व्यापार युद्ध का खतरा

स्रोत: द्वारा जयंतीलाल भंडारी: जनसत्ता

इन दिनों पूरी दुनिया में अमेरिका के नेशनल ब्यूरो आफ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीइसी) की रिपोर्ट ‘व्यापार युद्ध और अमेरिकी अर्थव्यवस्था’ को गंभीरतापूर्वक पढ़ा जा रहा है। अमेरिका के प्रमुख अर्थशास्त्रियों के समूह द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापार युद्ध अमेरिका के हित में नहीं है। वर्ष 2018 में व्यापार युद्ध से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को करीब चौवन हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

यह रिपोर्ट ऐसे वक्त में आई है जब एक ओर अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध खत्म होने की संभावना बन रही है, और दूसरी ओर अमेरिका व्यापार युद्ध का रुख भारत की ओर मोड़ते हुए भारत का तरजीही प्राप्त दर्जा खत्म करने जा रहा है। ऐसे में कारोबारी तनाव को कम करने के लिए भारत को अमेरिका के साथ वाणिज्यिक वार्ता को आगे बढ़ाना होगा और चीन की तरह ही लचीला और कूटनीतिक रुख अपनाना होगा। व्यापार युद्ध न अमेरिका के लिए लाभप्रद है, न ही भारत के लिए। ऐसे में भारत को अमेरिका के समक्ष बेहतर व्यापार प्रस्ताव पेश करने चाहिए और अमेरिका को भी चाहिए कि वह भारत का तरजीही प्राप्त देश का दर्जा बनाए रखे। यह दोनों के लिए ही लाभकारी होगा।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पांच मार्च को अमेरिका की संसद को एक पत्र के जरिए भारत को दी गई प्राथमिकताओं की सामान्यीकरण प्रणाली (जीएसपी) को समाप्त करने के अपने इरादे से अवगत कराया। ऐसे में यदि अमेरिका जीएसपी के फैसले पर कायम रहता है तो साठ दिन यानी दो महीने बाद भारत का तरजीही व्यापार दर्जा खत्म हो जाएगा। मालूम हो कि वर्ष 1976 से जीएसपी व्यवस्था के तहत विकासशील देशों को दी जाने वाली आयात शुल्क रियायत के मद्देनजर करीब दो हजार भारतीय उत्पादों को शुल्क मुक्त रूप में अमेरिका भेजने की अनुमति मिली हुई है। इस व्यापार छूट के तहत भारत से किए जाने वाले करीब चालीस हजार करोड़ रुपए के निर्यात पर कोई शुल्क नहीं लगता है। आंकड़े बता रहे हैं कि जीएसपी के तहत तरजीह के कारण अमेरिका को जितने राजस्व का नुकसान होता है, उसका एक चौथाई भारतीय निर्यातकों को प्राप्त होता है।

ट्रंप का कहना है कि भारत अमेरिका पर बहुत अधिक शुल्क लगाने वाला देश है। ऐसे में अब अमेरिका भारतीय उत्पादों पर जवाबी शुल्क (मिरर टैक्स) लगा सकता है। ट्रंप ने अमेरिकी मोटरसाइकिल हार्ले-डेविडसन का उदाहरण देते हुए कहा कि जब हम भारत को मोटरसाइकिल भेजते हैं तो उस पर सौ प्रतिशत का शुल्क लगा रहा था, जिसे घटा कर पचास फीसद किया गया। लेकिन जब भारत हमें मोटरसाइकिल का निर्यात करता है तो हम कुछ भी शुल्क नहीं लगाते हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि अमेरिका भी बराबर का शुल्क लगाएगा। यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि भारत सरकार विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों को यूजर डेटा भारत में ही रखने के लिए नियम बनाने में जुटी है, इसलिए भी ट्रंप ने अमेरिकी कंपनियों के हित में शुल्क बढ़ाने का मन बनाया है।

इसके अलावा, भारत को व्यापार में तरजीही वाले देशों की सूची से निकालने का एक कारण यह भी है कि भारत ने अमेरिकी पशुओं के दूध से बने डेयरी उत्पाद लेने से मना कर दिया है, क्योंकि अमेरिका में दुधारू पशुओं को चारे में मांसाहार खिलाया जाता है। ऐसे में भारत के इस फैसले के पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनाएं हैं। लेकिन भारत का कहना है कि डेयरी उत्पादों के लिए प्रमाणन प्रक्रिया का पालन हो तो भारत को आयात में कोई आपत्ति नहीं होगी।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि अमेरिका का यह कदम भारत-अमेरिकी कारोबार के लिए बड़ी चुनौती है। इससे भारत से निर्यात किए जाने वाले कपड़े, रेडीमेड कपड़े, रेशमी कपड़े, प्रसंस्करित खाद्य पदार्थ, जूते, प्लास्टिक का सामान, इंजीनियरिंग उत्पाद, हाथ के औजार, साइकिलों के पुर्जे बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां संकट में पड़ सकती हैं। इन उद्योगों की मुश्किलें बढ़ने से इनमें कार्यरत हजारों लोगों के समक्ष नौकरियां जाने का खतरा खड़ा हो जाएगा।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा वैश्विक कारोबारी सहयोगी है। भारत से अमेरिका को निर्यात 2017-18 में बढ़ कर 47.87 अरब डॉलर हो गया था, जो एक साल पहले वर्ष 2016-17 के 42.21 अरब डॉलर रहा था। इसकी वजह से व्यापार घाटे को लेकर अमेरिका की चिंता बढ़ी है। लेकिन अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा महज करीब 22 अरब डॉलर है। जबकि अमेरिका का चीन के साथ व्यापार घाटा 566 अरब डॉलर है।

अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत दुनिया की सबसे तेज आर्थिक विकास दर वाला देश है, साथ ही बढ़ता हुआ बाजार भी। ऐसे में यदि अमेरिका साठ दिन के बाद जीएसपी व्यवस्था से भारतीय वस्तुओं को बाहर कर देता है तो इससे भारत के छोटे निर्यातकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जीएसपी के तहत भारत से अमेरिका को कुल निर्यात की करीब ग्यारह फीसद है। पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए भारत से आयातित पचास उत्पादों पर शुल्क मुक्त की रियायत खत्म कर दी थी। इनमें इस्पात, एल्यूमीनियम, हथकरघा और कृषि क्षेत्र से जुड़े उत्पाद शामिल थे। भारत-अमेरिका के बीच कारोबार संबंधी विवाद पिछले साल जुलाई में काफी बढ़ गया था, जब भारत ने उनतीस कृषि उत्पादों पर शुल्क लगाने की घोषणा कर दी थी।

निसंदेह ऐसे समय में जब अमेरिका और चीन के बीच कारोबार वार्ता के दौरान चीन के लचीले एवं कूटनीतिक दृष्टिकोण के कारण दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध खत्म होने की संभावना बन गई है, तब ऐसे में भारत-अमेरिका के बीच कारोबारी तनाव को कम करने के लिए चीन की तरह भारत को भी लचीला और कूटनीतिक रुख अपनाने की जरूरत है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि चीन के साथ व्यापार युद्ध खत्म होने के पीछे अमेरिका की कोई बड़ी उदारता नहीं है, वरन उसकी मजबूरी भी है।

पिछले वर्ष अमेरिका द्वारा चीन से आयतित वस्तुओं पर ढाई सौ अरब डॉलर का शुल्क लगाए जाने से अमेरिका के उपभोक्ताओं और अमेरिकी कंपनियों को चीन से आयतित वस्तुओं पर बढ़ी हुई लागत चुकाना पड़ रही है। इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं और अमेरिकी कंपनियों को अधिक आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। हालांकि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध खत्म होने के करीब है, लेकिन इस बीच अमेरिका और चीन में भारत के निर्यात बढ़ने के जो नए मौके बनने लगे थे, वे रुक जाएंगे, साथ ही अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले नए आयात शुल्कों से भारतीय निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी।

ऐसे में भारत अमेरिका से आयात होने वाले उन्नत तकनीक वाले स्मार्टफोन, सूचना एवं संचार तकनीक से जुड़े उत्पादों पर कम आयात शुल्क लगाने की डगर पर आगे बढ़ सकता है। भारत को कुछ कठोर रुख अपनाते हुए अमेरिका से आयात होने वाले पूर्व निर्धारित उत्पादों पर निकट भविष्य में आयात शुल्क लगाना होगा। अमेरिका को याद दिलाना होगा कि 1999 में पोकरण विस्फोट के बाद उसने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन बाद में अमेरिकी कंपनियों के हितों के मद्देनजर अमेरिका ने स्वत: ही ये प्रतिबंध हटाए थे। ऐसे में अब अमेरिका को भी इस बात को ध्यान में रखना होगा कि चीन की तरह भारत पर भी उसका उलटा दांव न पड़ जाए। उम्मीद की जानी चाहिए कि वाणिज्यिक और कूटनीतिक प्रयासों से दोनों देशों का कारोबारी संबंध कम होगा।

 

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