1 नवम्बर 1956 को भाषायी आधार पर मध्य प्रदेश का गठन किया गया। मध्य प्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्‍य है। नया राज्‍य छत्तीसगढ़ बनाने के लिए हुए विभाजन के बाद यह अपने वर्तमान स्‍वरूप में 1 नवंबर, 2000 को अस्तित्‍व में आया।भौगोलिक दृष्टि से यह देश में केन्‍द्रीय स्‍थान रखता है। इसकी राजधानी भोपाल है।

मध्य का अर्थ बीच में है, मध्य प्रदेश की भौगोलिक स्थिति भारतवर्ष के मध्य अर्थात बीच में होने के कारण इस प्रदेश का नाम मध्य प्रदेश दिया गया, जो कभी 'मध्य भारत' के नाम से जाना जाता था। मध्य प्रदेश हृदय की तरह देश के ठीक मध्‍य में स्थित है।

मध्‍य प्रदेश: इतिहास
मध्य प्रदेश का इतिहास भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मध्य प्रदेश में भारतीय ऐतिहासिक संस्कृति के अनेक अवशेष, जिनमें पाषाण चित्र और पत्थर व धातु के औज़ार शामिल हैं, नदियों, घाटियों और अन्य इलाक़ों में मिले हैं। वर्तमान मध्य प्रदेश का सबसे प्रारम्भिक अस्तित्वमान राज्य अवंति था, जिसकी राजधानी उज्जैन थी। मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित यह राज्य मौर्य साम्राज्य (चौथी से तीसरी शताब्दी ई. पू.) का अंग था, जो बाद में मालवा के नाम से जाना गया।
 दूसरी शताब्दी ई. पू. से सोलहवीं शताब्दी :  तक मध्य प्रदेश पर पूर्वी मालवा के शासक शुंग (185 से 73 ई. पू.), आंध्र के सातवाहन, पहली या तीसरी शताब्दी ई. पू. से तीसरी शताब्दी तक, क्षत्रप दूसरी से चौथी शताब्दी तक, नाग दूसरी से चौथी शताब्दी ने राज्य किया। मध्य प्रदेश की नर्मदा नदी के उत्तर में गुप्त साम्राज्य का शासन था। यह हूणों और कलचुरियों के सत्ता संघर्ष का स्थल रहा, बाद में मालवा पर कलचुरियों ने कुछ समय के लिए अधिकार किया। छठी शताब्दी के में उत्तरी भारत के शासक हर्ष ने मालवा पर अधिकार कर लिया। 10वीं शताब्दी में कलचुरी फिर शक्तिशाली हो गए। उनके समकालीन थे - धार के परमार, ग्वालियर में कछवाहा और झाँसी से 160 किलोमीटर दक्षिण—पश्चिम में खजुराहो में चंदेल। बाद में तोमरों ने ग्वालियर और जनजातीय गोंडों ने शासन किया। 11वीं शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण शुरू हुए। ग्वालियर की हिन्दू रियासत को 1231 में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने दिल्ली में मिला लिया। 14वीं शताब्दी में ख़िलजी सुल्तानों ने मालवा को बरबाद किया। इसके बाद मुग़ल शासक अकबर (1556-1605) ने इसे मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया। 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मराठा शक्ति ने मालवा पर अधिकार किया और 1760 तक एक बड़ा भूभाग, जो अब मध्य प्रदेश है, मराठों के शासन में आ गया। 1761 में पेशवा की पराजय के साथ ही ग्वालियर में सिंधिया और दक्षिण-पश्चिम में इंदौर में होल्कर राजवंश का शासन स्थापित हुआ।

मध्‍य प्रदेश: भौगोलिक संरचना
मध्य प्रदेश भारत का सबसे विशाल राज्यो में से एक  है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 10 प्रतिशत, 3,08,000 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक में फैला हुआ है। छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए इसके उत्तरी ज़िलों को अलग करने के बाद मध्य प्रदेश की राजनीतिक सीमा का वर्ष 2000 में पुन:निर्धारण किया गया। यह प्रदेश चारों तरफ से उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, बिहार और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से घिरा हुआ है।

भूसंरचना
मध्‍य प्रदेश 30, 8,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल के साथ भारत का दूसरा बड़ा राज्य है।मध्य प्रदेश 100 से 1200 मीटर की ऊँचाई पर है। राज्य के उत्तरी भाग की भूमि उत्तर की ओर उठती है। दक्षिणी भाग पश्चिम की ओर ऊपर उठता है। पर्वत शृंखलाओं में पश्चिम व उत्तर में 457 मीटर तक ऊँची विंध्य व कैमूर पर्वत शृंखला और दक्षिण में 914 मीटर से भी अधिक ऊँची सतपुड़ा व महादेव पर्वत शृंखलाएँ हैं। दक्षिण-मध्य प्रदेश में पंचमढ़ी के समीप स्थित धूपगढ़ शिखर (1350 मीटर) राज्य का सबसे ऊँचा शिखर है। विंध्य पर्वत शृंखला के पश्चिमोत्तर में मालवा का पठार (लगभग 457 से 609 मीटर) है। मालवा का पठार विध्य पर्वत शृंखला से उत्तर की ओर है। मालवा के पठार के पूर्व में बुंदेलखंड का पठार स्थित है, जो उत्तर प्रदेश के गंगा के मैदान में जाकर मिल जाता है।

जलवायु
मध्य प्रदेश की जलवायु मानसून पर निर्भर करती है। ग्रीष्म ऋतु गर्म व शुष्क होती है और गर्म हवाएँ चलती हैं। राज्य का औसत तापमान 29 डिग्री से. रहता है। कुछ भागों में तापमान 48 डिग्री से. तक पहुँच जाता है। सर्दियाँ खुशनुमा और शुष्क होती हैं। दिसम्बर और जनवरी में समुचित वर्षा होती है, जिसका सम्बन्ध राज्य के पश्चिमोत्तर भाग में होने वाले उष्णकटिबंधीय विक्षोभ से है। औसत वर्षिक वर्षा 1,117 मिमी होती है। सामान्यतः पश्चिम और उत्तर की ओर वर्षा की मात्रा 60 इंच, पूर्व में इससे अधिक और पश्चिम में 32 इंच तक घटती जाती है। चंबल घाटी में हर साल वर्षा का औसत 30 इंच से कम रहता है।

वन संपदा
मध्य प्रदेश के कुछ ही प्रतिशत हिस्से में स्थायी चारागाह या घास के मैदान हैं। प्रमुख वन क्षेत्रों में विंध्य पर्वत शृंखला, कैमूर की पहाड़ियाँ, सतपुड़ा पर्वत शृंखला, बघेलखंड का पठार और दंडकारण्य क्षेत्र शामिल है। महत्त्वपूर्ण वृक्ष सागौन, साल, बाँस, सलाई एवं तेंदूपत्ता हैं। सलाई से निकलने वाला लीसा अगरबत्ती और औषधि बनाने के काम आता है। तेंदू के पत्ते बीड़ी बनाने के काम आते हैं, जिसके प्रसिद्ध केन्द्र जबलपुर और सागर हैं। जंगलों में जंगली पशु भरे पड़े हैं। जैसे बाघ, तेंदुआ, जंगली साँड़, चीतल, भालू, जंगली भैंसा, सांभर और काला हिरन। पक्षियों की भी बहुत सी प्रजातियाँ यहाँ पर हैं।

राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य
राज्य में अनेक राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य है।
1 कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
2 माधव नेशनल उद्यान
3 पन्‍ना नेशनल उद्यान
4 करेरा पक्षी अभयारण्‍य
5 बोरी वन्‍य जीवन अभयारण्‍य
6 चंबल अभयारण्य

वनों की सुरक्षा और विकास के लिए, राज्य सरकार ने बहुत सी वन समितियाँ आसपास के ग्रामीणों को साझेदारों के तौर पर जोड़ने के लिए गठित की है।

मध्‍य प्रदेश: अर्थव्यवस्था
कृषि
राजस्थान और उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर 'चंबल' राज्य की उत्तरी सीमा बनाता है। इसकी घाटी की भूमि ऊबड़ - खाबड़ है। मध्य प्रदेश की मिट्टी को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
काली मिट्टी- यह मालवा के पठार के दक्षिणी भाग, नर्मदा घाटी और सतपुड़ा के कुछ भागों में मिलती है। इसमें चिकनी मिट्टी का कुछ अंश रहता है, भारी वर्षा या बाढ़ के पानी से सिंचाई से काली मिट्टी जलावरुद्ध हो जाती है।
लाल-पीली मिट्टी- इसमें कुछ मात्रा बालू की रहती है। यह शेष मध्य प्रदेश में पाई जाती है।

कृषि राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था का मुख्य आधार है। राज्‍य की 74.73 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और खेती पर ही निर्भर है। राज्‍य की लगभग 49 प्रतिशत ज़मीन खेती योग्‍य है। 2004-2005 में शुद्ध बुवाई क्षेत्र 1247 लाख हेक्‍टेयर के लगभग था और अनाज का कुल उत्‍पादन 14.10 करोड़ मीट्रिक टन रहा। गेहूँ, चावल, दलहन जैसी प्रमुख फ़सलों का उत्‍पादन भी अच्‍छा रहा। 20 ज़िलों में 'राष्‍ट्रीय बागवानी मिशन' क्रियान्वित किया गया है। बाग़वानी और खाद्य प्रसंस्‍करण विभाग नाम से अलग विभाग का गठन किया गया है। कृषि योग्य भूमि चंबल, मालवा का पठार और रेवा के पठार में मिलती हैं। नदी द्वारा बहाकर लाई गई जलोढ़ मिट्टी से ढकी नर्मदा घाटी उपजाऊ इलाक़ा है। मध्य प्रदेश की कृषि की विशेषता कृषि की परम्परागत पद्धति का उपयोग है। कृषि योग्य भूमि का केवल 15 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, राज्य की कृषि वर्षा पर निर्भर है और बहुधा कृषकों को सूखे व लाल-पीली मिट्टी के कारण नमी की कम मात्रा का सामना करना पड़ता है। मध्य प्रदेश में होने वाली सिंचाई मुख्यतः नहरों, कुओं, गाँवों के तालाबों और झीलों से होती है।
प्रमुख फ़सलें चावल, गेहूँ, ज्वार, दलहन (चना, सेम और मसूर जैसी फलियाँ) और मूँगफली हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में मुख्यतः चावल उगाया जाता है। पश्चिमी मध्य प्रदेश में गेहूँ और ज्वार अधिक होता है। अन्य फ़सलों में अलसी, तिल, गन्ना और पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जाने वाला ज्वार-बाजरा प्रमुख है। राज्य अफ़ीम, मंदसौर ज़िले में और मारिजुआना, दक्षिणी-पश्चिमी खांडवा ज़िले में, का उत्पादक राज्य है। मध्य प्रदेश में पशु पालन और कुक्कुट पालन महत्त्वपूर्ण हैं। देश के कुल पशुधन (गाय, भैंस और भेड़ और सूअर) का लगभग सातवां भाग इस राज्य में है।

उद्योग और खनिज
मध्‍य प्रदेश ने इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, दूरसंचार, मोटरवाहनों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि उच्‍च तकनीकी उद्योगों के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। दूरसंचार प्रणालियों के लिए यह राज्‍य ऑप्टिकल फाइबर का उत्‍पादन कर रहा है। इंदौर के पास पीठमपुर में बडी संख्‍या में मोटर वाहन उद्योग स्‍थापित हुए है। राज्‍य में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख उद्योग है - भोपाल में 'भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्‍स लि.', होशंगाबाद में 'सिक्‍योरिटी पेपर मिल', देवास में नोट छापने की प्रेस, नेपानगर में अख़बारी काग़ज़ की मिल और नीमच की अल्‍कालॉयड फैक्‍ट्री।
 खनिज उत्‍पादन के क्षेत्र में राज्‍य का विशिष्‍ट स्‍थान है। वर्ष 2005-06 में 5312.65 करोड़ रुपये के खनिजों का उत्‍पादन हुआ। राज्‍य में 21 तरह के खनिज निकाले जाते हैं। 2006 में डोलोमाइट का उत्‍पादन 128 हज़ार मीट्रिक टन, हीरे का उत्‍पादन 44149 हज़ार कैरेट और चूना पत्‍थर का 25865 हज़ार मीट्रिक टन, बॉक्‍साइट का उत्‍पादन 87 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन, ताम्र अयस्‍क का उत्‍पादन 1706 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन और कोयले का उत्‍पादन 54000 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन रहा। यह राज्‍य चंदेरी और माहेश्‍वर के पारंपरिक हस्‍तशिल्‍प और हथकरघे से बने कपड़ों के लिए प्रसिद्ध है। मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले में अवस्थित हिंगलाजगढ़ परमार मूर्तिकला के विशिष्ट केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है।

मध्‍य प्रदेश:सांस्कृतिक जीवन
मध्य प्रदेश में अनेक मन्दिर, क़िले व गुफ़ाएँ हैं, जिनमें क्षेत्र के पूर्व इतिहास और स्थानीय राजवंशों व राज्यों, दोनों के ऐतिहासिक अध्ययन की दृष्टि से रोमांचक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ के प्रारम्भिक स्मारकों में से एक सतना के पास भरहुत का स्तूप (लगभग 175 ई.पू.) है, जिसके अवशेष अब कोलकाता के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखे हैं। ऐसे ही एक स्मारक, साँची के स्तूप (विदिशा से लगभग 13 किमी. दक्षिण-पश्चिम में) को मूलत: 265 से 238 ई.पू. में सम्राट अशोक ने बनवाया था। बाद में शुंग राजाओं ने इस स्तूप में और भी काम करवाया। बौद्ध विषयों पर आधारित चित्रों से सुसज्जित महू के समीप स्थित बाघ गुफ़ाएँ विशेषकर उल्लेखनीय हैं। विदिशा के समीप उदयगिरि की गुफ़ाएँ (बौद्ध और जैन मठ) चट्टान काटकर बनाए गए वास्तुशिल्प और कला का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
खजुराहो के मन्दिर:शृंगारिक कला के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध खजुराहो के मन्दिर राज्य के उत्तर में छतरपुर ज़िले में स्थित हैं; 1000 ई. से बनना शुरू हुए इन मन्दिरों का निर्माण चन्देल राजाओं ने करवाया था। ग्वालियर और उसके आसपास के मन्दिर भी उल्लेखनीय हैं। मांडू (धार के समीप) के महल और मस्जिद, 14वीं शताब्दी में निर्मित बांधवगढ़ का अदभुत क़िला और सम्भवत: मध्य प्रदेश के भूतपूर्व कुंवरों के आवासों में सबसे शानदार ग्वालियर का क़िला वास्तुशिल्पीय उपलब्धियों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य उल्लेखनीय उदाहरण हैं। यद्यपि मध्य प्रदेश के लोगों ने बाहरी प्रभावों को कमोबेश ग्रहण किया है लेकिन उनकी कई जनजातीय परम्पराएँ जीवंत तथा सशक्त बनी हुई हैं, और जनजातीय मिथकों व लोककथाओं को बड़ी संख्या में सुरक्षित रखा गया है। प्रधान (गोंडों के भाट) अब भी गोंड जनजाति के पौराणिक आदि पुरुष लिंगो-पेन की अनुश्रुत वीर गाथाओं को गाते हैं। महाभारत की समतुल्य गोंडों की पंडवानी है, जबकि रामायण का गोंड समतुल्य लछमनजति दंतकथा है। अपने मूल के सम्बन्ध में हर जनजाति के अपने मिथक और दंतकथाएँ हैं। इनके अपने जन्मोत्सव तथा विवाह के गीत हैं, और विभिन्न नृत्य शैलियों की संगत उनके गानों के की जाती है। लोककथाएँ, पहेलियाँ और लोकोक्तियाँ इनकी सांस्कृतिक विरासत की विशेषताएँ हैं।

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