जनप्रतिनिधियों की गरिमा बचाए संविधान पीठ

स्रोत: द्वारा सुरेन्द्र किशोर: दैनिक जागरण

यदि कोई सांसद रिश्वत लेकर किसी अल्पमत सरकार को सदन में गिर जाने से बचा लेता है तो क्या वह अपने विधायी कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहा होता है? क्या उसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत किसी तरह की सजा से छूट है? यदि किसी विधायक पर घूस लेकर राज्यसभा के किसी उम्मीदवार को वोट देने का आरोप साबित हो जाए तो वह भी क्या संविधान के अनुच्छेद 194 की आड़ लेकर सजा से बच सकता है?

पहले मामले में 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने झामुमो (JMM) सांसदों को राहत दे दी थी, पर दूसरा मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। यह दूसरा मामला भी झारखंड की एक विधायक पर लगे ऐसे ही आरोप से संबंधित है। संविधान निर्माताओं ने इसकी कल्पना ही नहीं की थी कि हमारे यहां एक दिन यह सब भी होने लगेगा और इसीलिए उन लोगों ने अनुच्छेद 105 और 194 को विस्तार से नहीं लिखा। अब विस्तार की जरूरत आ पड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट ने आठ मार्च को इस मामले में महत्वपूर्ण कदम उठाया। वह इस पर विचार करेगा कि संसद में रिश्वत लेकर कोई काम करना अपराध है या नहीं? यह मामला संविधान पीठ को सौंप दिया गया है। संविधान पीठ के सामने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की विधायक सीता सोरेन का मामला है। उन पर रिश्वत लेकर राज्यसभा के उम्मीदवार को वोट देने का आरोप है। मौजूदा संविधान पीठ 1998 के निर्णय को बदल भी सकती है, क्योंकि उसी निर्णय के बहाने सीता सोरेन सुप्रीम कोर्ट गई हैं।

ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर अपने पिछले निर्णय बदलता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में यह माना था कि आपातकाल में उसने मौलिक अधिकारों के हनन के सरकारी निर्णय पर अपनी मुहर लगाकर भूल की थी। आपातकाल में अटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि यदि आज शासन किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ अदालत की शरण नहीं ली जा सकती, क्योंकि सारे मौलिक अधिकार-यहां तक कि जीने का अधिकार भी स्थगित कर दिया गया है।

1998 में सुप्रीम कोर्ट ने चार रिश्वतखोर सांसदों के कृत्य को संविधान के अनुच्छेद 105 के आधार पर कहा था कि इस अनुच्छेद के कारण हमारे हाथ बंधे हुए हैं। यदि मौजूदा संविधान पीठ 1998 के फैसले को गलत ठहराती है तो यह अगली लोकसभा के लिए एक बड़ा शुभ संदेश भी होगा जिसके चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मिलीजुली सरकारों वाले दौर में ऐसे निर्णय बड़े काम के साबित होंगे। उनसे स्वस्थ लोकतंत्र विकसित होने में सुविधा होगी।

अब जरा झारखंड सांसद रिश्वत कांड पर एक नजर डालें। पीवी नरसिंह राव की सरकार अल्पमत में थी। 26 जुलाई 1993 को माकपा के अजय मुखोपाध्याय ने उसके खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। 28 जुलाई 1993 को 14 वोट से वह प्रस्ताव गिर गया। कुछ समय बाद एक पत्रिका में सुबूत के साथ यह खबर छपी कि सरकार ने कई सांसदों को रिश्वत देकर जीत हासिल की थी। जनहित याचिका के जरिये मामला अदालत में गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआइ जांच के आदेश दे दिए।

26 फरवरी 1996 को झामुमो सांसद शैलेंद्र महतो ने स्वीकार किया कि उन्हें सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए पैसे मिले थे। अन्य तीन झामुमो सांसदों के बैंक खातों में भी पैसे पाए गए। इसके आधार पर आरोप पत्र दाखिल हुआ। मामला अंतत: सुप्रीम कोर्ट गया। उसने 17 अप्रैल 1998 को कहा कि सदन के भीतर के किसी काम के लिए यदि सांसद रिश्वत भी लेते हैं तो भी हम कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि सांसदों को संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संरक्षण हासिल है। ऐसे ही संरक्षण की मांग के लिए झामुमो विधायक सीता सोरेन हाल में सुप्रीम कोर्ट गई तो संविधान पीठ का गठन कर दिया गया।

विधायकों-सांसदों को संवैधानिक संरक्षण तो इसीलिए है ताकि कोई उन्हें जनहित में काम करने से रोक न सके, लेकिन काम यदि ‘स्वहित’ में होने लगे तब तो सुप्रीम कोर्ट के लिए यह लाजिमी हो जाता है कि वह इस प्रावधान को परिभाषित करे। 2012 के राज्यसभा चुनाव में सीता सोरेन पर एक उम्मीदवार से पैसे लेने का आरोप लगा। सीता ने मामले को रद कराने की मांग की तो रांची हाईकोर्ट ने इन्कार कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली।

सांसदों और विधायकों पर रिश्वत लेने के आरोप लगते ही रहते हैं। कुछ आरोप साबित होते हैं और कुछ नहीं होते। इसी तरह के एक आरोप में संसद ने 23 दिसंबर 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता समाप्त कर दी थी। 2006 में सपा के एक राज्यसभा सदस्य की भी सदस्यता चली गई थी। उन पर रिश्वत लेकर सांसद निधि आवंटित करने का आरोप साबित हो गया था। वह स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे पर धरे गए थे। यदि ऐसे मामले सुप्रीम कोर्ट में गए होते तो शायद 1998 की तरह का ही निर्णय हुआ होता, क्योंकि जजों का कहना था कि संविधान ने इस मामले में अदालत के हाथ बांध रखे हैं, पर मामला संसद में गया इसलिए सदस्यता नहीं बची।

यह और बात है कि उन 11 में से एक बर्खास्त सांसद को बाद में भाजपा और दूसरे बर्खास्त सांसद को इस बार के चुनाव में कांग्रेस ने टिकट दे दिया। दरअसल उन 11 सांसदों को देश ने कैमरे पर घूस लेते देख लिया था। इस कारण पूरी राजनीति शर्मसार हो गई थी। यदि देश ने नहीं देखा होता तो शायद उनकी सदस्यता बच जाती। यदि ऐसे घूसखोर नेताओं के प्रति राजनीतिक दलों में सचमुच नफरत का भाव होता तो उन्हें बाद में टिकट नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ से किसी ऐसे कानूनी इंतजाम की उम्मीद की जा रही है ताकि राजनीतिक दल चाहते हुए भी ऐसे घूसखोरों को बाद में ‘सम्मानित’ न कर सकें।

इन सांसदों ने संसद में प्रश्न पूछने के लिए घूस ली थी। घूस देने के सारे दृश्य कैमरे में कैद कर लिए गए थे। सांसदों में कांग्रेस,भाजपा, बसपा, राजद के सांसद शामिल थे। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पवन कुमार बंसल की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। कमेटी ने आरोप सही पाए। सदन में प्रस्ताव आया और रिश्वत लेने वालों की सदस्यता समाप्त कर दी गई। इन सांसदों का बचाव उनकी पार्टियां भी नहीं कर सकीं। मायावती ने जरूर कहा कि ‘स्टिंग ऑपरेशन’ के पीछे सपा की सजिश लगती है। सांसदों के ऐसे निष्कासन का व्यापक रूप से स्वागत हुआ था। एक पत्रकार ने लिखा था कि 1950 से ही नेता यह सोचते आए हैं कि हमें कोई नहीं पकड़ सकता, पर अब यह धारणा बदली है, लेकिन उस पत्रकार की धारणा बाद में गलत साबित हुई।

मनमोहन सिंह सरकार को बचाने के लिए भी धन के लेनदेन के आरोप लगे। नोटों की गड्डियां लोकसभा में लहराई गईं। स्टिंग ऑपरेशन को दबा दिया गया। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी बढ़ गई है। उम्मीद की जा रही है कि अदालत कोई ऐसा इंतजाम करेगी ताकि भविष्य में कोई भी सांसद या विधायक संविधान की आड़ लेकर ऐसे कृत्यों को दोहरा न सकें।

 

 

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