अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ, सयुंक्त राष्ट्र संघ की विशिष्ट संस्था है। यह एक  एक त्रिदलीय अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसका लक्ष्य संसार के श्रमिक वर्ग की श्रम और आवास संबंधी अवस्थाओं में सुधार करना है अर्थात विश्व के श्रमिक वर्ग के अधिकारों की रक्षा करना है।

अंतर्राष्ट्रीय  श्रम संघ अंतर्राष्ट्रीय आधारों पर मज़दूरों तथा श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए नियम वनाता है।अंतर्राष्ट्रीय  श्रम संघ, का मुख्यालय जिनेवा में है। वर्ष  1969 में अंतर्राष्ट्रीय  श्रम संघ को  विश्व शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया  जा चुका है ।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ: उद्देश्य
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ का मुख्य  उद्देश्य संसार के श्रमिक वर्ग की श्रम और आवास संबंधी अवस्थाओं में सुधारना तथा  पूर्ण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त करने पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय क्रिया-कलापों को प्रोत्साहित करना है।अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ अंतरराष्ट्रीय श्रम संधियों एवं सिफारिशों के आधार पर श्रम मानदंडों की रचना करता है तथा रोजगार संवर्धन, मानव संसाधन विकास, सामाजिक संस्थाओं के विकास, ग्रामीण विकास, लघु उद्योग, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग का विस्तार करता है।अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ विशेषज्ञ अभियानों एवं फैलोशिप कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न देशों की सरकारों की प्रेरक सहायता उपलब्ध करायी  जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ: संक्षिप्त इतिहास
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ की स्थापना 1919 ई. में हुई, तथापि उसका इतिहास औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक दिनों से ही आरंभ हो गया था, जब नवोत्थित औद्योगिक सर्वहारा वर्ग ने समाज की उत्क्रांतिमूलक शक्तिमान संस्था के रूप में तत्कालीन समाज के अर्थशास्त्रियों के लिए एक समस्या उत्पन्न कर दी थी। यह औद्योगिक सर्वहारा वर्ग के कारण न केवल तरह-तरह के उद्योग-धंधों के विकास में अतीव मूल्यवान सिद्ध हो रहा था, बल्कि श्रम की व्यवस्थाओं और व्यवसायों के तीव्रगतिक केंद्रीकरण के कारण असाधारण शक्ति संपन्न होता जा रहा था। फ़्राँसीसी राज्य क्रांति, साम्यवादी घोषणा के प्रकाशन, प्रथम और द्वितीय इंटरनेशनल की स्थापना और एक नए संघर्ष निरत वर्ग के अभ्युदय ने विरोधी शक्तियों को इस सामाजिक चेतना से लोहा लेने के लिए संगठित प्रयत्न करने को विवश किया।


इसके अतिरिक्त कुछ औपनिवेशिक शक्तियों ने, जिन्हें दास श्रमिकों की बड़ी संख्या उपलब्ध थी, अन्य राष्ट्रों से औद्योगिक विकास में बढ़ जाने के संकल्प से उनमें अंदेशा उत्पन्न कर दिया और ऐसा प्रतीत होने लगा कि संसार के बाज़ार पर उनका एकाधिकार हो जाएगा। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय श्रम के विधान की आवश्यकता स्पष्ट हो गई और इस दिशा में तरह-तरह के समझौतों के प्रयत्न समूची 19वीं शताब्दी भर होते रहे। 1889 ई. में जर्मनी के सम्राट ने बर्लिन-श्रम-सम्मेलन का आयोजन किया। फिर 1900 में पेरिस में श्रम के विधान के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संघ की स्थापना हुई। इसके तत्वावधान में बर्न में 1905 एवं 1906 में आयोजित सम्मेलनों ने श्रम संबंधी प्रथम नियम बनाए। ये नियम स्त्रियों के रात में काम करने के और दियासलाई के उद्योग में श्वेत फॉस्फोरस के प्रयोग के विरोध में बनाए गए थे, यद्यपि प्रथम महायुद्ध छिड़ जाने से 1913 में बने सम्मेलन की मान्यताएँ जोर न पकड़ सकीं।
यूरोप के व्यावसायिक केंद्रों में होने वाली बड़ी हड़तालों और 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने श्रम की समस्याओं को विस्फोट की स्थिति तक पहुँचने से रोकने और उन्हें नियंत्रित करने की आवश्यकता सिद्ध कर दी। इस सुझाव के परिणामस्वरूप 1919 के शांति सम्मेलन ने अंतरराष्ट्रीय श्रम विधान के लिए एक ऐसा जाँच कमीशन बैठाया, जो अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ तथा विश्व-श्रम-चार्टर का निर्माण संभव कर सके। कमीशन के सुझाव कुछ परिवर्तनों के साथ मान लिए गए और पूँजीवादी जगत्‌ में श्रम के उत्तरोत्तर बढ़ते हुए झगड़ों को ध्यान में रखकर इस संघ को शीघ्रातिशीघ्र अपना कार्य आरंभ कर देने का निर्णय कर लिया गया। शीघ्रता यहाँ तक की गई कि अक्टूबर, 1919 में वाशिंगटन डी.सी. में प्रथम श्रम सम्मेलन की बैठक हो गई, जबकि अभी संधि की शर्तें भा सर्वथा मान्य नहीं हो पाई थीं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ:  संरचना एवं कार्य
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ की संरचना प्रतिनिधियों की त्रिस्तरीय प्रणाली पर आधारित है, जिसमें सरकारें, नियोक्ता एवं नियोजक शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ की तीन  मुख्य संस्थाएँ हैं-

1) साधारण सम्मेलन (जेनरल कॉन्फ्रसें)
2) शासी निकाय (गवर्निंग बॉडी)
3) अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय


साधारण सम्मेलन अर्थात अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन: साधारण सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के नाम से अधिक विख्यात है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ की समूची शक्ति अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के हाथों में है। उसकी बैठक प्रति वर्ष होती है। इस सम्मेलन में प्रत्येक सदस्य राष्ट्र चार प्रतिनिधि भेजता है। परंतु इन प्रतिनिधियों में दो राजकीय प्रतिनिधि सदस्य राष्ट्रों की सरकारों द्वारा नियुक्त होते हैं, तीसरा उद्योगपतियों का और चौथा श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करता है। इनकी नियुक्ति भी सदस्य सरकारें ही करती हैं। सिद्धांत: ये प्रतिनिधि उद्योगपतियों और श्रमिकों की प्रधान प्रतिनिधि संस्थाओं से चुन लिए जाते हैं। उन संस्थाओं के प्रतिनिधित्व का निर्णय भी उनके देश की सरकारें ही करती हैं। परंतु प्रत्येक प्रतिनिधि को व्यक्तिगत मतदान का अधिकार होता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम  सम्मेलन का काम अंतरराष्ट्रीय श्रम नियम एवं सुझाव संबंधी मसविदा बनाना है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सामाजिक और श्रम संबंधी निम्नतम मान आ जाएँ। इस प्रकार यह एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच का काम करता है, जिस पर आधुनिक औद्योगिक समाज के तीनों प्रमुख अंगों-राज्य, संगठन (व्यवस्था, मैनेजमेंट) और श्रम-के प्रतिनिधि औद्योगिक संबंधों की महत्वपूर्ण समस्याओं पर परस्पर विचार विनिमय करते हैं। दो-तिहाई बहुमत द्वारा नियम और बहुमत द्वारा सिफारिश स्वीकृत होती है; परंतु स्वीकृत नियमों या सिफारिशों को मान लेना सदस्य राष्ट्रों के लिए आवश्यक नहीं। हाँ, उनसे ऐसी आशा अवश्य की जाती है कि वे अपने देशों की राष्ट्रीय संसदों के समक्ष 18 महीने के भीतर उन विषयों को विचार के लिए प्रस्तुत कर दें। सुझावों के स्वीकरण पर विचार इतना आवश्यक नहीं है जितना नियमों को कानून का रूप देना। संघ राज्यों के विषय में ये नियम सुझाव के रूप में ही ग्रहण करने होते हैं, विधान के रूप में नहीं। जब कोई सरकार नियम को मान लेती है और उसका व्यवहार करना चाहती है तो उसे अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय में इस संबंध का एक वार्षिक विवरण भेजना पड़ता है।

शासी निकाय:  शासी निकाय भी एक तीन अंगों वाली संस्था है। संघ की कार्यकारिणी के रूप में काम करता है। यह 32 सदस्यों से निर्मित है, जिनमें 16 सरकारी तथा आठ-आठ उद्योगपतियों और श्रमिकों के प्रतिनिधि होते हैं। इन 16 सरकारी संस्थानों में से आठ उन देशों के लिए हैं, जो प्रधान औद्योगिक देश मान लिए गए हैं। शेष आठ प्रति तीसरे वर्ष सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित होते हैं, जिनके निर्वाचन का अधिकार कार्यकारिणी में सम्मिलित उन आठ देशों को भी प्राप्त होता है, जो प्रधान औद्योगिक देश होने के कारण उसके पहले से ही सदस्य हैं। इसका निर्णय भी कार्यकारिणी परिषद् द्वारा ही होता है कि आठ प्रधान औद्योगिक देश कौन से हों। कार्यकारिणी नीति और कार्यक्रम निर्धारित करती है, अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय का संचालन और सम्मेलन द्वारा नियुक्त अनेक समितियों और आयोगों के कार्यों का निरीक्षण करती है। कार्यालय के डाइरेक्टर जेनरल का निर्वाचन कार्यकारिणी ही करती है और वही सम्मेलन का कार्यक्रम (एजेंडा) भी प्रस्तुत करती है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय: अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय का स्थायी सचिवालय है। संगठन के वर्तमान विधान के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ का कोई भी सदस्य इस संगठन का सदस्य बन सकता है, उसे केवल सदस्यता के साधारण नियमों का पालन स्वीकार करना होगा। यदि सार्वजनिक सम्मेलन चाहे तो संयुक्त राष्ट्र संघ की परिधि से बाहर के देश भी इसके सदस्य बन सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के कर्मचारियों की ही भाँति अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय के कर्मचारी भी अंतरराष्ट्रीय सिविल सर्विस के कर्मचारी होते हैं जो उस अंतरराष्ट्रीय संस्था के प्रति उत्तरदायी होते हैं। श्रम कार्यालय का काम अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के विविध अंगों के लिए कार्य विवरण, काग़ज़ पत्र आदि प्रस्तुत करना है। सचिवालय के इन कार्यों के साथ ही वह कार्यालय अंतरराष्ट्रीय श्रम अनुसंधान का भी केंद्र है, जो जीवन और श्रम की परिस्थितियों को अंतरराष्ट्रीय ढंग से मान्यता प्रदान करने के लिए उनसे संबंधित सभी विषयों पर मूल्यवान सामग्री एकत्र करता तथा उनका विश्लेषण और वितरण करता है। सदस्य देशों की सरकारों और श्रमिकों से वह निरंतर संपर्क रखता है। अपने सामयिक पत्रों और प्रकाशनों द्वारा वह श्रम विषयक सूचनाएँ देता रहता है।

भारत एवं अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ


भारत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के संस्थापक सदस्य राष्ट्रों में है और 1922 से उसकी कार्यकारिणी में संसार की आठवीं औद्योगिक शक्ति के रूप में वह अवस्थित रहता रहा है।भारत ने  अभी तक अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के 45 अभिसमयों को अनुमोदित किया है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के कुल 8 मूलभूत अभिसमय हैं। इनमें से जिन 4 का अनुमोदन भारत द्वारा किया जा चुका है वे निम्न हैं-
(1) बलात् श्रम अभिसमय, 1930
(2) बलात् श्रम उन्मूलन अभिसमय, 1957
(3) समान पारिश्रमिक अभिसमय, 1951
(4) भेदभाव (रोजगार व्यवसाय) अभिसमय, 1958

जिन दो अभिसमयों का अनुमोदन प्रक्रिया में है वे हैं-
(1) न्यूनतम आयु अभिसमय, 1973
(2) बालश्रम का निष्कृष्टतम रूप अभिसमय, 1999

न्यूनतम आयु अभिसमय, 1973 जून, 1973 में आईएलओ द्वारा अपनाया गया वह अभिसमय रोजगार में प्रवेश के लिए आवश्यक न्यूनतम आयु से संबंधित है। यह अभिसमय 19 जून, 1976 से प्रभावी है। इसका अनुमोदन करने वाले प्रत्येक देश की निम्न बाध्यताएं होंगी-(1) बाल श्रम के प्रभावी उन्मूलन हेतु राष्ट्रीय नीति का निर्माण एवं क्रियान्वयन।(2) रोजगार में प्रवेश हेतु एक न्यूनतम आयु का निर्दिष्टीकरण, जो अनिवार्य स्कूली शिक्षा के पूरा होने की उम्र से कम नहीं होनी चाहिए।(3) इस बात की प्रत्याभूति देना कि युवाओं के स्वास्थ्य एवं उनकी नैतिकता की सुरक्षा से समझौता करने वाले किसी भी प्रकार के रोजगार में प्रवेश की आयु 18 वर्ष से कम नहीं होगी।
बाल श्रम उन्मूलन हेतु भारत द्वारा किए गए प्रयास:  भारत सरकार द्वारा बाल श्रम (निषेध एवं विनियम) अधिनियम, 1986 अधिनियमित किया गया है और इसका सफलतापूर्वक क्रियान्वयन भी किया जा रहा है। वर्ष 2011 में हाथियों की देखभाल एवं सर्कस में बाल श्रम को प्रतिबंधित किया गया। अभी भारत में कुल 18 व्यवसाय, 65 गतिविधियां बाल श्रम अधिनियम, 1986 के अंतर्गत प्रतिबंधित हैं। वर्ष 1987 में नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट (NCLP) प्रारंभ किया गया। इसके अंतर्गत बाल श्रमिकों को रोजगार से हटाकर विशेष स्कूलों में नामांकित किया जा रहा है, जहां उन्हें औपचारिक शिक्षण तंत्र में आने से पूर्व प्रशिक्षित किया जाता है। इसके अतिरिक्त 1 अप्रैल, 2010 से 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया। 30 जुलाई, 2016 को बाल श्रम अधिनियम (1986) में संशोधन करके 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को ऑटोमोबाइल वर्कशाप, बीड़ी-निर्माण, कॉरपेट, बुनाई, हैंडलूम एवं पॉवरलूम और खदानों में काम करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। 14-18 वर्ष की आयु के बच्चों को एक अन्य नाम ‘किशोर’ (Adolescent) दिया गया।
बाल श्रम का निकृष्टतम् रूपों के उन्मूलन हेतु अभिसमय, 1999:  जून, 1999 में आईएलओ द्वारा अपनाया गया यह अभिसमय बाल श्रम के निकृष्टतम् रूपों के उन्मूलन हेतु आवश्यक निषेध एवं तत्काल कार्यवाही से संबंधित है। यह अभिसमय 19 नवंबर, 2000 को प्रभावी हुआ। इस अभिसमय में 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को बालक (Child) की श्रेणी में रखा गया है। इस अभिसमय के अनुसार, बाल श्रम के निकृष्टतम् रूप निम्न हैं-(1) दासता या इसके समकक्ष सभी गतिविधियां जैसे-बच्चों की खरीद-फरोख्त और तस्करी, ऋण बंधन एवं बलात् श्रम तथा सशस्त्र संघर्ष हेतु बच्चों की अनिवार्य भर्ती।(2) पोर्नोग्राफी या अश्लील कार्यक्रम या वेश्यावृत्ति के लिए बच्चों का उपयोग या खरीद या पेशकश।(3) अवैध गतिविधियों विशेषकर अंतरराष्ट्रीय संधियों द्वारा परिभाषित ड्रग्स के उत्पादन एवं तस्करी के लिए बच्चों का उपयोग या खरीद या पेशकश।(4) ऐसा कार्य जिसमें चाहे कार्य की प्रकृति या परिस्थितिवश बच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं नैतिकता की क्षति होने की संभावना है।

अभिसमय एवं भारत में विधायन
भारत में बंधुआ उन्मूलन अधि. 1976, अनैतिक तस्करी निवारण अधि. 1956, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज एक्ट, 1985 और बाल श्रम (निवारण एवं विनियम) अधि. 1986 के द्वारा उपर्युक्त दोनों अभिसमयों के तत्सम उपबंध बनाए गए थे। परंतु इन अधिनियमों में आवश्यक संशोधनों के उपरांत ही भारत इन दोनों अभिसमयों का अनुमोदन करने की स्थिति में आ पाया है।

अनुमोदन की आवश्यकता
इन अभिसमयों के अनुमोदन से बाल श्रम उन्मूलन के भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों में एकरूपता आएगी। स्थायी विकास लक्ष्य वर्ष 2030 के अनुसार, बाल श्रम उन्मूलन महत्वपूर्ण लक्ष्य है, और इन अभिसमयों का अनुमोदन करने के बाद इनके प्रावधानों का पालन करना भारत के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल आबादी की 29 प्रतिशत जनसंख्या 14 वर्ष से कम आयु वर्ग की है, जबकि 14-18 वर्ष की आयु वर्ग का कुल आबादी में 10 प्रतिशत योगदान है। इतनी बड़ी आबादी के हिस्से को जनांकिकीय लाभ में बदलने हेतु अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रावधानों का भारत में भी लागू होना एक महत्वपूर्ण कदम है।

 

[printfriendly]