एचआईवी के खात्मे का सपना सच होने के करीब पहुंचा

स्रोत: द्वारा देवांग्शु दत्ता: बिजनेस स्टैंडर्ड

एड्स के वर्ष 1981 में पहली बार सामने आने के बाद करीब चार दशक बीत चुके हैं। केवल दो बार ही ऐसा हुआ है कि पीडि़त पूरी तरह इस बीमारी से निजात पा सका है। यह बीमारी इंसान की प्रतिरोधक क्षमता पर हमला करने वाले ह्यूमन इम्यूनो-डिफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) के संक्रमण से होती है। एचआईवी संक्रमण श्वेत रक्त कणिकाओं की एक किस्म सीडी4 टी कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। यह कोशिका शरीर को संक्रमण से बचाती है। एचआईवी कोशिका में घुसने के बाद अपनी प्रतिकृति बनाने लगता है और फिर पूरे शरीर में इसका फैलाव हो जाता है।

एचआईवी संक्रमण शारीरिक द्रव्यों के आदान-प्रदान से होता है। अगर कोई व्यक्ति एचआईवी-पॉजिटिव पाया जाता है तो इसका मतलब है कि शरीर में यह वायरस घुस चुका है लेकिन बीमारी के लक्षण पूरी तरह सामने आए बगैर वह कई वर्षों तक जिंदा रह सकता है। लेकिन प्रतिरोधक क्षमता नष्ट होने के बाद संक्रमित व्यक्ति पूरी तरह एड्स की चपेट में आ जाता है और फिर वह हरेक तरह के संक्रमण का आसानी से शिकार हो सकता है। अधिकतर एड्स पीडि़तों की मौत कैंसर, न्यूमोनिया और अन्य बीमारियों से होती है।

एड्स से करीब 4 करोड़ लोगों की मौत होने का अनुमान है तथा 3.5-4 करोड़ लोग एचआईवी-संक्रमित पाए गए हैं। हर साल करीब 10 लाख लोगों की इस संक्रमण के चलते मौत हो जाती है और करीब 20 लाख नए लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं। हालांकि स्थिति 2000 के दशक से थोड़ी बेहतर है जब हर साल करीब 20 लाख एड्स पीडि़तों की मौत हो रही थी।  ऐंटी-रेट्रो वायरल (एआरवी) दवाएं इस बीमारी को दबा सकती हैं और उससे पीडि़त के लंबे समय तक जिंदा रहने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन एआरवी दवाएं भी इस वायरस का खात्मा नहीं कर पाती हैं। एआरवी एचआईवी की चपेट में आई कोशिका को नष्ट कर देती हैं ताकि वह वायरस अपनी वृद्धि न कर सके। हालांकि इस प्रक्रिया में भी एचआईवी खुद को निष्क्रिय स्थिति में रखकर उस वक्त का इंतजार कर सकता है जब एआरवी थेरेपी बंद हो जाए। इस तरह एचआईवी फिर से लौट आता है।

एड्स के सफल इलाज का पहला मामला 2007 में सामने आया था। बर्लिन में रहने वाले अमेरिकी नागरिक टिमोथी रे ब्राउन एचआईवी-संक्रमित थे और ल्यूकेमिया का इलाज चल रहा था। इस बीमारी में श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या असाधारण रूप से बढ़ जाती है। रक्त कणिकाओं की उत्पत्ति अस्थिमज्जा से होती है। ल्यूकेमिया के उपचार में एक स्वस्थ व्यक्ति से अस्थिमज्जा की स्टेम सेल लेकर बीमार में प्रत्यारोपित कर दी जाती है। इससे स्वस्थ रक्त पैदा करने में मदद मिलती है और नई प्रतिरोधक प्रणाली तैयार होती है। हालांकि अस्थिमज्जा का प्रत्यारोपण खतरनाक होता है। इसमें प्रत्यारोपण के पहले रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट करनी पड़ती है।

एचआईवी पीडि़तों को नैसर्गिक प्रतिरोधकता देने वाला सीसीआर5 डेल्टा 32 नाम का उत्परिवर्तित जीन बहुत कम लोगों में होता है। यह एक अनूठा उत्परिवर्तन है जो केवल कुछ उत्तरी यूरोपीय लोगों में ही पाया जाता है। एचआईवी वायरस अधिकतर लोगों में मौजूद सीसीआर5 जीन का इस्तेमाल टी-कोशिकाओं में घुसने के लिए करता है। एचआईवी उत्परिवर्तित जीन डेल्टा-32 का इस्तेमाल नहीं कर सकता है और न ही सीसीआर5 डेल्टा-32 जीन की दो प्रतिकृतियों की नकल ही कर सकता है। डेल्टा-32 जीन की एक प्रतिकृति भी ऐसी ही सुरक्षा प्रदान करती है। उत्तरी यूरोप के महज 1 फीसदी लोगों में ही दोनों प्रतिकृतियों वाला जीनोम पाया जाता है।

ब्राउन का इलाज चैरिट यूनिवर्सिटी मेडिसिन बर्लिन के डॉक्टर क्रिस्टीना एलर्स और गेरो हटर कर रहे थे। उन्हें 'बर्लिन पेशेंट' के लिए डेल्टा-32 उत्परिवर्तन वाला एक अनुकूल दानकर्ता भी मिल गया। अस्थिमज्जा प्रत्यारोपण के 12 साल बाद भी ब्राउन एचआईवी-मुक्त बने हुए हैं और अब सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। ऐसा ही तरीका 'लंदन पेशेंट' के इलाज में भी अपनाया गया। डॉ रवींद्र गुप्ता की अगुआई में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और इम्पीरियल कॉलेज के डॉक्टरों ने कैम्ब्रिज एवं ऑक्सफर्ड की टीमों के साथ मिलकर इलाज किया। इस मरीज के एचआईवी संक्रमित होने का पता वर्ष 2003 में चला था और उसके बाद से वह एआरवी दवाओं पर था। वर्ष 2012 में उसके 'हॉजकिंस लिम्फोमा' कैंसर से भी पीडि़त होने की रिपोर्ट सामने आई।

वर्ष 2016 में कीमोथेरेपी के बाद मरीज को डेल्टा-32 की दोहरी प्रतिकृति रखने वाले दानकर्ता से अस्थिमज्जा प्रत्यारोपित की गई। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक वह व्यक्ति एचआईवी-मुक्त बना हुआ है। यहां तक कि एआरवी दवाएं देना भी बंद किए हुए 18 महीने हो चुके हैं। हालांकि एचआईवी में कुछ समय के बाद दोबारा लौटने की प्रवृति पाई जाती है जिसकी वजह से  इस मरीज को पूरी तरह एचआईवी मुक्त करार देने में अभी चौकसी बरती जा रही है। लेकिन इससे संकेत मिलता है कि सीसीआर5 जीन की अदला-बदली पर आधारित इलाज कारगर हो सकता है। कीमोथेरेपी के जरिये प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट करना और फिर उत्परिवर्तित सीसीआर5 जीन का प्रत्यारोपण अपने आप में जिंदगी को खतरे में डालने वाला तरीका है। इसके अलावा सही दानकर्ता की तलाश भी मुश्किल है।

लेकिन इन मामलों से एचआईवी संक्रमितों में जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिये प्रतिरोधी जीन डालकर उसका इलाज करने का कम खतरनाक तरीका निकालने की उम्मीदें बढ़ी हैं। हाल ही में चीन के वैज्ञानिक हे जियांकु ने जुड़वा बच्चों के जीन संवद्र्धित कर दिए जो सीसीआर5 में बदलाव का ही प्रयास था। शोधकर्ता एचआईवी को रोकने के लिए दूसरे जीन की भी तलाश कर रहे हैं। कई साल बाद अब उम्मीद बंधी है कि एचआईवी का खात्मा किया जा सकता है।

 

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