अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख  न्यायिक अंग है और यह सयुंक्त राष्ट्र  संघ के पांच मुख्य अंगों में से एक है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र के अंतर्गत अप्रैल 1946 ई. में की गई थी। अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय का मुख्यालय हेग में स्थित है। न्यायालय के प्रशासन व्यय का भार संयुक्त राष्ट्रसंघ पर है।


अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय: संक्षिप्त इतिहास
सन 1899 ई. में, हेग में, प्रथम शांति सम्मेलन हुआ और उसके प्रयत्नों के फलस्वरूप स्थायी विवाचन न्यायालय की स्थापना हुई। सन 1907 ई. में द्वितीय शांति सम्मेलन हुआ और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार न्यायालय (इंटरनेशनल प्राइज़ कोर्ट) का सृजन हुआ, जिससे अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रशासन की कार्य प्रणाली तथा गतिविधि में विशेष प्रगति हुई।

तदुपरांत 30 जनवरी, 1922 ई. को 'लीग ऑव नेशंस' के अभिसमय के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का विधिवत्‌ उद्घाटन हुआ, जिसका कार्यकाल राष्ट्रसंघ के जीवन काल तक रहा। अंत में वर्तमान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ की अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संविधि के अंतर्गत हुई।

अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय: संरचना

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 15 है, गणपूर्ति संख्या नौ है। न्यायाधीशों की नियुक्ति निर्वाचन द्वारा होती है। पद धारण करने की कालावधि नौ वर्ष है। कोई भी दो न्यायाधीश एक ही राष्ट्र के नहीं हो सकते है और किसी न्यायाधीश की मृत्यु हो जाने पर  उनकी जगह किसी समदेशी को दी जाती है। इन न्यायाधीशों को किसी और पद पर बने रहना की  मनाही  है। किसी एक न्यायाधीश को हटाने के लिए बाकीसभी  न्यायाधीशों का सर्वसम्मत निर्णय जरूरी है। न्यायालय द्वारा सभापति तथा उप-सभापति का निर्वाचन और रजिस्ट्रार की नियुक्ति भी की जाती  है।

अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय: अधिकार  क्षेत्र
इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस एक विश्व न्यायालय के रूप में काम करता है। अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय संविधि में सम्मिलित समस्त राष्ट्र अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इसका क्षेत्राधिकार संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र अथवा विभिन्न संधियों तथा अभिसमयों में परिगणित समस्त मामलों पर है। अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय संविधि में सम्मिलत कोई राष्ट्र किसी भी समय बिना किसी विशेष प्रसंविदा के किसी ऐसे अन्य राष्ट्र के संबंध में, जो इसके लिए सहमत हो, यह घोषित कर सकता है कि वह न्यायालय के क्षेत्राधिकार को अनिवार्य रूप में स्वीकार करता है। उसके क्षेत्राधिकार का विस्तार उन समस्त विवादों पर है, जिनका संबंध संधिनिर्वचन, अंतरर्राष्ट्रीय विधि प्रश्न, अंतरर्राष्ट्रीय आभार का उल्लंघन तथा उसकी क्षतिपूर्ति के प्रकार एवं सीमा से है।


अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय का मुख्य कार्य  कानूनी विवादों का निपटारा करना है और अधिकृत संयुक्त राष्ट्र के अंगों और विशेष एजेंसियों द्वारा उठाए कानूनी प्रश्नों पर राय देना है। अर्थात  इसके दो मुख्य  कर्तव्य हैं: अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार यह कानूनी विवादों पर निर्णय लेता है, दो पक्षों के बीच विवाद पर फैसले सुनाता है और संयुक्त राष्ट्र की इकाइयों के अनुरोध पर परामर्श देता है।

अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय: कार्य प्रक्रिया
अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय की प्राधिकृत भाषाएँ फ्रेंच तथा अंग्रेज़ी है। विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व अभिकर्ता द्वारा होता है, वकीलों की भी सहायता ली जा सकती है। न्यायालय में मामलों की सुनवाई सार्वजनिक रूप से तब तक होती है, जब तक न्यायालय का आदेश अन्यथा न हो। सभी प्रश्नों का निर्णय न्यायाधीशों के बहुमत से होता है। सभापति को निर्णायक मत देने का अधिकार है। न्यायालय का निर्णय अंतिम होता है, उसकी अपील नहीं हो सकती; किंतु कुछ मामलों में पुनर्विचार हो सकता है।


अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय की न्याय प्रक्रिय अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय नियमावली ,1978 के अनुसार चलती है जिसे सितम्बर,2005  में संसोधित किया गया था। अंतत: अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय की न्याय प्रक्रिया काफी जटिल प्रकृति की है। जिसमे न्याय पाने के लिए लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।


अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय एवं भारत


भारत अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय का सदस्य राष्ट्र है। वर्तमान समय में अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालयमें भारत एक महत्वपूर्ण स्थिति रखता है।  भारत के जस्टिस दलवीर भंडारी का  दूसरी बार अतंराष्ट्रीय अदालत के जज बन गए हैं। भंडारी का मुकाबला ब्रिटेन के उम्मीदवार क्रिस्टोफर ग्रीनवुड से था। दलवीर भंडारी को जनरल एसेंबली में 183 मत मिले, जबकि सिक्योरिटी काउंसिल में जस्टिस भंडारी को 15 मत मिले हैं। वर्ष 1945 में स्थापितअंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय  में ऐसा पहली बार हुआ जब इसमें कोई ब्रिटिश न्यायाधीश नहीं होगा।

भारत के जस्टिस दलवीर भंडारी का  दूसरी बार अतंराष्ट्रीय अदालत के जज बनना अंतराष्ट्रीय राजनीति में भारत की स्थिति को और मजबूत बना देता है। वास्तव में अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय के 15 जजों में से पांच का चुनाव हर तीन साल में होता है.इस बार पांच जजों के लिए छह उम्मीदवार थे. कोई भी जज अंतरराष्‍ट्रीय न्यायालय में तभी चुना जा सकता है जब संयुक्त राष्ट्र की महासभा (यूएनजीए) और सुरक्षा परिषद में उसे बहुमत मिले. यह तय करने के लिए यहां गुप्त मतदान की व्यवस्था है।

 

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