बजट के लक्ष्य पाने की चुनौती

स्रोत: द्वारा संजय गुप्त: दैनिक जागरण

प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के आम बजट में बड़े सुधारों की उम्मीद की जा रही थी। इस उम्मीद की एक अन्य वजह यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते कुछ समय से देश को पांच लाख करोड़ डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने की बातें कर रहे हैं। इसका जिक्र आर्थिक सर्वे में भी किया गया है, लेकिन इसके बावजूद आम बजट के जरिये कोई बड़ा और क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया गया।

ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने बड़े कदम उठाने के बजाय छोटे-छोटे कदमों के जरिये ही आगे बढ़ने का फैसला किया और शायद इसी कारण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश आम बजट के प्रति जनता के एक बड़े वर्ग में उत्साह नहीं दिख रहा है। यह बजट इसकी सूचना दे रहा है कि मोदी सरकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को निरंतरता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। बही-खाता की संज्ञा वाले आम बजट में एक ओर जहां गांव-गरीबों की चिंता की गई है वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे के विकास एवं विस्तार पर अगले पांच वर्षो में सौ लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च करने का संकल्प भी लिया गया है।

बुनियादी ढांचे के विकास और विस्तार की चिंता करने के साथ ही जिस तरह ग्रामीण बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है उससे यह साफ है कि मोदी सरकार बजट के माध्यम से यह संदेश देना चाह रही थी कि नए भारत के निर्माण के क्रम में ग्रामीण आबादी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उसकी प्राथमिकता में हैं। इसकी जैसी झलक आम बजट में पेश की गई है उसे देखते हुए कम से कम यह तो नहीं ही कहा जा सकता कि गांव और गरीब इस सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं। चूंकि बजट के जरिये अति अमीर वर्ग पर टैक्स बढ़ाए गए हैं इसलिए विपक्ष की ओर से इस तरह की जुमलेबाजी के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह गई है कि यह तो सूट-बूट की सरकार है।

आम बजट में जिस तरह शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर विशेष बल दिया गया है उससे यह भी प्रकट होता है कि सरकार निर्धन तबके को सहारा देकर सबल बनाना चाह रही है। इसका प्रमाण ग्रामीण क्षेत्र में रोजी-रोजगार बढ़ाने की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों से भी मिलता है और किसानों के बीच सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने वाले प्रावधानों से भी।

ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को डिजिटल साक्षर बनाने और पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ने जैसी योजनाएं यह बता रही हैं कि मोदी सरकार मौजूदा वित्तीय वर्ष के साथ अपने शेष कार्यकाल के लिए भी विकास का खाका खींचना चाह रही थी। इसका पता इससे चलता है कि सरकार ने हर क्षेत्र पर पर्याप्त ध्यान देने की कोशिश की है। बजट के जरिये बीमा और उड्डयन क्षेत्र को विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोलने का जो निर्णय लिया गया वह उतना ही समय की मांग के अनुरूप है जितना श्रम सुधारों और विनिवेश की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प। देखना यह होगा कि ये संकल्प सही तरह पूरे हो पाते हैं या नहीं?

यह साफ है कि सरकार पर रोजगार के अवसर बढ़ाने और कारोबार जगत को बल देने का दबाव है। कारोबार जगत को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने छोटी और मझोली कंपनियों को टैक्स में बड़ी राहत दी है। अब 400 करोड़ रुपये तक सालाना टर्नओवर वाली कंपनियों पर 25 प्रतिशत कारपोरेट टैक्स ही लगेगा। अब तक यह सुविधा 250 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाली कंपनियों को ही प्राप्त थी। केंद्र के इस कदम के बाद अब 99.3 प्रतिशत कंपनियां कारपोरेट टैक्स की 25 प्रतिशत की स्लैब में आ जाएंगी, लेकिन बात तब बनेगी जब ये कंपनियां तेजी से आगे बढ़ें।

ध्यान रहे बैंकों की ओर से लघु एवं मझोले उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज की रफ्तार कोई बहुत उत्साहजनक नहीं। तथ्य यह भी है कि पिछले एक वर्ष में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी की खराब हालत के चलते छोटे-मझोले उद्योगों को कर्ज मिलना मुश्किल हो गया है। इस मुश्किल को आसान बनाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि राजस्व संग्रह में किसी भी तरह की कमी राजकोषीय घाटे को बढ़ा सकती है।

इसमें दोराय नही कि देश के चहुंमुखी विकास का खाका खींचना समय की मांग थी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विभिन्न योजनाओं में निवेश के लिए जितने धन की जरूरत है उतना सरकार को हासिल नहीं हो पा रहा है। चिंता की बात यह है कि जीएसटी से उतना टैक्स नहीं मिल पा रहा है जितना अपेक्षित है। इसका मतलब है कि व्यापारियों का एक वर्ग अभी भी दो नंबर के तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है। लगता है कि यह पुरानी आदत आसानी से नहीं छूटने वाली। इस आदत के न छूटने की एक वजह टैक्स अधिकारियों की उन व्यापारियों से मिलीभगत नजर आती है जो नई टैक्स व्यवस्था से बचे रहने के जतन करने में लगे हैं।

बजट में ऐसे कोई उपाय नहीं दिख रहे जो दो नंबर से व्यापार करने वाले उद्यमियों को टैक्स देने के लिए प्रेरित कर सकें। कर संग्रह की मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए इसकी उम्मीद कम है कि जीएसटी एवं अन्य करों के जरिये आवश्यक राजस्व की प्राप्ति का लक्ष्य पूरा हो सकेगा। संभवत: इसी कारण एक ओर जहां विभिन्न उपकर एवं अधिभार बढ़ाए गए हैं वही मध्यवर्ग को कोई राहत भी नहीं दी गई है। वित्तमंत्री ने करदाताओं के योगदान के लिए उनका धन्यवाद करते हुए सरकारी खजाना भरने के लिए करोड़पतियों पर टैक्स का बोझ बढ़ाया है। अब जहां दो करोड़ रुपये से पांच करोड़ रुपये तक सालाना आय वाले व्यक्तियों पर अधिभार बढ़कर 25 प्रतिशत और पांच करोड़ रुपये से अधिक सालाना आय वालों पर अधिभार बढ़कर 37 प्रतिशत हो जाएगा।

समर्थ लोगों को अधिक टैक्स देना ही चाहिए, लेकिन सरकार को यह भी ध्यान देना होगा कि भारत में लोगों की मानसिकता कम से कम टैक्स देने या फिर उससे बचे रहने की है। अति अमीरों को अधिक टैक्स के दायरे में लाने की पहल बड़े कारोबारियों को भारी-भरकम वेतन एवं लाभांश लेने से तो हतोत्साहित कर सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि इस धन का इस्तेमाल कारोबार को विस्तार देने में हो। अगर ऐसा होता है तो सरकार के इरादे पूरे होने वाले नहीं।

अति धनाढ्य वर्ग भले ही बहुत प्रभावी हो, लेकिन वह एक छोटा तबका ही है, इसलिए इसमें संदेह है कि उससे उतना टैक्स हासिल हो सकेगा जितने कि अपेक्षा की जा रही है। सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जहां भी टैक्स दरें ऊंची होती हैं वहां टैक्स से बचने की आदत भी पनपती है। टैक्स न देने या फिर बचाने की आदत का मुकाबला टैक्स नियमों को कठोर बनाने और टैक्स अधिकारियों की सख्ती के जरिये करने से यह भी हो सकता है कि अति अमीर कारोबारी टैक्स व्यवस्था के दबाव से घिर जाएं। अगर ऐसा होता है तो फिर कारोबार जगत को गति देना कठिन हो सकता है।

 

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