कैसे दोगुनी होगी आय?

स्रोत: द्वारा आनन्द किशोर: राष्ट्रीय सहारा

बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि उनकी सरकार का हर काम एवं प्रत्येक योजना के केंद्र में गांव, गरीब और किसान होते हैं। उन्होंने ग्रामीण सड़कों के लिए वित्तीय वर्ष 2019-20 में 19 हजार करोड़ खर्च करने, सोलर ऊर्जा और कृषि कचरे का उपयोग कर किसानों को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाने, रसोईघर को विलायती खाद्य तेलों से मुक्ति दिलाने को प्राथमिकता देने और जीरो बजट खेती जैसे सुंदर विचारों को परोसते हुए किसानों की आय दोगुनी करने का भरोसा दिलाया है।

कृषि बजट में 2018-19 के संशोधित बजट आवंटन 75752.13 करोड़ रुपये की तुलना में वृद्धि कर 138560.97 करोड़ की गई है। कृषि के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण सिंचाई मद में 2018-19 के संशोधित बजट अनुमान 8251 करोड़ में मामूली वृद्धि कर 2019-20 में 9682 करोड़ की गई। इसी प्रकार, फसल बीमा योजना से सभी किसानों को जोड़ने और सुखाड़ की भयावहता को देखते हुए फसल बीमा योजना में पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान 13976 करोड़ से मात्र 24 करोड़ बढ़ाकर 14000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी किसान सम्मान योजना मद में 75,000 करोड़ रुपये के प्रावधान का ऐलान विगत अंतरिम बजट में ही किया गया था, जिसमें कोई वृद्धि नहीं की गई है, जबकि केंद्र सरकार के प्रथम कैबिनेट में ही सभी किसानों को किसान सम्मान योजना के तहत जोड़ने का ऐलान किया गया है, जो संख्या 12 करोड़ से बढ़कर करीब 14 करोड़ किसानों का होगा। इससे सभी किसानों को किसान सम्मान योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा। बजट में सभी कैटेगरी के किसानों को जोड़कर राशि का आवंटन नहीं किया गया है।

आम बजट से किसानों को बड़ी उम्मीदें थीं, क्योंकि किसानों ने बगैर आगे-पीछे देखे अपने वोटों से मोदी जी की थैली भर दी थी परन्तु बजट ने उन्हें निराश किया है। देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुखाड़ की है, जिससे सर्वाधिक परेशान किसान ही होते हैं। उस गरीब किसान के पास साधन की कमी होती है मगर समस्या पीने के पानी और प्यासी धरती के सिंचाई की भी रहती है। वित्त मंत्री ने सुखाड़ पर चुप्पी साध ली और सिंचाई पर आवंटन मामूली बढ़ाया।

सिंचाई पर दिए गए आवंटन से कृषि क्षेत्र में सिंचाई के विस्तार की बात दूर लंबित परियोजनाओं के पूरा होने पर विशेषज्ञ संदेह व्यक्त कर रहे हैं। इसी प्रकार, सूखा की भयावह स्थिति और बाढ़ सुखाड़ दोनों की समस्याओं से जूझ रहे किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाने के लिए सभी किसानों और संपूर्ण कृषि क्षेत्र तक फसल बीमा की पहुंच बढ़ाने और लाभ दिलाने की दिशा में बजट में समुचित आवंटन नहीं दिया गया है। अभी तक फसल बीमा से करीब 27 फीसद किसान और 28 फीसद क्षेत्र ही जुड़ सके हैं।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना से नई सरकार ने सभी किसानों को जोड़ने का सराहनीय कार्य अवश्य किया है, लेकिन उससे बटाईदारों को वंचित रखा गया है। किसान सम्मान योजना के तहत 5 सौ रुपये मासिक को बढ़ाने की भी मांग किसान नेताओं और उद्योग जगत के संगठनों द्वारा भी की गई थी, जिसका वित्त मंत्री ने अनदेखी कर दी। किसान नेताओं का मानना है कि 500 रुपये मासिक के ऐलान से पूर्व डीएपी उर्वरक की कीमत में 4 सौ रुपये बैग की बढ़ोतरी कर दी गई थी, डीजल की कीमत 10 से 20 रुपये लीटर बढ़ने से खेती के सभी साधनों के मूल्य बढ़ गए।

बिजली और मजदूरी दर बढ़ी। इस सबके बावजूद सरकार स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा के आलोक में फसल का मूल्य तय नहीं किया, जो भी एमएसपी तय किया उस पर सरकारी खरीद नहीं हुई। किसान-मजदूर 350 और 400 रुपये क्विंटल कम पर धान गेहूं बेचने को विवश हुए। आंकड़े बताते हैं कि कृषि उत्पाद के सरकारी खरीद की पहुंच महज 30 फीसद किसानों तक ही है। इस प्रकार किसान सम्मान योजना की राशि किसानों के लिए तब तक उपयोगी नहीं बनेगी, जब तक उसे किसानों की आय और जीवनयापन से न जोड़ा जाए।

तेलंगाना सरकार ने इस दिशा में कुछ अच्छा प्रयास जरूर किया है। किसानों के खेती की लागत घटाने के लिए उर्वरकों, कृषि यंत्रों, कीटनाशकों, बिजली दरों पर किसानों को और राहत और मनरेगा से खेती को जोड़कर मजदूरों की मजदूरी की राशि किसानों और सरकार दोनों स्तर से भुगतान कर मजदूरों का पलायन रोकने, कृषि अनुसंधान पर जोर देकर प्राकृतिक आपदा के अनुकूल खेती के लिए बीजों के उत्पादन और अन्य शोध के कार्य पर भी बजट में कुछ नहीं है फिर किसानों की लागत घटेगी नहीं। कृषि विकास दर बढ़ेगी नहीं तो आय दोगुनी करने का वायदा जुमला बनकर रह जाएगा।

वित्त मंत्री ने यह भी नहीं बताया कि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए विगत तीन वर्षो की क्या उपलब्धि है? वित्त मंत्री ने आम बजट पेश करते हुए सरकार द्वारा जीरो बजट फार्मिग के लिए किसानों को प्रोत्साहित किए जाने का ऐलान किया। उनके अनुसार इस तकनीक से जहां कृषि लागत कम होगी वहीं किसानों की आय दोगुनी करने में भी मदद मिलेगी। जीरो बजट फार्मिग से खेती की लागत और जोखिम कम करने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं से बचाने में मदद मिलती है।

इस खेती में जुताई, दौनी बैलों और अन्य कार्य देसी गाय के माध्यम से ही संभव है। डीजल की जरूरत नहीं होगी। ईधन से संचालित साधनों की जरूरत नहीं होगी। आज भारत के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक सहित देश के कुछ क्षेत्रों में जीरो बजट खेती की जा रही है परंतु सरकार कोई कार्ययोजना तो बनाए। जीरो बजट खेती में उत्पादन कम होता है। आज की तारीख में सरकार यह ऐलान करेगी कि हम कम फसल उत्पादन का रिस्क लेने को तैयार हैं? मशीनीकरण और रासायनिक उर्वरकों के खेती से जुड़ने के चलते एक तो किसानों को उत्पादन ज्यादा मिलता है, दूसरे मशीनीकरण के चलते किसान बैल रखना छोड़ चुके हैं, देसी गायपालन बंद कर चुके हैं।

जीरो बजट खेती के लिए उसे एकबारगी बैल और देसी गाय पर भारी पूंजी निवेश करने की जरूरत होगी। सरकार द्वारा कर्जमुक्ति नहीं किए जाने से किसान कर्ज में पहले से ही दबा हुआ है। इसके अतिरिक्त सिंचाई की व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है, जबकि पानी के स्तर के नीचे गिरने से और नदी-पोखर के सूखने से सिंचाई पर खर्च बढ़ रहा है। फिर जीरो बजट खेती के उत्पाद की मार्केटिंग का सवाल खड़ा होगा। इन बिंदुओं पर अभी तक सरकार का कोई परीक्षण भी नहीं हुआ है। फिर यह आय दोगुना करने मे कैसे सहायक हो सकेगा?

 

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जनता के विवेक पर रखें भरोसा

स्रोत: द्वारा प्रेम कुमार मणि: राष्ट्रीय सहारा

भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक को तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सम्बोधित करते हुए 11 दिसम्बर 1946 को कहा था- ‘‘यह सभा कोई क्रांतिकारी सभा नहीं है।’ उन्होंने उम्मीद जतलाई थी कि भविष्य में अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा बेहतर तरीके से विधान निर्माण करेगी। नेहरू का गुस्सा अकारण नहीं था। वह संविधान सभा केवल ग्यारह फीसद भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रही थी। तब हर बालिग को वोट का अधिकार नहीं था। वोटर होने की कुछ शतरे थीं, जिनमें किसानों और मजदूर वगरे का प्रतिनिधित्व कम होता था। वह बड़े लोगों की सभा थी, जिसमें मुख्य रूप से जमींदार तबके का बोलबाला था।

मुस्लिम लीग ने तो संविधान सभा की बैठकों में हिस्सा ही नहीं लिया। 1948 में कांग्रेस से समाजवादियों के अलगाव के साथ ही 12 सोशलिस्ट सदस्यों ने एक साथ इस्तीफा कर दिया। उपचुनाव में सब के सब हार भी गए। इस तरह सोशलिस्टों का भी अभाव हो गया। देश के बंटवारे के बाद, बदली हुई स्थितियों में, डॉ आम्बेडकर की सदस्यता खत्म हो गई, क्योंकि वह मुस्लिम लीग के सहयोग से उस इलाके से जीत कर आए थे, जो अब पाकिस्तान (पूर्वी) का हिस्सा था।

जयकर को इस्तीफा दिलवा कर रिक्त स्थान पर आम्बेडकर का मनोनयन हुआ और इस तरह फिर संविधान सभा से वह जुड़े। हम सब जानते हैं किस तरह उन्होंने प्रारूप समिति के अध्यक्ष की हैसियत से संविधान का ढांचा तैयार किया। लेकिन सभा में उनकी बहुत चलती थी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस व्यथा को 1953 में उन्होंने व्यक्त किया है। कुल मिला कर संविधान सभा पर कांग्रेस के दक्षिणपंथी धड़े का प्रभाव था, लेकिन कांग्रेस के जो बूढ़े नेता थे, वे गांधी से खूब प्रभावित थे और उत्तर गांधी का जो वैचारिक रु ख था वह किसी से छुपा नहीं था।

गांधी उदार और जिम्मेदार लोकतंत्र के समर्थक थे। उनके हिसाब से लोकतंत्र बहुमत की तानाशाही और मनमानी नहीं है। जो पराजित हो गए हैं, जो कम संख्या में हैं, जो कमजोर हैं, गांधी के अनुसार वे दया के पात्र नहीं हैं। बहुमत का दायित्व है कि उन्हें बराबरी का हक दे। हालांकि गांधी स्वयं उस सभा में नहीं थे, लेकिन अधिकांश सदस्यों पर अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से उन्होंने अल्पसंख्यकों, दलितों और समाज के अन्य कमजोर तबकों के प्रति संविधान सभा को जिम्मेदार बनाया। सविधान निर्माण के दरम्यान ही गांधी की हत्या हो गई। इसने उनके विचारों को कुछ समय के लिए लोगों के दिलों पर रेखांकित कर दिया था।

इस तरह अनुपस्थित गांधी का व्यक्तित्व संविधान-सभा पर हावी रहा। नेहरू प्रधनमंत्री थे और आंबेडकर 1948 में कानून मंत्री हो गए थे। इन दोनों की आस्था गांधी में उतनी नहीं थी, जितनी पश्चिमी लोकतंत्र के उदात मूल्यों में। दोनों पश्चिम से प्रभावित थे, लेकिन दोनों की सांस्कृतिक जड़ें पूरब में थीं। सबसे बड़ी बात हुई कि हर वयस्क, जिसकी उम्र सीमा तब इक्कीस मानी गई थी, को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार का अधिकार मिला। सामाजिक-आर्थिक आजादी भले ही वायदे के रूप में था, लेकिन राजनीतिक आजादी तुरंत मिल गई थी।

इसी आधार पर 1952 का आम चुनाव हुआ। तब मुश्किल से पंद्रह फीसद लोग साक्षर थे, शिक्षित तो और कम थे। इतनी बड़ी अनपढ़-अशिक्षित आबादी को लेकर लोकतंत्र का खड़ा होना एक आश्र्चय से कम नहीं था। यह आश्र्चय भारत में हुआ। यूरोप के तमाम एशिया- उत्सुक लोग हैरान थे। कहा जा रहा था भारत में लोकतंत्र नहीं टिकेगा। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारतीयों को कुछ अधिक ही जाहिल समझ लिया था। सब के होश ठिकाने लग गए। पूरे भारत ने झूम कर मतदान में हिस्सा लिया। चुनाव को लोगों ने त्यौहार की तरह पसंद किया इसके मजे लिये।

कुछ ही समय बाद, वर्ष 1954 में ब्रिटश इतिहासकार एएल. बाशम की भारतीय इतिहास पर आई किताब का नाम था- वंडर दैट वाज इंडिया। बाशम के मन में इस वंडर का ख्याल संभवत: इस चुनाव को देख कर ही आया होगा। 1957 और 1962 के बाद 1967 का चुनाव जब हुआ तब भारतीय मतदाताओं ने आठ राज्यों में कांग्रेस सरकारों को बहुमत से दूर रखा। 1971 में हुए मध्यावधि चुनाव में भारतीय मतदाताओं ने समाजवादी अंगड़ाई दिखलाई और 1977 में लड़खड़ाते लोकतंत्र को सम्भाल लिया। तब लोगों ने कहा था कि भारत की अनपढ़ जनता ने लोकतंत्र की हिफाजत की है।

कवि रघुवीर सहाय का तो यह भी कहना था कि यहां की अनपढ़ जनता ने पढ़े-लिखे लोगों को आजादी दिलाई है। इसलिए हम नहीं कह सकते कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हैं। जो लोग यह कहते हैं कि इस या उस पक्ष के पास कोई जानदार, ओजस्वी और स्वीकृत नेतृत्व नहीं है, वे अपने निकट इतिहास से भी अनिवज्ञ हैं। 1977 में कोई नेता तय नहीं था। आनन-फानन में चुनाव हुए थे। जनवरी की 17 तारीख को जब इंदिरा गांधी ने चुनावों की घोषणा की तब विपक्ष के सभी बड़े नेता जेल में थे। इमरजेंसी हटाए बिना ही चुनाव कराए गए थे। जेपी हताश थे।

यदि कुलदीप नैय्यर की मानें तब, जेपी दिल्ली इसलिए गए थे कि चुनाव बहिष्कार की घोषणा कर सकें। दिल्ली में बुद्धिजीवियों के एक जमावड़े ने उन्हें उत्साहित किया। वह तन कर खड़े हुए। ठीक दो महीने बाद 24 मार्च को इंदिरा गांधी की विदाई हो चुकी थी। अपराजेय दिखने वाली इंदिरा गांधी लोकतंत्र की बौछार से भीगी बिल्ली बन चुकी थी। यह भारतीय मतदाताओं का दमखम था। इन्हीं मतदाताओं ने उन्हें 1971 में माथे पर बैठाया था। भारतीय मतदाता जब ठान लेता है कि इसे हटाना है, तब यह नहीं सोचता कि किसे लाना है। हम इसी परिप्रेक्ष्य में आज का चुनाव देख रहे हैं।

अगले 19 मई को मतदान खत्म हो जाएंगे। 23 मई को नतीजे भी आ जाएंगे। हमें धैर्यपूर्वक जनता के विवेक पर भरोसा करना चाहिए। भारतीय मतदाता न धन की बात सुनता है, न हंगामे को पसंद करता है। अच्छे और बुरे का अंतर करना उसे आता है। कौन धोखा देने वाला है और कौन सच्चा; यह उसे बतलाना नहीं पड़ता। भारत में जाति भी है और धर्म भी। कभी-कभार इनसे उठे गर्द-गुबार किसी को कुछ समय के लिए परेशान कर सकते हैं, लेकिन अंतत: हर दफा सच्चाई की जीत होती है। इस दफा भी सच्चाई की जीत होगी, जनता की जीत होगी।

 

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नये भारत का गेम-चेंजर

स्रोत: द्वारा राजीव सिंह: राष्ट्रीय सहारा

सभी की आंखें 2019 के केंद्रीय बजट पर लगी थीं क्योंकि शानदार जीत हासिल करके सत्तारूढ़ हुई मोदी-2 सरकार का प्रथम बजट था, और इसने निराश नहीं किया। देश की प्रथम पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री अपना पहला बजट पेश करते समय एकाउंटेंट की बजाय राष्ट्र निर्माता की भूमिका में ज्यादा दिखीं। उनके बजट में भविष्योन्मुखी योजनाओं और विकासात्मक रणनीति के माध्यम से नये भारत के निर्माण का संकल्प दिखता है।

मोदीनॉमिक्स ने भारत को महाशक्ति बनाने के सपने को मूर्ताकार करने के लिए विवेकशील पथ चुना है। भारत को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में पचपन वर्ष लगे और मोदी-एक ने इसमें पांच वर्ष के कार्यकाल में एक ट्रिलियन और का इजाफा कर लिया। अब मोदी-दो सरकार ने ऐसा मंसूबा बांधा है, जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा तक न था। मोदी-दो सरकार आने वाले पांच वर्षो में अर्थव्यवस्था के आकार में 2.3 ट्रिलियन डॉलर बढ़ोतरी करने का लक्ष्य हासिल करना चाहती है ताकि भारत पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था वाले देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो सके।

यकीनन सफर आसान नहीं होगा और रास्ता सुगम नहीं है। लेकिन भारत की वित्त मंत्री ने यह लक्ष्य हासिल करने का व्यवहार्य रास्ता अपनाया है। वित्त मंत्री द्वारा चाणक्य नीति को उद्धृत किया जाना-‘‘संकल्पबद्ध मानव प्रयासों से कार्य यकीनन पूरा होगा ही’-वाकई में माकूल है। प्रत्येक वर्ग के लोगों पर तवज्जो देने वाला यह समावेशी बजट है, जिसमें अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार, वित्तीय क्षेत्रमें विास बहाली, डिजिटल इंडिया, रेलवे एवं ढांचागत क्षेत्र में भविष्य की जरूरतों के मद्देनजर आवंटन तथा राजकोषीय अनुशासन बजट में दिखते हैं, जो संकेत हैं कि सरकार भावी पीढ़ियों के लिए जीवंत अर्थव्यवस्था बनाने के रास्ते पर चल पड़ी है। अनेक महत्त्वपूर्ण उद्योगों के लिए मांग आवासन क्षेत्र से निकलती है। किफायती आवास क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने आवास निर्माताओं को लाभ पर टैक्स होलिडे की घोषणा की है।

इस क्षेत्र को और प्रोत्साहन के लिए 45 लाख रुपये तक का आवास लेने पर ऋण पर ब्याज में डेढ़ लाख रुपये तक की अतिरिक्त कटौती की घोषणा की गई है। सरकार प्रमुख पहल के रूप में केंद्रीय मंत्रालयों और केंद्र के सार्वजनिक उपक्रमों के पास पड़ी जमीन पर सार्वजनिक सुविधाएं तथा किफायती आवास परियोजनाएं क्रियान्वित करेगी। अर्थव्यवस्था के समग्र विकास में माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस तय के दृष्टिगत सरकार ने इस क्षेत्र के नकदी का प्रवाह सुनिश्चित करने के पर्याप्त उपाय किए हैं।

नये/इंक्रीमेंटल ऋण पर ब्याज में 2 प्रतिशत अनुदान तथा 25 प्रतिशत की कम कर दर अनुम्य बनाने के लिए कारोबारी सीमा बढ़ाया जाना सही दिशा में उठाया गया कदम है। एमएमएमई के लिए ज्यादा वित्त व्यवस्था के लिए भागीदार बढ़ाने खासकर टीआरईडीएस (ट्रेड रिसीवेबल डिककाउंटिंग सिस्टम) प्लेटफॉर्म पर एनबीएफसी-फैक्टर के रूप में अपंजीकृत एनबीएफसी को शामिल करने की योजना है।

आगामी पांच वर्षो में जीडीपी में आठ प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करके ही पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। इस वृद्धि दर को हासिल करने के लिए सालाना जीडीपी का करीब 7-8 प्रतिशत आंवटन ढांचागत क्षेत्रके लिए किया जाना आवश्यक है। ढांचागत क्षेत्र पर 100 ट्रिलियन रुपये का आवंटन किए जाने से आर्थिक वृद्धि मजबूत होगी और नतीजतन रोजगार सृजन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भारतमाला, सागरमाला, रेलवे के अत्याधुनिकरण और उड़ान जैसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों को जारी रखने और इनमें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मोड अपनाने की मंशा का इन क्षेत्रों का कायाकल्प हो जाने वाला है।

बैंकों की बैलेंस शीट को मजबूत करने तथा ऋण प्रवाह बढ़ाने के लिए सरकार सार्वजनिक बैंकों के लिए 70 हजार करोड़ रुपये मुहैया कराएगी। बैंकों को इतना पैसा मिलने की उम्मीद नहीं थी। एनबीएफसी क्षेत्र में नकदी के प्रवाह का संकट दूर करने के लिए सरकार ने एनबीएफसी के लिए क्रेडिट गारंटी स्कीम आरंभ की। सरकार ने चालू वर्ष के लिए 1.05 लाख करोड़ रुपये के विनिवेशीकरण का लक्ष्य रखा है। इस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के साथ ही आश्वासन दिया है कि सार्वजनिक उपक्रमों में वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत के स्तर पर बनाए रखेगी।

सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य सरकारी परिव्यय के वित्त पोषण के लिए बाह्य ऋणों का इस्तेमाल कर सकती है। विदेशी मुद्रा में ये ऋण प्राप्त होंगे और हमारा मानना है कि इससे घरेलू पूंजीगत लागत को कम करने की दिशा में यह सकारात्मक कदम होगा जिससे बैंकों में एसएलआर के रूप में पड़े रहने वाले ट्रिलियन रुपयों का इस्तेमाल हो सकेगा। वन नेशन वन ग्रिड की अवधारणा के तहत ऊर्जा, गैस, जल, हाइवे और वायुमागरे के बीच समन्वय का मंसूबा पूरा किया जाना ही नये भारत की आकांक्षा में झलकता है।

भूमिगत जल के गिरते स्तर, पिघलते ग्लेशियर, प्रदूषित होतीं नदियों और दिनोंदिन गायब होतीं झीलों के मद्देनजर सरकार ने इस बजट में महत्त्वपूर्ण उपायों की घोषणा की है ताकि जल संरक्षण की दिशा में सहायता मिल सके। यह एक सराहनीय पहल है। अलबत्ता, कुछ चूक भी रहीं। स्पेशल एडिश्नल एक्साइज ड्यूटी लेवी तथा रोड एवं इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को इस क्रम में गिनाया जा सकता है। इसी प्रकार, बेशकीमती धातुओं और सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया है। इससे आम जन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

बहरहाल, तमाम कमियों के बावजूद बजट अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को मजबूती देगा। इसमें नये भारत की झलक मिलती है। वित्त मंत्री के बजट प्रस्तावों के पीछे मंशा है कि निवेश चक्र में तेजी आए। ढांचागत विकास को गति मिले, विदेशी पूंजी को ज्यादा से ज्यादा आकर्षित किया जा सके। डिटिजल इंडिया की पहलों की दिशा में उत्तरोत्तर बढ़त मिले। हमारे शैक्षणिक संस्थान विश्वस्तरीय बन सकें। कारोबारी सुगमता के लिहाज से हमने अभी तक खासी अच्छा प्रदर्शन किया है, और बजट में कोशिश दिखी कि यह सिलसिला और भी मजबूती से आगे बढ़े। वित्तीय घाटे से समझौता किए बिना वास्तव में यह गेम-चेंजर बजट है।

 

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बस्ते से आगे का बोझ

स्रोत: द्वारा डा. ललित कुमार: राष्ट्रीय सहारा

बस्ते के भार से अधिक महत्त्वपूर्ण विद्यार्थियों के बोझ को कम करना है, जो तभी संभव है जब शिक्षा की प्रकृति न केवल समावेशी हो, बल्कि सर्वागीण भी हो। तात्पर्य शिक्षण में ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक क्रिया-कलापों को एक संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। शिक्षा से शारीरिक अथवा क्रियात्मक तथा भावात्मक विकास भी करना ही होगा, क्योंकि शिक्षा सिर्फ ज्ञानात्मक पक्ष के विकास तक सीमित नहीं हो सकती। गांधी ने शिक्षा के माध्यम से लोगों के ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक विकास की बात कही है

बजट भाषण के दौरान किये संकल्प को मूर्त रूप देने के प्रयास के क्रम में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने एकलव्य आवासीय विद्यालय को खोलने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। पचास फीसद से अधिक आदिवासी आबादी वाले हर प्रखंड में ऐसे विद्यालयों को खोलने की योजना है, जहां कम से कम बीस हजार आदिवासी निवास करते हैं। एकलव्य आवासीय विद्यालय समावेशी विद्यालयी शिक्षा के विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है।

समावेशी विद्यालयी शिक्षा को गति देने के लिए अन्य पिछड़े समूहों के बच्चों के लिए भी ऐसे विद्यालय खोलने की जरूरत है। कुपोषण का जन्म से ही शिकार हो रहे आदिवासी बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्वस्थ और तैयार हों, हमें इस दिशा में भी प्रयास करना होगा। भूखी गर्भवती आदिवासी महिलाओं को स्वस्थ बच्चों के प्रजनन के लिए सुविधा मुहैया कराने की जरूरत है। शायद देश संवेदनशील हो कि गर्भवती, भूखी आदिवासी माताओं को भोजन जुटाने के लिए आराम की स्थिति में होने के समय भी काम करना होता है।

देश में अन्य पिछड़े वर्गो की स्थिति भी बेहतर नहीं है। पिछड़ेपन की एक प्रकृति है कि जो पिछड़े हैं, उनमें भी पिछड़ेपन की कई श्रेणी हैं। जो वर्ग पिछड़ा है, उस वर्ग में महिलाएं पुरु षों की तुलना में और पिछड़ी हैं। बस्ते के भार को घटाने की यशपाल समिति की अनुशंसा भी गति पाने की स्थिति में है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने राज्यों को इस आशय का निर्देश जारी किया है। यह निर्देशित किया गया है कि पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों को किसी प्रकार का गृह-कार्य नहीं दिया जाए। राज्यों को यह सलाह दी गई है कि बस्ते के भार के निर्धारण के लिए तेलंगाना प्रतिरूप को अपनाएं जिसमें कक्षावार बस्तों के भार को तय किया है।

भार की सीमा कक्षा एक और दो के लिए डेढ़ किलो, कक्षा तीन से पांच के लिए दो से तीन किलो, कक्षा छह और सात के लिए चार किलो, कक्षा आठ और नौ के लिए साढ़े चार किलो तथा कक्षा दस के लिए पांच किलो निर्धारित की गई है। यह भी केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय का अच्छा कदम है कि कक्षा एक और दो में गणित और भाषा के अतिरिक्त कोई अन्य विषय नहीं पढ़ाया जाए, कक्षा तीन से पांच में भाषा एवं गणित के अतिरिक्त सिर्फ पर्यावरण पढ़ाया जाए।

इन कक्षाओं के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् की मानक किताबों के अतिरिक्त अन्य किताब या अधिगम सामग्री लाने के लिए विद्यार्थियों पर विद्यालय कोई दवाब न डाले। निर्णय से निजी विद्यालयों की मनमानी पर तो रोक लगेगी ही साथ ही उनकी अतिरिक्त आमदनी पर भी असर पड़ेगा, किन्तु विद्यार्थियों एवं उनके माता-पिता कई प्रकार की समस्याओं से उबर सकेंगे। यद्यपि बस्ते के भार को कम करना एक प्रभावकारी एवं क्रान्तिकारी कदम है, किंतु बस्ते के भार से अधिक जरूरी है कि विद्यार्थियों के बोझ को कम किया जाए जिसकी प्रकृति सिर्फ शारीरिक नहीं है-मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक भी है।

पहाड़ा याद करना, कविता याद करना या फिर गणित एवं भाषा संबंधी अन्य तयों से संबंधित थोड़ा सा कार्य बच्चों को दिया जा सकता है, यह ध्यान रखते हुए कि इन कायरे के सम्पादन में उन्हें किसी की सहायता अपेक्षित न हो। खेल-खेल में पढ़ाई, पढ़ने की आदत का निर्माण, माता-पिता से मिलने वाली शैक्षिक सहायता के अभाव को दूर करना आदि भी विद्यालय की जवाबदेही है। विद्यालय की समय-सारिणी में एक पीरिएड गृह-कार्य का रखा जा सकता है; जहां स्वतंत्रतापूर्वक न कर सकने योग्य कार्य को करने में अध्यापक बच्चों की सहायता करें।

थोड़ा-सा कार्य जो स्वतंत्रतापूर्वक किया जा सके घर के लिए भी देना अच्छा होगा, क्योंकि खाली दिमाग शैतान का घर वाली कहावत आज भी प्रासांगिक है। पढ़े-लिखे माता-पिता अपने बच्चों से तो कार्य करा लेंगे और अनपढ़ माता-पिता की संतान पिछड़ती चली जाएगी। विद्यालय के क्रिया-कलापों में भी शारीरिक श्रम से संबंधित कार्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन को कक्षा-कक्ष में होनेवाली पढ़ाई के अतिरिक्त सम्मिलित करना होगा। शिक्षा से शारीरिक अथवा क्रियात्मक तथा भावात्मक विकास भी करना ही होगा, क्योंकि शिक्षा सिर्फ ज्ञानात्मक पक्ष के विकास तक सीमित नहीं हो सकती।

गांधी ने शिक्षा के माध्यम से ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक विकास की बात कही है और री-एच की शिक्षा इसका प्रमाण है। गांधी का एडुकेशन फॉर री-एच हैण्ड, हर्ट और हेड क्रमश: क्रियात्मक, भावात्मक एवं ज्ञानात्मक पक्ष से संबंधित है। बस्ते के भार से अधिक महत्त्वपूर्ण विद्यार्थियों के बोझ को कम करना है, जो तभी संभव है जब शिक्षा की प्रकृति न केवल समावेशी हो, बल्कि सर्वागीण भी हो। तात्पर्य शिक्षण में ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक क्रिया-कलापों को एक संतुलित प्रतिनिधित्व मिले।

सरकारी विद्यालयों में सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम की सरकारी योजना भी प्रशंसनीय है। सरकारी विद्यालयों में अब निजी विद्यालयों की तर्ज पर चौकीदार की तैनाती की जाएगी और इस क्रम में बाउंड्रीवॉल जैसे इंतजाम किये जायेंगे। राज्यों से इस बाबत जानकारी मांगी गई है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक इस योजना में अभी देशभर के सभी सरकारी विद्यालयों को शामिल किया गया है। सूत्र यह बताते हैं कि देश के चौदह लाख सरकारी विद्यालयों में से ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद ज्यादातर विद्यालय खासकर प्राइमरी विद्यालय सुरक्षा का कोई मापदंड पूरा नहीं करते।

बाउंड्रीवाल या चौकीदार से ज्यादा जरूरी कार्य अभी शेष हैं; सरकारी विद्यालयों की गुणवता एवं विकास के लिए। पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था, एकल शिक्षक वाले विद्यालयों को उत्क्रमित करना, शिक्षकों की संख्या बढ़ाकर छात्र अध्यापक अनुपात को सुधारना, शौचालय की व्यवस्था करना, और फिर बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय बनाना, पुस्तकालय की व्यवस्था करना आदि क्या गार्ड एवं चारदीवारी से कम जरूरी है? यह भी सुखद है कि नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार है और इसके पांच स्तंभ उपलब्धता, सामर्य, निष्पक्षता, गुणवत्ता और उत्तरदायित्व है। परीक्षा योजना के मसौदे की नहीं, अपितु क्रियान्वयन की है। अपेक्षा है पूर्व की शिक्षा-नीतियों की तुलना में हम अपने विद्यालयों में इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू कर सकेंगे।

 

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बजट के लक्ष्य पाने की चुनौती

स्रोत: द्वारा संजय गुप्त: दैनिक जागरण

प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के आम बजट में बड़े सुधारों की उम्मीद की जा रही थी। इस उम्मीद की एक अन्य वजह यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते कुछ समय से देश को पांच लाख करोड़ डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने की बातें कर रहे हैं। इसका जिक्र आर्थिक सर्वे में भी किया गया है, लेकिन इसके बावजूद आम बजट के जरिये कोई बड़ा और क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया गया।

ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने बड़े कदम उठाने के बजाय छोटे-छोटे कदमों के जरिये ही आगे बढ़ने का फैसला किया और शायद इसी कारण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश आम बजट के प्रति जनता के एक बड़े वर्ग में उत्साह नहीं दिख रहा है। यह बजट इसकी सूचना दे रहा है कि मोदी सरकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को निरंतरता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। बही-खाता की संज्ञा वाले आम बजट में एक ओर जहां गांव-गरीबों की चिंता की गई है वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे के विकास एवं विस्तार पर अगले पांच वर्षो में सौ लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च करने का संकल्प भी लिया गया है।

बुनियादी ढांचे के विकास और विस्तार की चिंता करने के साथ ही जिस तरह ग्रामीण बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है उससे यह साफ है कि मोदी सरकार बजट के माध्यम से यह संदेश देना चाह रही थी कि नए भारत के निर्माण के क्रम में ग्रामीण आबादी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उसकी प्राथमिकता में हैं। इसकी जैसी झलक आम बजट में पेश की गई है उसे देखते हुए कम से कम यह तो नहीं ही कहा जा सकता कि गांव और गरीब इस सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं। चूंकि बजट के जरिये अति अमीर वर्ग पर टैक्स बढ़ाए गए हैं इसलिए विपक्ष की ओर से इस तरह की जुमलेबाजी के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह गई है कि यह तो सूट-बूट की सरकार है।

आम बजट में जिस तरह शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर विशेष बल दिया गया है उससे यह भी प्रकट होता है कि सरकार निर्धन तबके को सहारा देकर सबल बनाना चाह रही है। इसका प्रमाण ग्रामीण क्षेत्र में रोजी-रोजगार बढ़ाने की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों से भी मिलता है और किसानों के बीच सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने वाले प्रावधानों से भी।

ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को डिजिटल साक्षर बनाने और पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ने जैसी योजनाएं यह बता रही हैं कि मोदी सरकार मौजूदा वित्तीय वर्ष के साथ अपने शेष कार्यकाल के लिए भी विकास का खाका खींचना चाह रही थी। इसका पता इससे चलता है कि सरकार ने हर क्षेत्र पर पर्याप्त ध्यान देने की कोशिश की है। बजट के जरिये बीमा और उड्डयन क्षेत्र को विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोलने का जो निर्णय लिया गया वह उतना ही समय की मांग के अनुरूप है जितना श्रम सुधारों और विनिवेश की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प। देखना यह होगा कि ये संकल्प सही तरह पूरे हो पाते हैं या नहीं?

यह साफ है कि सरकार पर रोजगार के अवसर बढ़ाने और कारोबार जगत को बल देने का दबाव है। कारोबार जगत को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने छोटी और मझोली कंपनियों को टैक्स में बड़ी राहत दी है। अब 400 करोड़ रुपये तक सालाना टर्नओवर वाली कंपनियों पर 25 प्रतिशत कारपोरेट टैक्स ही लगेगा। अब तक यह सुविधा 250 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाली कंपनियों को ही प्राप्त थी। केंद्र के इस कदम के बाद अब 99.3 प्रतिशत कंपनियां कारपोरेट टैक्स की 25 प्रतिशत की स्लैब में आ जाएंगी, लेकिन बात तब बनेगी जब ये कंपनियां तेजी से आगे बढ़ें।

ध्यान रहे बैंकों की ओर से लघु एवं मझोले उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज की रफ्तार कोई बहुत उत्साहजनक नहीं। तथ्य यह भी है कि पिछले एक वर्ष में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी की खराब हालत के चलते छोटे-मझोले उद्योगों को कर्ज मिलना मुश्किल हो गया है। इस मुश्किल को आसान बनाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि राजस्व संग्रह में किसी भी तरह की कमी राजकोषीय घाटे को बढ़ा सकती है।

इसमें दोराय नही कि देश के चहुंमुखी विकास का खाका खींचना समय की मांग थी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विभिन्न योजनाओं में निवेश के लिए जितने धन की जरूरत है उतना सरकार को हासिल नहीं हो पा रहा है। चिंता की बात यह है कि जीएसटी से उतना टैक्स नहीं मिल पा रहा है जितना अपेक्षित है। इसका मतलब है कि व्यापारियों का एक वर्ग अभी भी दो नंबर के तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है। लगता है कि यह पुरानी आदत आसानी से नहीं छूटने वाली। इस आदत के न छूटने की एक वजह टैक्स अधिकारियों की उन व्यापारियों से मिलीभगत नजर आती है जो नई टैक्स व्यवस्था से बचे रहने के जतन करने में लगे हैं।

बजट में ऐसे कोई उपाय नहीं दिख रहे जो दो नंबर से व्यापार करने वाले उद्यमियों को टैक्स देने के लिए प्रेरित कर सकें। कर संग्रह की मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए इसकी उम्मीद कम है कि जीएसटी एवं अन्य करों के जरिये आवश्यक राजस्व की प्राप्ति का लक्ष्य पूरा हो सकेगा। संभवत: इसी कारण एक ओर जहां विभिन्न उपकर एवं अधिभार बढ़ाए गए हैं वही मध्यवर्ग को कोई राहत भी नहीं दी गई है। वित्तमंत्री ने करदाताओं के योगदान के लिए उनका धन्यवाद करते हुए सरकारी खजाना भरने के लिए करोड़पतियों पर टैक्स का बोझ बढ़ाया है। अब जहां दो करोड़ रुपये से पांच करोड़ रुपये तक सालाना आय वाले व्यक्तियों पर अधिभार बढ़कर 25 प्रतिशत और पांच करोड़ रुपये से अधिक सालाना आय वालों पर अधिभार बढ़कर 37 प्रतिशत हो जाएगा।

समर्थ लोगों को अधिक टैक्स देना ही चाहिए, लेकिन सरकार को यह भी ध्यान देना होगा कि भारत में लोगों की मानसिकता कम से कम टैक्स देने या फिर उससे बचे रहने की है। अति अमीरों को अधिक टैक्स के दायरे में लाने की पहल बड़े कारोबारियों को भारी-भरकम वेतन एवं लाभांश लेने से तो हतोत्साहित कर सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि इस धन का इस्तेमाल कारोबार को विस्तार देने में हो। अगर ऐसा होता है तो सरकार के इरादे पूरे होने वाले नहीं।

अति धनाढ्य वर्ग भले ही बहुत प्रभावी हो, लेकिन वह एक छोटा तबका ही है, इसलिए इसमें संदेह है कि उससे उतना टैक्स हासिल हो सकेगा जितने कि अपेक्षा की जा रही है। सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जहां भी टैक्स दरें ऊंची होती हैं वहां टैक्स से बचने की आदत भी पनपती है। टैक्स न देने या फिर बचाने की आदत का मुकाबला टैक्स नियमों को कठोर बनाने और टैक्स अधिकारियों की सख्ती के जरिये करने से यह भी हो सकता है कि अति अमीर कारोबारी टैक्स व्यवस्था के दबाव से घिर जाएं। अगर ऐसा होता है तो फिर कारोबार जगत को गति देना कठिन हो सकता है।

 

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