लेखकों ने एक राष्‍ट्रीय विचारधारा की अपनी तलाश में भारतीयकरण और पश्चिमीकरण के बीच संश्‍लेषण के विकल्‍प को चुना । उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के भारत में पुनरुज्‍जीवन को लाने के लिए इन सभी दृष्टिकोणों को मिला दिया गया था ।

लेकिन यह पुनरुज्‍जीवन एक ऐसे देश में लाना था जो विदेशी शासकों के आधिपत्‍य में था । सभी भारतीय भाषाओं में आधुनिक युग 1857 में भारत की स्‍वतंत्रता के लिए प्रथम संघर्ष या इसके आसपास से प्रारम्‍भ होता है । उस समय जो कुछ भी लिखा गया था उसमें पश्चिमी सभ्‍यता के प्रभाव, राजनैतिक चेतना का उदय और समाज में परिवर्तन को देखा जा सकता है ।
सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं में साहित्यिक गद्य के आविर्भाव और सेरमपुर, बंगाल में एक अंग्रेज विलियम केरी (1761-1834) के संरक्षण में मुद्रणालय का आगमन एक ऐसी सर्वाधिक महत्‍त्‍वपूर्ण साहित्यिक घटना थी जो साहित्‍य में क्रान्ति ले आई थी । 1800 से 1850 के बीच भारतीय भाषाओं में समाचार-पत्रों और पत्र-पत्रिकाओं का उदय गद्य का विकास करने के लिए अत्‍यन्‍त महत्‍त्‍वपूर्ण था । एक सशक्‍त माध्‍यम के रूप में गद्य का आविर्भाव एक प्रकार का परिवर्तन लाया जो आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ घटित हुआ ।

राष्ट्रीयता का आविर्भाव


बंकिम चन्‍द्र ने दुर्गेश नन्दिनी (1965) और आनन्‍द मठ (1882) जैसे कई ऐतिहासिक उपन्‍यासों की रचना की जिन्‍हें  अखिल-भारतीय लोकप्रियता मिली और जिन्‍होंने राष्‍ट्रीयता और देश भक्ति को धर्म का एक भाग बना दिया ।  पुनर्जागरणवाद और सुधारवाद राष्‍ट्रवाद की उभरती हुई एक नई सोच के स्‍वाभाविक उपसाध्य थे । आधुनिक भारतीय साहित्‍य का महानतम नाम रवीन्‍द्र नाथ टैगोर (बांग्‍ला 1861-1942) ने संघवाद को राष्‍ट्रीय विचारधारा की अपनी संकल्‍पना का एक महत्‍त्‍वपूर्ण अंग बनाया । भारत में इस परम्‍परा की नींव नानक, कबीर, चैतन्‍य और अन्‍यों जैसे सन्‍तों ने न केवल राजनीतिक स्‍तर पर बल्कि सामाजिक स्‍तर पर रखी थी, यही वह समाधान है- मतभेदों की अभिस्‍वीकृति के माध्‍यम से एकता-जिसे भारत विश्‍व के समक्ष प्रस्‍तुत करता है । आधुनिक भारतीयता अनेकता, बहुभाषिकता, बहुसांस्‍कृतिकता, पंथनिरपेक्षता एवं राष्‍ट्र-राज्य  संकल्‍पना पर आधारित है ।

राष्ट्रीयता, पुनर्जागरणवाद और सुधारवाद का साहित्य
बांग्‍ला में रंगलाल, उर्दू में मिर्जा गालिब और हिन्‍दी में भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र ने स्‍वयं को उस समय की देशभक्ति से परिपूर्ण स्‍वर के रूप में अभिव्‍यक्‍त  किया । इसके अतिरिक्‍त, मिर्जा गालिब (1797-1869) ने प्रेम के बारे में उर्दू में ग़ज़लें लिखीं जिनमें सामान्‍य कल्‍पना और रूपकालंकार शमिल था ।  माइकेल मधुसूदन दत्‍त (1824-73) ने भारतीय भाषा में प्रथम आधुनिक महाकाव्‍य लिखा था और अतुकांत श्‍लोकों का देशीकरण किया था । सुब्रह्मण्‍य भारती (1882-1921) तमिल के एक महान देशभक्‍त कवि थे जिनके कारण तमिल में कविसुलभ परम्‍परा में एक क्रान्ति आई । मैथिलीशरण गुप्‍त (हिन्‍दी, 1886-1964), भाई वीर सिंह पंजाबी 1872-1957)I
उपन्‍यास का जन्‍म उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के सामाजिक सुधार-अभिमुखी आन्‍दोलन से सहयोजित  है । सैमुअल पिल्‍लै द्वारा प्रथम तमिल उपन्‍यास प्रताप मुदलियार (1879), कृष्‍णम्‍मा  चेट्टी द्वारा प्रथम तेलुगु उपन्‍यास श्रीरंग राजा चरित्र (1872), और चन्‍दू मेनन द्वारा प्रथम मलयालय उपन्‍यास इन्‍दु लेखा (1889) शिक्षाप्रद अभिप्रायों से तथा छुआछूत, जाति भेद, विधवाओं के पुनर्विवाह से इंकार जैसी अनिष्‍टकर कुप्रथाओं एवं परम्‍पराओं की पुन: परीक्षा करने के लिए लिखे गए थे । अतीत की बौद्धिक तथा प्राकृतिक सम्‍पदा का गुणगान करने के लिए उपन्‍यास सबसे अधिक उचित माध्‍यम पाए गए थे और इन्‍होंने भारतीयों को इनकी बाध्‍यताओं एवं अधिकारों का स्‍मरण कराया ।

 

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