जनता के विवेक पर रखें भरोसा

स्रोत: द्वारा प्रेम कुमार मणि: राष्ट्रीय सहारा

भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक को तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सम्बोधित करते हुए 11 दिसम्बर 1946 को कहा था- ‘‘यह सभा कोई क्रांतिकारी सभा नहीं है।’ उन्होंने उम्मीद जतलाई थी कि भविष्य में अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा बेहतर तरीके से विधान निर्माण करेगी। नेहरू का गुस्सा अकारण नहीं था। वह संविधान सभा केवल ग्यारह फीसद भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रही थी। तब हर बालिग को वोट का अधिकार नहीं था। वोटर होने की कुछ शतरे थीं, जिनमें किसानों और मजदूर वगरे का प्रतिनिधित्व कम होता था। वह बड़े लोगों की सभा थी, जिसमें मुख्य रूप से जमींदार तबके का बोलबाला था।

मुस्लिम लीग ने तो संविधान सभा की बैठकों में हिस्सा ही नहीं लिया। 1948 में कांग्रेस से समाजवादियों के अलगाव के साथ ही 12 सोशलिस्ट सदस्यों ने एक साथ इस्तीफा कर दिया। उपचुनाव में सब के सब हार भी गए। इस तरह सोशलिस्टों का भी अभाव हो गया। देश के बंटवारे के बाद, बदली हुई स्थितियों में, डॉ आम्बेडकर की सदस्यता खत्म हो गई, क्योंकि वह मुस्लिम लीग के सहयोग से उस इलाके से जीत कर आए थे, जो अब पाकिस्तान (पूर्वी) का हिस्सा था।

जयकर को इस्तीफा दिलवा कर रिक्त स्थान पर आम्बेडकर का मनोनयन हुआ और इस तरह फिर संविधान सभा से वह जुड़े। हम सब जानते हैं किस तरह उन्होंने प्रारूप समिति के अध्यक्ष की हैसियत से संविधान का ढांचा तैयार किया। लेकिन सभा में उनकी बहुत चलती थी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस व्यथा को 1953 में उन्होंने व्यक्त किया है। कुल मिला कर संविधान सभा पर कांग्रेस के दक्षिणपंथी धड़े का प्रभाव था, लेकिन कांग्रेस के जो बूढ़े नेता थे, वे गांधी से खूब प्रभावित थे और उत्तर गांधी का जो वैचारिक रु ख था वह किसी से छुपा नहीं था।

गांधी उदार और जिम्मेदार लोकतंत्र के समर्थक थे। उनके हिसाब से लोकतंत्र बहुमत की तानाशाही और मनमानी नहीं है। जो पराजित हो गए हैं, जो कम संख्या में हैं, जो कमजोर हैं, गांधी के अनुसार वे दया के पात्र नहीं हैं। बहुमत का दायित्व है कि उन्हें बराबरी का हक दे। हालांकि गांधी स्वयं उस सभा में नहीं थे, लेकिन अधिकांश सदस्यों पर अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से उन्होंने अल्पसंख्यकों, दलितों और समाज के अन्य कमजोर तबकों के प्रति संविधान सभा को जिम्मेदार बनाया। सविधान निर्माण के दरम्यान ही गांधी की हत्या हो गई। इसने उनके विचारों को कुछ समय के लिए लोगों के दिलों पर रेखांकित कर दिया था।

इस तरह अनुपस्थित गांधी का व्यक्तित्व संविधान-सभा पर हावी रहा। नेहरू प्रधनमंत्री थे और आंबेडकर 1948 में कानून मंत्री हो गए थे। इन दोनों की आस्था गांधी में उतनी नहीं थी, जितनी पश्चिमी लोकतंत्र के उदात मूल्यों में। दोनों पश्चिम से प्रभावित थे, लेकिन दोनों की सांस्कृतिक जड़ें पूरब में थीं। सबसे बड़ी बात हुई कि हर वयस्क, जिसकी उम्र सीमा तब इक्कीस मानी गई थी, को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार का अधिकार मिला। सामाजिक-आर्थिक आजादी भले ही वायदे के रूप में था, लेकिन राजनीतिक आजादी तुरंत मिल गई थी।

इसी आधार पर 1952 का आम चुनाव हुआ। तब मुश्किल से पंद्रह फीसद लोग साक्षर थे, शिक्षित तो और कम थे। इतनी बड़ी अनपढ़-अशिक्षित आबादी को लेकर लोकतंत्र का खड़ा होना एक आश्र्चय से कम नहीं था। यह आश्र्चय भारत में हुआ। यूरोप के तमाम एशिया- उत्सुक लोग हैरान थे। कहा जा रहा था भारत में लोकतंत्र नहीं टिकेगा। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारतीयों को कुछ अधिक ही जाहिल समझ लिया था। सब के होश ठिकाने लग गए। पूरे भारत ने झूम कर मतदान में हिस्सा लिया। चुनाव को लोगों ने त्यौहार की तरह पसंद किया इसके मजे लिये।

कुछ ही समय बाद, वर्ष 1954 में ब्रिटश इतिहासकार एएल. बाशम की भारतीय इतिहास पर आई किताब का नाम था- वंडर दैट वाज इंडिया। बाशम के मन में इस वंडर का ख्याल संभवत: इस चुनाव को देख कर ही आया होगा। 1957 और 1962 के बाद 1967 का चुनाव जब हुआ तब भारतीय मतदाताओं ने आठ राज्यों में कांग्रेस सरकारों को बहुमत से दूर रखा। 1971 में हुए मध्यावधि चुनाव में भारतीय मतदाताओं ने समाजवादी अंगड़ाई दिखलाई और 1977 में लड़खड़ाते लोकतंत्र को सम्भाल लिया। तब लोगों ने कहा था कि भारत की अनपढ़ जनता ने लोकतंत्र की हिफाजत की है।

कवि रघुवीर सहाय का तो यह भी कहना था कि यहां की अनपढ़ जनता ने पढ़े-लिखे लोगों को आजादी दिलाई है। इसलिए हम नहीं कह सकते कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हैं। जो लोग यह कहते हैं कि इस या उस पक्ष के पास कोई जानदार, ओजस्वी और स्वीकृत नेतृत्व नहीं है, वे अपने निकट इतिहास से भी अनिवज्ञ हैं। 1977 में कोई नेता तय नहीं था। आनन-फानन में चुनाव हुए थे। जनवरी की 17 तारीख को जब इंदिरा गांधी ने चुनावों की घोषणा की तब विपक्ष के सभी बड़े नेता जेल में थे। इमरजेंसी हटाए बिना ही चुनाव कराए गए थे। जेपी हताश थे।

यदि कुलदीप नैय्यर की मानें तब, जेपी दिल्ली इसलिए गए थे कि चुनाव बहिष्कार की घोषणा कर सकें। दिल्ली में बुद्धिजीवियों के एक जमावड़े ने उन्हें उत्साहित किया। वह तन कर खड़े हुए। ठीक दो महीने बाद 24 मार्च को इंदिरा गांधी की विदाई हो चुकी थी। अपराजेय दिखने वाली इंदिरा गांधी लोकतंत्र की बौछार से भीगी बिल्ली बन चुकी थी। यह भारतीय मतदाताओं का दमखम था। इन्हीं मतदाताओं ने उन्हें 1971 में माथे पर बैठाया था। भारतीय मतदाता जब ठान लेता है कि इसे हटाना है, तब यह नहीं सोचता कि किसे लाना है। हम इसी परिप्रेक्ष्य में आज का चुनाव देख रहे हैं।

अगले 19 मई को मतदान खत्म हो जाएंगे। 23 मई को नतीजे भी आ जाएंगे। हमें धैर्यपूर्वक जनता के विवेक पर भरोसा करना चाहिए। भारतीय मतदाता न धन की बात सुनता है, न हंगामे को पसंद करता है। अच्छे और बुरे का अंतर करना उसे आता है। कौन धोखा देने वाला है और कौन सच्चा; यह उसे बतलाना नहीं पड़ता। भारत में जाति भी है और धर्म भी। कभी-कभार इनसे उठे गर्द-गुबार किसी को कुछ समय के लिए परेशान कर सकते हैं, लेकिन अंतत: हर दफा सच्चाई की जीत होती है। इस दफा भी सच्चाई की जीत होगी, जनता की जीत होगी।

 

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