंक ऑफ इंडिया की नकदी इससे भी कम यानी कुल पूंजी के आठ गुना के बराबर थी। इसके विपरीत एक्जिम बैंक ऑफ चाइना का स्तर नौ गुना था। यह तस्वीर कतई अलग नहीं थी लेकिन सन 2014 तक यह राशि 81 गुना के स्तर तक पहुंच गई। इसके बाद चीन की सरकार ने भारी भरकम पूंजी निवेश किया।  इसके परे नियामकीय मानक भी किसी एक क्षेत्र या ऋणदाता के समक्ष एक्जिम बैंक के ऋण अथवा उसके जोखिम की सीमा तय करते हैं।

ये मानक सामान्य वाणिज्यिक बैंकों को लेकर तो बहुत अच्छे हैं लेकिन एक्जिम बैंक, जिसका काम ही राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का ध्यान रखना और चुनिंदा निर्यात क्षेत्रों को तवज्जो देना है, उसके जोखिम साधारण बैंकों की तुलना में काफी कम होते हैं। ऐसे में उस पर नियंत्रण भी कम होना चाहिए। परियोजना निर्यात के मामले में जहां किसी एक परियोजना का जोखिम अनिवार्य तौर पर अधिक होना चाहिए वहां ऐसी बाधाएं और दिक्कत दे सकती हैं।

अगर भारत के परियोजना निर्यातक सही मायनों में वैश्विक बाजार में पहुंच बना रहे हैं तो उनको उस सहयोग और समर्थन की आवश्यकता होगी जो वास्तव में कोई सरकारी बैंक ही दे सकता है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो उस तरह का वित्तीय सहयोग केवल सरकारी एक्जिम बैंक या उसके समकक्ष से ही मिल सकता है। अगर देश के एक्जिम बैंक को अपनी भूमिका निबाहनी है तो उसे अत्यधिक पूंजी के साथ-साथ सहयोग और अनुकूल नियामकीय व्यवस्था की आवश्यकता होगी। ऐसे में यह सही वक्त है कि देश में एक्जिम बैंक को उसकी उपयुक्त भूमिका निबाहने दी जाए।

 

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