विकास का बदला पहलू

स्रोत: द्वारा राजीव सिंह: राष्ट्रीय सहारा

असली भारत गांवों में ही बसता है जिसमें देश की करीब 70 फीसद आबादी रहती है। पिछले कुछ वर्षो से देश में शहरीकरण बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। रोजी-रोटी के बेहतर अवसरों की वजह से ग्रामीण शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। लेकिन इस रुख में अब बदलाव आ रहा है। सरकार की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी उज्ज्वला, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत और सौभाग्य जैसी योजनाएं ग्रामीणों के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय में अच्छा इजाफा हो रहा है। बुनियादी सुविधाएं बढ़ने से विकास की धारा शहरों से होते हुए अब गांवों की ओर रुख कर रही है।

शहरीकरण की चमक बढ़ने के बावजूद वर्ष तक 2050 देश की ग्रामीण क्षेत्र की आबादी 50 फीसद के स्तर पर बनी रहेगी। दरअसल, भारत उन चुनिंदा देशों में शुमार है जहां ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में भारी अंतर है। शहरी क्षेत्र देश के प्रगतिशील और विकासशील समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इस क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में 55 फीसद का योगदान है जबकि ग्रामीण क्षेत्र पिछड़े और आदिवासी समाज को दर्शाता है जो गरीबी में जीवनयापन कर रही है। देश की यह दोहरी अर्थव्यवस्था समग्र विकास और इसके पांच खरब डालर के बनने की राह बड़ी बाधा साबित हो रही है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र के विकास में तेजी लाकर गांव और शहर के बीच की खाई को जल्द से जल्द पाटने की जरूरत है।

इसके बिना भारत के विकसित देश बनने का सपना पूरा नहीं हो पाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्रामीण क्षेत्र का भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि रोजी-रोटी का सबसे बड़ा जरिया है। वर्ष 2011 की कृषि जनगणना के अनुसार 61 फीसद से ज्यादा की ग्रामीण आबादी खेतीबाड़ी पर निर्भर है जो कारखाना क्षेत्र में कार्यरत 4.1 फीसद आबादी की तुलना में कई गुना ज्यादा है। अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान घटकर 14 फीसद पर आ गया जो वर्ष 1951 में 51 फीसद था। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल कृषि क्षेत्र रोजगार तो बड़ी आबादी को दे रहा है लेकिन इसकी उत्पादकता काफी कम है।

राष्ट्रीय आय में ग्रामीणों का योगदान बढ़ाने के लिए नई प्रौद्योगिकी के जरिए कृषि से जुड़ी सुविधाएं बढ़ाने की सख्त जरूरत है। इसके अलावा, साक्षरता दर में सुधार और कृषि व अन्य क्षेत्रों के श्रमिकों की आय के बीच संतुलन बनाने की दरकार है। हकीकत यह है कि खेतिहर मजदूर की तुलना में शहरी श्रमिक की औसत आय तीन गुनी ज्यादा है। इस विभेद को दूर करने के लिए सरकार कौशल विकास अभियान चला रही है, लेकिन मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह विभेद दूर हो पाएगा इसके कम ही आसार हैं। इसके लिए सरकार को और कारगर उपाय करने होंगे। हालांकि पिछले कुछ वर्षो में ग्रामीण क्षेत्र को गरीबी से उबारने के लिए कई आकर्षक योजनाएं शुरू की गई हैं। इसके तहत कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है।

मृदा स्वास्य कार्ड और फसल बीमा योजनाओं के अच्छे परिणाम दिख रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विकास के लिए शुरू की गई समग्र शिक्षा एवं साक्षर भारत जैसी योजनाएं आगे चलकर देश के विकास में मील का पत्थर साबित होंगी। इससे ग्रामीण साक्षरता में भारी सुधार आने की उम्मीद है। यह सर्वविदित है कि ग्रामीणों की आय का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की बीमारियों का इलाज कराने में ही खर्च हो जाता है। ‘‘स्वच्छ भारत मिशन’ जैसी योजनाओं के साथ ग्रामीण इलाकों में स्वास्य क्षेत्र में सुधार लाने की कोशिश की जा रही है। देश में कुपोषण और डायरिया की वजह से हर साल लगभग तीन लाख बच्चों की मौत होती है। इस माह 25 सितम्बर से शुरू हुई ‘‘आयुष्मान योजना’ में पांच लाख रुपये का स्वास्य बीमा कवर मिलने से 50 करोड़ लोग स्वास्य सुरक्षा के दायरे में आ जाएंगे।

यह योजना मोदी सरकार के लिए मनरेगा साबित हो सकती है, जिससे ग्रामीणों की सेहत और समृद्धि में सुधार आएगा। लोक सभा के आसन्न चुनावों को देखते हुए सरकार दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना, कौशल भारत जैसी योजनाओं को बढ़ावा दे रही है। देश के विकास के लिए ग्रामीण युवाओं के कौशल विकास, लघु एवं कुटीर उद्योगों नए कारोबार के नए विचारों को प्रोत्साहन अच्छी पहल साबित होगी। सरकार के आर्थिक सुधारों की बात करें तो इनके सकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से दिखने लगे हैं। पिछले चार वित्तीय वर्षो में देश की औसत प्रति व्यक्ति आय तेजी से बढ़ी है।

हालांकि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय के बीच अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2015-16 के आधार पर वर्ष 2022-23 तक ग्रामीण आय को दोगुनी करना है। फिलहाल, प्रौद्योगिकी के जरिए कृषि पैदावार बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।नई प्रौद्योगिकी से श्रम, मजदूरी और लागत घटाने में मदद मिल रही है। जाहिर है कृषि उत्पादन की तुलना में किसानों की आय ऊंची दर से बढ़ेगी। उपज के वाजिब दाम, फसलों का कुशल प्रबंधन और जिंसों के उचित भंडारण जैसे उपायों के जरिए किसानों की आय में एक तिहाई वृद्धि दर्ज की जा सकती है।

इसके लिए कृषि बाजार और भूमि के अनुबंध की प्रक्रिया में बड़े बदलाव की जरूरत है। हालांकि सरकार ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की व्यवस्था शुरू की है। किसी व्यापारी को देश के दूरदराज इलाके से फसल खरीदने की सुविधा मिलने से किसानों को बेहतर दाम मिलने लगे हैं। इसी का नतीजा है कि बिहार के दरभंगा के किसान को अपने मखाने बेचने के लिए दिल्ली अथवा हैदराबाद नहीं जाना पड़ता। ऑनलाइन दर्ज होने पर अब व्यापारी उससे खुद ही संपर्क करने लगे हैं। यह सुविधा मिलने से किसान को एक और बड़ा फायदा यह मिला है कि अब वह अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर नहीं है।

दूरदराज के खेतों के सड़कों से जुड़ने से कृषि उपज की त्वरित आपूर्ति का विकल्प मिल गया है। नतीजतन वॉलमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब किसान के खेतों पर पहुंच कर उनके उत्पादों को खरीद रही हैं। पर अभी ऐसा नहीं कह सकते कि सब कुछ अच्छा हो गया है। सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर काफी ऊंची बनी हुई है। गरीबी और कर्ज न चुका पाने के कारण किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। कृषि आय का मुख्य स्रेत होने के बावजूद जरूरत के मुताबिक उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। खेतीबाड़ी के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी और पर्याप्त पूंजी नहीं मिल पा रही है। इस क्षेत्र में निजी निवेश आकर्षित करने के लिए उदारीकरण की जरूरत है। यदि सरकार यह करती है तो गांवों की गरीबी निश्चित तौर पर दूर हो सकती है।

 

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