प्रयोगशाला में बने बच्चे और नए डर

स्रोत: द्वारा विवेक वाधवा: हिंदुस्तान

चीन के एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि उन्होंने दुनिया के पहले ऐसे बच्चों को पैदा करने में सफलता पाई है, जिनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं। ऐसी जुड़वां बच्चियां इस महीने की शुरुआत में पैदा हुई हैं। यह बताता है कि अब हम ‘डिजाइनर बच्चों’ के दौर में पहुंच गए हैं। यानी ऐसा बच्चा, जिसके जीन्स में मनमुताबिक बदलाव किए गए हों। यह भी उम्मीद बंधी है कि अब जल्द ही हमारे पास भ्रूण में इस कदर बदलाव करने की क्षमता भी आ जाएगी कि दुरूह बीमारियों को हम खत्म कर सकेंगे, त्वचा और आंखों का रंग बदल सकेंगे, और बच्चे में अतिरिक्त बुद्धिमता जोड़ सकेंगे। मगर सच यह भी है कि इस तकनीक के नतीजों को लेकर अब भी हमारी समझ शैशव-अवस्था में ही है।

जीन सुधार की यह तकनीक ‘क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिन्ड्रोमिक रिपीट्स’ यानी सीआरआईएसपीआर कहलाती है। इसे हाल ही के वर्षों में वैज्ञानिकों ने ढूंढ़ा है। एक जीनोम से आनुवंशिक तत्व निकालकर उसे दूसरे में डालने की यह तकनीक लाखों वर्षों में विकसित हुई है। सीआरआईएसपीआर को किसी प्रयोगशाला में डीएनए में तत्काल बदलाव लाने का सबसे सस्ता और आसान तरीका माना जाता है। डीएनए के साथ किसी तरह के प्रयोग के लिए हाल-फिलहाल तक बेहतरीन प्रयोगशालाओं, वर्षों के अनुभव और लाखों डॉलर की दरकार होती थी। मगर सीआरआईएसपीआर ने सब कुछ बदल दिया है।

दरअसल, कैस9 नामक एंजाइम के इस्तेमाल से यह तकनीक काम करती है, जो डीएनए के स्ट्रैंड में एक खास स्थान पर जमा रहता है। इसके बाद ही डीएनए में बदलाव की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें आरएनए अणु बतौर गाइड काम करते हैं। अगर किसी प्रयोगशाला को सीआरआईएसपीआर तकनीक से लैस करना हो, तो आरएनए का एक टुकड़ा, ऑफ-द-शेल्फ रसायन और एंजाइम की ही जरूरत है, जिसे हासिल करने के लिए चंद डॉलर ही पर्याप्त हैं।

यह तकनीक सस्ती है और इसका इस्तेमाल भी आसान है, इसीलिए दुनिया भर के हजारों लैब इस तकनीक के साथ ‘एडिटिंग प्रोजेक्ट’ पर काम कर रहे हैं। चीन इस मामले में नेतृत्व की भूमिका में है, क्योंकि वहां नियमों की कोई बाधा नहीं है और मेडिकल एथिक्स या नैतिकता की ऐसी बेड़ी भी नहीं, जिससे दूसरे तमाम देश बंधे हुए हैं। चीन के वैज्ञानिकों ने 2014 में ही यह घोषणा की थी कि उन्होंने एक ऐसा बंदर पैदा करने में सफलता हासिल की है, जिसके लिए भ्रूण स्तर पर ही जीन्स में बदलाव किए गए थे।

अप्रैल, 2015 में चीन के ही शोधकर्ताओं के एक अन्य समूह ने शोधपत्र जारी करते हुए बताया कि किस तरह उन्होंने पहली बार इंसानी भ्रूण के जीन्स में बदलाव करने की कोशिश की। हालांकि उनका वह प्रयास विफल रहा था, मगर उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद भी चीन के शोधकर्ताओं ने अप्रैल 2016 में एलान किया कि उन्होंने मानव भ्रूण के जीनोम को संशोधित करने में सफलता पा ली है, और ऐसा इसलिए किया गया, ताकि उसे एचआईवी के संक्रमण से बचाया जा सके।

साफ है कि यह एक गंभीर मर्यादा का उल्लंघन था। अभी यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता कि जीन को बदलने या उसे अक्षम बनाने का किस कदर प्रभाव पड़ेगा? मगर 1960 के दशक में यही माना जाता था कि जैसे-जैसे समय बीतेगा, हम मानव शरीर के निर्माण में प्रत्येक जीन की सटीक भूमिका जान पाएंगे। तब ऐसा अनुमान था कि हर जीन एक प्रोटीन के लिए कोड का काम करता है। और जब तमाम समानताएं हम जान जाएंगे, तो हमारे पास न सिर्फ अनुसंधान के लिए, बल्कि आनुवंशिक रोगों को ठीक करने व उसे रोकने के लिए और संभवत: मानव विकास को आगे बढ़ाने के लिए भी एक उपयोगी औजार होगा।

हालांकि जेनेटिक्स को लेकर जब आम धारणा ‘वन जीन-वन प्रोटीन’ की बन रही थी, तभी वैज्ञानिकों ने पाया कि कई प्रोटीन में कई पॉलीपेप्टाइड्स भी शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक को जीन द्वारा कोड किया गया था। नतीजतन, सिद्धांत बदल गए और नया नियम ‘वन जीन-वन पॉलीपेप्टाइड’ हो गया। मगर 1970 के दशक में आए एक अन्य सिद्धांत ने पिछली तमाम धारणाओं को खंडित कर दिया। उस नई खोज से साबित हुआ कि एक जीन एक से अधिक प्रोटीन के लिए कोडिंग कर सकता है। हालांकि साल 2000 में हुई एक अन्य खोज ने यह साबित कर दिया कि जीन को लेकर अब भी हमारी समझ पूरी तरह नहीं बन पाई है। यह सिद्धांत बताता है कि एक अकेला जीन संभवत: हजारों प्रोटीन के लिए कोडिंग कर सकता है

संक्षेप में कहें तो हम नई तकनीक की सीमाओं से अनजान हैं। हम यह अंदाज नहीं लगा सकते कि एक जीन को बदलने मात्र से किसी व्यक्ति के जीवन पर क्या असर पड़ेगा? इससे आने वाली पीढ़ियां कितनी प्रभावित होंगी? इन्हीं सब वजहों से हमें यह भी नहीं पता कि मानव में रोगाणु-कोशिकाओं की आनुवंशिक शृंखला में सुधार अंतत: विनाशकारी होगा, और आनुवंशिक जीन्स से छेड़छाड़ मानवीय या नैतिक हो सकती है?

भारत में अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी तकनीक के कारण पहले से ही लैंगिक असमानता है। यहां हर 107 पुरुषों पर सिर्फ 100 महिलाएं हैं। यहां माता-पिता में जिस तरह लड़कों की चाह है, उसे देखकर यही लगता है कि गोरा रंग और तेज दिमाग, यहां तक कि अतिरिक्त ऊंचाई व शारीरिक ताकत पाने की इच्छा जल्द ही देश में इन तकनीकों की सहायता से ‘श्रेष्ठतम’ बच्चे पैदा करने की स्पद्र्धा शुरू कर देगी। जबकि हम यह तक नहीं जानते कि यह ‘श्रेष्ठता’ क्या है? अगर गोरा रंग और कुशाग्र बुद्धि ही किसी इंसान को श्रेष्ठ बनाती, तो महान लोग अमूमन इस कसौटी पर फेल साबित होंगे।

निश्चय ही इंसान आज इस मुकाम पर पहुंच गया है कि वह खुद अपनी जन्म प्रक्रिया में संशोधन कर सकता है। मगर सवाल वही है कि क्या इस ताकत का हम जिम्मेदारी भरा इस्तेमाल कर सकेंगे, ताकि मानव जाति और इस धरती को इसका फायदा मिले?

Print Friendly, PDF & Email