कानून लागू करने की चुनौती

स्रोत: द्वारा क्षमा शर्मा: जनसत्ता

विवाहेतर संबंधों को लेकर धारा 497 को जब से उच्चतम न्यायालय ने खारिज किया है और कहा है कि अब विवाह से बाहर किसी से संबंध अपराध नहीं होगा, तब से दो तरह के विचार और बहसें देखने में आ रही हैं। एक पक्ष कह रहा है कि अब विवाहेतर संबंध के लिए किसी को सजा नहीं मिलेगी, यानी सहमति से संबंध अपराध नहीं रहेंगे। इसलिए यह एक प्रगतिशील फैसला है। इस फैसले के कारण सारे नैतिकतावादी पहरुए, लव जिहाद के नाम पर लड़के-लड़कियों को पीटने वाले, सजा देने वाले, बेकार जाएंगे। दूसरे लोग कह रहे हैं कि हाय, हाय यह क्या हुआ! अब तो औरतों को विवाहेतर संबंध बनाने की खुली छूट मिल जाएगी। कल तक जो छूट पुरुषों के हिस्से थी, औरतें भी उसमें हिस्सेदारी करने लगेंगी। परिवारों का क्या होगा। यानी कि परिवार को बचाने की सारी जिम्मेदारी और अपने शरीर को एक पुरुष के लिए पवित्र बनाए रखने की जिम्मेदारी औरत की ही है। आखिर क्यों। यदि कुंती या द्रौपदी इस समाज में जगह पाती हैं और आज भी पूजी जाती हैं तो आज की औरत क्यों नहीं। लेकिन अगर ऐसा हो जाएगा तो लव जिहाद के आधार पर युवा लड़के-लड़कियों को पीटने वाले कहां जाएंगे। लड़की की अपने मनपसंद लड़के से शादी करने पर गर्दन कलम करने वालों का क्या होगा।

हाल ही में एक लड़की को अपनी पसंद के लड़के से विवाह करने के तीन साल बाद माता-पिता अपने घर ले गए, क्योंकि लड़की नौकरी करती थी और उसके मायके से वह जगह पास थी। लड़की अपने माता-पिता के साथ जाकर बहुत खुश थी। उसका पति कहीं और नौकरी करता था। उसे लगा कि अब सब कुछ ठीक हो गया है। इसलिए उसने अपने ससुराल वालों के पास जाने की सोची, जिससे कि पत्नी से भी मिल आएगा और ससुराल से संबंध जुड़ जाएंगे। वह वहां गया, लेकिन उसी रात उसे मार कर खेत में गाड़ दिया गया। लड़की ने अपने परिवार वालों पर ही अपने पति की हत्या का आरोप लगाया। ऐसी न जाने कितनी घटनाएं अक्सर देखने-सुनने में आती हैं। कभी लड़के-लड़की दोनों को मार दिया जाता है, कभी लड़की का सिर कलम कर दिया जाता है, कभी मिट्टी का तेल या पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी जाती है। कानून खत्म करिए या कानून कुछ भी बनाते रहिए, कानून अक्सर मध्यवर्ग और उच्च वर्ग को सहायता पहुंचाते हैं, वे आम गरीब औरत-आदमी की पहुंच से दूर ही रहते हैं।

लेकिन जो लोग इस फैसले से खुशियां मना रहे हैं, वहां भी एक सोच छिपी है। अपने घर की औरत हमारे लिए ही रहे। उसकी पवित्रता पर कोई आंच न आए। जैसा कि सालों पहले जब महेश भट्ट ने ‘अर्थ’ फिल्म बनाई थी और उनसे पूछा गया कि अगर आपकी पत्नी ऐसा करे कि वह किसी दूसरे मर्द से संबंध बना ले तो क्या करेंगे। उन्होंने काफी अकड़ कर कहा था, ‘ऐसा कैसे हो सकता है। मेरी पत्नी को शादी की मर्यादाओं का पालन करना होगा। अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो कुल्हाड़ी से काट दूंगा।’ ये वही महेश भट्ट हैं जो फिल्मी दुनिया में लीक से हट कर फिल्म बनाने वाले माने जाते हैं। यहां जब इस फैसले से खुशी मनाने वालों की बात की जा रही है तो ऐसे ही लोगों की दोहरी मानसिकता का जिक्र किया जा रहा है जिन्हें लगता है कि अपनी पत्नी या प्रेमिका तो बस अपने लिए, हां बाकी की औरतें अगर कई मर्दों से संबंध बनाती हैं तो बहुत अच्छा है। उनके लिए भी है, न जाने कितने रास्ते खुल जाते हैं। दीपिका पाडुकोण अभिनीत फिल्म ‘माई च्वाइस’ का उदाहरण दिया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था-‘यह मेरा शरीर है, मैं कुछ भी करूं। एक के साथ संबंध बनाऊं या बहुतों के साथ। शादी से पहले बनाऊं या बाद में बनाऊं।’

सवाल यह है कि अगर औरतों की अपनी पसंद है और उसे एक प्रगतिशील कदम कहा जा रहा हो तो पुरुषों की ऐसी पसंद के बारे में शिकायत क्यों। या कि कुल मसला यह है कि औरतें प्रथम दर्जे की नागरिक तभी हो सकती हैं जब वे वैसा ही करने लगें जैसा कि पुरुष करते आए हैं। जिससे लड़ना हो, अगर कुल सोच उसी जैसी बन जाने की हो तो लड़ाई और शिकायत किस बात की। क्या औरतों के पास सिर्फ यही काम है कि वे कितने मर्दों से संबंध रखें, क्या यही उनकी असली आजादी है, क्या औरतों के जीवन में सिवाय सेक्स के और कुछ नहीं। लेकिन नारीवाद को अपने हित में इस्तेमाल करने वाले बहुत से पुरुषों को यह बात काफी पसंद आती है। अपनी औरत घर की चारदीवारी में रहे और बाकी की औरतें आकर हमारी गोद में गिरें तो कितना अच्छा। बेजिंग सम्मेलन की यह उद्घोषणा कि ‘यह शरीर मेरा है और इसका मैं कुछ भी करूं, यह मेरी मर्जी’ को लोगों ने बहुत सतही तौर पर ग्रहण किया है। आखिर इसी शरीर को हथियार बना कर पुरुषवादी विमर्श ने औरतों को हमेशा पीटा है। शरीर का यह कोड़ा औरतें क्यों झेलें। वे उसी पुरुष विमर्श की शिकार क्यों बनें जो औरतों को सिर्फ अपनी कामेच्छा तुष्ट करने का माध्यम समझता है।

इसके अलावा कानून कुछ भी कहते रहें, कानून एक सहारा तो देता है। लेकिन समाज अपनी धारणाओं को क्यों नहीं बदल पाता , यह सोचने की बात है। अगर कानून बनाने-खत्म करने से ही सब कुछ बदल गया होता तो अब तक हमारे समाज से दहेज खत्म हो जाना चाहिए था। 498 ए जैसी धारा के बावजूद दहेज गुजरे जमाने से सैकड़ों गुना न केवल बढ़ा है, बल्कि स्त्री धन कहला कर इसने और अधिक स्वीकृति पा ली है। धारा 497 के अंतर्गत एक बात और भी ध्यान देने की है। विवाहेतर संबंध को परिभाषित करने वाली इस धारा के कारण सिर्फ पुरुषों को सजा मिलती थी। औरतों को सजा नहीं मिलती थी। जब न्यायालय ने इसे खत्म कर दिया तो अब किसी को भी सजा नहीं मिलेगी।

ऐसे में कह सकते हैं कि यह एक फैसला है जिसमें न पुरुष अपराधी होगा न स्त्री। इस कारण से यह सही फैसला है। कानूनों को अगर न्याय देना है, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करनी है तो उन्हें समान ही होना चाहिए। अपने देश में महिलाओं से संबंधित कई कानून ऐसे हैं, जहां आरोप लगने भर से किसी को अपराधी साबित कर दिया जाता है और दूसरे पक्ष की बात सुनी ही नहीं जाती। चैनलों के लिए सेक्स से जुड़े मसले बहुत बिकाऊ होते हैं, इसलिए वे बढ़-चढ़ कर इसमें हिस्सेदारी करते हैं। जब मात्र आरोप से ही कोई अपराधी हो जाता हो, न कोई न्यायालय हो, न न्यायाधीश और मीडिया ही फैसला सुनाने लगे तो लोकतंत्र की रक्षा होना भी दूभर हो जाता है। इसलिए कानून बनाते समय इस बात का जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह सभी को न्याय दे। एफरमेटिव एक्शन के नाम पर एक ओर झुका न हो। दुनिया भर में शायद ही इस तरह के एक पक्षीय कानून हों जहां कहने भर से कोई अपराधी बना दिया जाए।

धारा 497 का खात्मा इस ओर एक बड़ा कदम है। लेकिन जिस समाज में एंटी रोमियो स्क्वाड जगह-जगह घूमते हों, माता-पिता अपने तथाकथित बिगड़ैल बच्चों को रोकने के लिए उनका सहारा लेते हों, उनकी मदद मांगते हों, लड़के-लड़कियों को सरेआम बाल पकड़ कर घसीटा जाता हो, पार्क में युवाओं के बैठने और बातचीत करने पर पाबंदी हो, और इसे पितृसत्ता के असर भर कह कर नजरअंदाज किया जाता हो, वहां इसे लागू कैसे करेंगे।

 

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