प्राचीन भारतीय साहित्‍य में हिन्‍दू, बौद्ध और जैनमतों का मात्र धार्मिक शास्‍त्रीय रूप ही सम्मिलित है । जैन वर्णनात्‍मक साहित्‍य, जो कि प्राकृत भाषा में हैं, रचनात्‍मक कहानियों और यथार्थवाद से परिपूर्ण है ।

भारतीय साहित्‍य में वह सब शामिल है जो ‘साहित्‍य’ शब्‍द में इसके  व्‍यापकतम भाव में आता है: धार्मिक और सांसारिक, महाकाव्‍य तथा गीत, प्रभावशाली एवं शिक्षात्‍मक, वर्णनात्‍मक और वैज्ञानिक गद्य, साथ ही साथ मौखिक पद्य एवं गीत । वेदों में (3000 ईसा पूर्व-1000 ईसा पूर्व) जब हम यह अभिव्‍यक्ति देखते हैं, ‘मैं जल में खड़ा हूं फिर भी बहुत प्‍यासा हूं’, तब हम ऐसी समृद्ध विरासत से आश्‍चर्यचकित रह जाते हैं जो आधुनिक और परम्‍परागत दोनों ही है।
वेद उच्‍च साहित्यिक मूल्‍य के तत्‍त्‍वत: आदिरूप काव्‍य हैं । ये पौराणिक स्‍वरूप के हैं और इनकी भाषा प्रतीकात्‍मक है । आरण्‍यक या वन संबंधी पुस्‍तकें अनुष्‍ठान का एक गुप्‍त स्‍पष्‍टीकरण प्रस्‍तुत करती है, ब्राह्मण की दार्शनिक चर्चाओं में इनका उद्गम निहित है, अपनी पराकाष्‍ठा उपनिषदों में पाती है और ब्राह्मण के आनुष्‍ठानिक प्रतीकात्‍मकता और उपनिषदों के दार्शनिक सिद्धान्‍तों के बीच संक्रमणकालीन चरण का प्रतिनिधित्‍व करती हैं । गद्य और पद्य दोनों ही रूपों में लिखे गए उपनिषद  दार्शनिक संकल्‍पनाओं की अभिव्‍यक्ति मात्र हैं ।‘रामायण’ (1500 ईसा पूर्व) और ‘महाभारत’ (1000 ईसा पूर्व) भारतीय जनसाधारण की जातीय स्‍मरण-शक्ति का भण्‍डार हैं। रामायण के कवि वाल्‍मीकि को आदिकवि कहते हैं और राम की कहानी का महाभारत में यदा-यदा वर्णन मिलता है । इन दोनों महाकाव्‍यों की रचना करने में अत्‍यधिक लम्‍बा समय लगा था और गायकों तथा कथावाचकों द्वारा इन्‍हें मौखिक रूप से सुनाने के प्रयोजनार्थ एक कवि ने नहीं बल्कि कई कवियों ने अपना योगदान दिया था

शास्त्रीय संस्कृत साहित्य


संस्‍कृत भाषा वैदिक और शास्‍त्रीय रूपों में विभाजित है । महान महाकाव्‍य रामायण, महाभारत और पुराण शास्‍त्रीय युग का एक भाग है , लेकिन इनकी विशालता तथा महत्‍व के कारण इन पर अलग-अलग चर्चा की जाती है, और निस्‍संदेह ये काव्‍य (महाकाव्‍य), नाटक, गीतात्‍मक काव्‍य, प्रेमाख्‍यान, लोकप्रिय कहानियां, शिक्षात्‍मक किस्‍से कहानियों, सूक्तिबद्ध काव्‍य, व्‍याकरण के बारे में वैज्ञानिक साहित्‍य, चिकित्‍सा विधि, खगोल-विज्ञान, गणित आदि शामिल हैं । शास्‍त्रीय संस्‍कृत साहित्‍य समग्र रूप से पंथनिरपेक्ष रूप में है । शास्‍त्रीय युग के दौरान, संस्‍कृत के महानतम व्‍याकरणों में से एक पाणिनि के सख्‍त नियमों द्वारा भाषा विनियमित होती है ।

महाकाव्‍य के क्षेत्र में महानतम विभूति कालिदास (380 ईसवी सन् से 415 ईसवी सन् तक) थे । इन्‍होंने दो महान महाकाव्‍यों की रचना की, जो ‘कुमार संभव’(कुमार का जन्‍म) और ‘रघुवंश’ (रघु का वंश) हैं । संस्‍कृत नाटक की प्र‍तीकात्‍मकता यह बताती है कि मनुष्‍य की यात्रा तब पूरी होती है जब वह आसक्ति से गैर-आ‍सक्ति की ओर, अस्‍थायीत्‍व के शास्‍त्रत्‍व की ओर अथवा प्रवाह से कालातीतत्‍व की ओर बढ़ता है । कालिदास सबसे अधिक प्रतिष्ठित नाटककर हैं और इनके तीन नाटकों, यथा ‘मालविकाग्निमित्र’ (मालविका और अग्निमित्र), ‘विक्रमोर्वशीयम्’ (विक्रम और उर्वशी) तथा ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ (शंकुतला की पहचान) में प्रेम रस की, इसकी सभी संभव अभिव्‍यक्तियों के भीतर रहते हुए, अभिक्रिया अद्वितीय है । भाषा (चौथी शताब्‍दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्‍दी ईसवी सन्) के तेरह नाटक, जिनके बारे में बीसवीं शताब्‍दी के प्रारम्‍भ में पता चला था, संस्‍कृत रंगमंच के सर्वाधिक मंचनीय नाटकों के रूप में स्‍वीकार किए जाते हैं ।

संस्‍कृत साहित्‍य अति गुणवत्‍तापूर्ण  गीतात्‍मक काव्‍य से परिपूर्ण है । काव्‍य से परिपूर्ण है । काव्‍य में रचनात्‍मकता का संयोजन शामिल है, वास्‍तव में, भारतीय संस्‍कृति में कला और धर्म के बीच विभाजन यूरोप त‍था चीन की तुलना में कम पैना प्रतीत होता है ।

पालि और प्राकृत में साहित्य


वैदिक युग के पश्चाभत, पालि और प्राकृत भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं थीं। व्यापकतम दृष्टि से देखें तो प्राकृत ऐसी किसी भी भाषा को इंगित करती थी जो मानक भाषा संस्कृत से किसी रूप में निकली हो । पालि एक अप्रचलित प्राकृत है । वास्तव में, पालि विभिन्न‍ उपभाषाओं का एक मिश्रण है । इन्हें बौद्ध और जैन मतों ने प्राचीन भारत में अपनी पवित्र भाषा के में अपनाया था। भगवान बुद्ध (500 ईसा पूर्व) ने प्रवचन देने के लिए पालि का प्रयोग किया । समस्त बौद्ध धर्म वैधानिक साहित्य पालि में हैं जिसमें त्रिपिटक शामिल है । प्रथम टोकरी विनय पिटक में बौद्ध मठवासियों के संबंध में मठवासीय नियम शामिल हैं । दूसरी टोकरी सुत्तस पिटक में बुद्ध के भाषणों और संवादों का एक संग्रह है । तीसरी टोकरी अभिधम्‍म पिटक नीतिशास्त्र , मनोविज्ञान या ज्ञान के सिद्धान्त से जुड़े विभिन्न विषयों का वर्णन करती है ।
जातक कथाएं गैर- धर्मवैधानिक बौद्ध साहित्य हैं जिनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों (बोधिसत्त्व या होने वाले बुद्ध) से जुड़ी कहानियां हैं । संस्कृत में बौद्ध साहित्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जिसमें अश्वघोष (78 ईसवी सन्) द्वारा रचित महान महाकाव्य 'बुद्धचरित' शामिल है ।
बौद्ध कहानियों की ही भांति, जैन कथाएं भी सामान्य रूप से शिक्षात्मक स्वरूप की हैं । इन्हें प्राकृत के कुछ रूपों में लिखा गया है । जैन शब्द रुत जी (विजय प्राप्त करना) से लिया गया है और उन व्यक्तियों के धर्म को व्यंक्त करता है जिन्होंने जीवन की लालसा पर विजय पा ली है । जैन सन्तों द्वारा रचित जैन धर्मवैधानिक साहित्यों, तथा साथ ही साथ हेमचन्द्र (1088 ईसवी सन्) द्वारा कोशकला तथा व्याकरण के बारे में बड़ी संख्या में रचनाएं भली-भांति ज्ञात हैं । नैतिक कहानियों और काव्य की दिशा में अभी बहुत कुछ तलाशना है । प्राकृत को हाल (300 ईसवी सन्) द्वारा रचित गाथासप्ताशती (700 श्लोंक ) के लिए भली-भांति जाना जाता है जो रचनात्मक साहित्य का सर्वोत्तम उदाहरण है । यह इनकी अपनी 44 कविताओं के साथ (700 श्लोकों) का एक संकलन है । यहां यह ध्यान देना रुचिकर होगा कि पहाई, महावी, रीवा, रोहा और शशिप्पलहा जैसी कुछ कवयित्रियों को संग्रह में शामिल किया गया है ।  प्राकृत काव्य की विशेषता इसका सूक्ष्म रूप है, आन्तरिक अर्थ (हियाली) इसकी आत्मा है । सिद्धराशि (906 र्इसवी सन्) की उपमितिभव प्रपंच कथा की भांति जैन साहित्य भी संस्कमत में उपलब्ध है ।

प्रारम्भिक द्रविड़ साहित्य


भारतीय लोग वाक् के चार सुस्प ष्ट परिवारों से जुड़ी भाषाओं में बोलते है: आस्ट्रिक, द्रविड़, चीनी-तिब्बती और भारोपीय । भाषा के इन चार अलग-अलग समूहों के बावजूद, इन भाषा समूहों से होकर एक भारतीय विशेषता गुजरती है जो जीवन के मूल में निहित कुछ एकरूपता के आधारों में से एक का सृजन करती है जिसका जवाहर लाल नेहरू ने विविधता के बीच एकता के रूप में वर्णन किया है । द्रविड़ साहित्य में मुख्यत: चार भाषाएं शामिल हैं : तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम । इनमें से तमिल सबसे पुरानी भाषा है जिसने द्रविड़ चरित्र को सबसे अधिक बचाकर रखा है । कन्नड़ एक संस्कृलत भाषा के रूप में उतनी ही पुरानी है जितनी कि तमिल । इन सभी भाषाओं ने संस्कृत से कई शब्दों का आदान-प्रदान किया है, तमिल ही मात्र एक ऐसी आधुनिक भारतीय भाषा है, जो अपने एक शास्त्रीय विगत के साथ अभिज्ञेय दृष्टि से सतत है । प्रारम्भिक शास्त्रीय तमिल साहित्य संगम साहित्य के रूप में जाना जाता है जिसका अर्थ है आतृत्व् जो कवियों की प्रमुख रूप से दो शैलियों, यथा अहम् (प्रेम की व्यक्तिपरक कविताएं), और पूर्ण (वस्तुनिष्ठ ,लोककाव्य और वीर-रस प्रधान) को इंगित करती है ।

संगम शास्त्रीय में 18 कृतियां (प्रेम के आठ संग्रह और दस लम्बी कविताएं) अभिव्यक्ति की अपनी प्रत्यक्षता के लिए भली-भांति जानी जाती हैं । इन्हें 473 कवियों ने लिखा था जिनमें से 30 महिलाएं थीं, जिनमें एक प्रसिद्ध कवयित्री अवय्यर थीं । 102 कविताओं के रचनाकारों की जानकारी नहीं है । इनमें से अधिकांश संग्रह तीसरी शताब्दी र्इसा पूर्व के थे । इस अवधि के दौरान, तमिल की प्रारम्भिक कविताओं को समझने के लिए एक व्याकरण तोलकाप्पियम लिखा गया था ।तमिल भाषियों ने अपने साहित्यिक प्रयास के सभी 2000 वर्षों में कुछ खास नहीं लिखा है । तिरुवल्लुवर द्वारा प्रसिद्ध तिरुककुलर, जिसकी रचना छठी शताब्दी र्इसवी सन् में हुई थी, जो किसी को उत्‍तम जीवन व्यतीत करने की दिशा में नियमों की एक नियम-पुस्तिका है । यह जीवन के प्रति एक पंथनिरपेक्ष, नैतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है, द्वि महाकाव्य शिलाप्पतिकारम् (पायल की कहानी) जिसके लेखक इलांगों-अडिगल हैं, और चत्तानार द्वारा रचित मणिमेखलइ (मणिमेखलइ की कहानी) 200-300 ईसवी सन् में किसी समय लिखे गए थे और ये इस युग में तमिल समाज का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं ।यदि तमिल ब्राह्मणीय और बौद्ध ज्ञान पर विजय को उद्घाटित करता है तो कन्नड़ अपने प्राचीन चरण में जैन आधिपत्य को दर्शाता है । मलयालम ने संस्कृत भाषा के एक संबद्ध खजाने का अपने-आप में विलय कर लिया । नन्नतय्य (1100 ईसवी सन्) तेलुगु के पहले कवि थे । प्राचीन समय में तमिल और तेलुगु भाषाएं दूर-दूर तक फैली थीं ।

 

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