भारत और कूटनीति

स्रोत: द्वारा संजीव पांडेय: जनसत्ता

बेशक यह खुश होने वाली खबर थी कि पहली बार इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआइसी) के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में भारत की विदेश मंत्री विशेष निमंत्रण पर पहुंची थीं। पाकिस्तान इससे परेशान था। पाकिस्तान के पुराने मित्र सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दोनों भारत को न बुलाने को लेकर पाकिस्तान के अड़ियल रवैये को मानने को तैयार नहीं थे। पाकिस्तान के आग्रह को उन्होंने स्वीकार नहीं किया। भारतीय विदेश मंत्री गर्इं, वहां उन्होंने इस्लामिक मुल्कों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया। लेकिन इस बैठक की खासियत यह थी कि एशिया की बदलती परिस्थितियों में मेजबान ने न तो भारत को नाराज किया न पाकिस्तान को। कश्मीर मसले पर जहां पाकिस्तान फिर से भारत के खिलाफ प्रस्ताव पारित करवाने में सफल रहा, वहीं भारत ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को घेरा।

अबु धाबी में इस्लामी सहयोग संगठन की बैठक तब हो रही थी जब भारत और पाकिस्तान में तनाव चरम पर था। लेकिन मेजबान संयुक्त अरब अमीरात भारत को आमंत्रित कर चुका था। पाकिस्तान इससे काफी बौखलाया। लेकिन मेजबान देशों सहित इस्लामिक मुल्कों ने पाकिस्तान को बाद में खुश कर दिया। इस बैठक में इस्लामिक देशों ने साफ संकेत दिए कि फिलहाल भारत की कीमत पर वे पाकिस्तान को नाराज नहीं करना चाहते। पाकिस्तान का महत्त्व अभी भी उनके लिए है। अबु धाबी में आयोजित इस बैठक में भारतीय विदेश मंत्री का पहुंचना निश्चित तौर पर इस्लामिक देशों की कूटनीति में भारत की बड़ी सफलता था। लेकिन इस बैठक की समाप्ति के बाद पता चला कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान अभी भी इस मंच से दुष्प्रचार करने में सफल रहा है।

पाकिस्तान ने कश्मीर में मानवाधिकार के उल्लंघन से संबंधित प्रस्ताव ही नहीं पारित करवाया, बल्कि भारत की जोरदार निंदा भी करवा दी। प्रस्ताव में भारतीय सेना की निंदा की गई थी और कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग की गई थी। लेकिन इस मसले को मुख्य अबु धाबी घोषणा में शामिल नहीं किया गया। हालांकि इस्लामी सहयोग संगठन की बैठक में भारत को बुलाए जाने को लेकर पाकिस्तान भारी विरोध कर रहा था। पाकिस्तान में इस पर लगातार बहस हुई। पाकिस्तानी संसद में अपना पक्ष रखते हुए कई विपक्षी सांसदों ने कहा कि भारतीय विदेश मंत्री को बुलाए जाने को पाकिस्तान अपनी इज्जत का मसला न बनाए। इसमें पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान वहां जाए और अपना पक्ष रखे।

भारतीय विदेश मंत्री ने इस मंच से आतंकवाद के खिलाफ जम कर बोला। यह निश्चित तौर पर पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि इसी मंच से पाकिस्तान लगातार कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। पाकिस्तान को सबसे ज्यादा तो यह अखरा कि भारत को ओआइसी में न बुलाए जाने के उसके प्रस्ताव को संयुक्त अरब अमीरात के प्रिंस मोहम्मद बिन जायद ने ठुकरा दिया था। भारत को बुलाए जाने से नाराज पाकिस्तान शुरुआती बैठक में भी नहीं पहुंचा। पाकिस्तान का प्रस्ताव ठुकराए जाने के पीछे प्रिंस मोहम्मद बिन जायद और सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान की अहम भूमिका रही है।

इसके पीछे कई कारण हैं। दोनों राजकुमार निश्चित तौर पर पाकिस्तान को नहीं छोड़ना चाहते, लेकिन भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर दोनों चिंतित हैं। आतंकवाद अब इन दोनों देशों के राजपरिवारों के लिए भी भारी चिंता का विषय है। इसलिए पाकिस्तान जो इस संगठन का संस्थापक देश है, उसके प्रस्ताव को उन्होंने नकार दिया। गौरतलब है कि इसी पाकिस्तान के विरोध के कारण ओआइसी की पहली बैठक में आमंत्रित भारतीय सदस्यों को बैठक में भाग लिए बिना वापस लौटना पड़ा था।

सुन्नी इस्लामिक देशों में भी आतंकवाद का भय समाया हुआ है। इसलिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की नीतियों में बदलाव आए हैं। हालांकि ये मुल्क लंबे समय से कट्टर इस्लाम को संरक्षण देते रहे हैं। पूरी दुनिया में आतंकवाद की जड़ बहावी इस्लाम को सऊदी अरब ने ही भारी संरक्षण दिया। लेकिन अब बहावी और कट्टर इस्लाम को संरक्षण देने वाले दोनों मुल्कों के राजपरिवारों को इस विचारधारा से खतरा महसूस हो रहा है। इन राजपरिवारों की सत्ता को उखाड़ने के लिए आतंकी संगठनों ने ही नहीं मुसलिम ब्रदरहुड ने भी काफी लंबे समय से आंदोलन चला रखा है। कुछ अफ्रीकी देशों में सत्ता परिवर्तन को लेकर सफल आंदोलन चलाने वाले मुसलिम ब्रदरहुड का मुख्य निशाना एशियाई इस्लामिक देश हैं, जिनमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं। मुसलिम ब्रदरहुड लगातार एशिया के मुसलिम देशों में तख्तापलट की कोशिश कर रहा है। इससे दोनों मुल्कों के राजपरिवार डरे हुए हैं।

वहीं एशिया में शिया बहुल ईरान पहले से ही सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के लिए सरदर्द बना हुआ है। यही कारण है कि सऊदी अरब के राजकुमार प्रिंस मोहम्मद सलमान अब बहावी इस्लाम की बजाए वास्तविक इस्लाम की बात करने लगे हैं। इन मुल्कों की नीतियों में इन बदलावों के कारण भारत इनके नजदीक आया है। सऊदी अरब और यूएई नहीं चाहते कि आर्थिक रूप से ताकतवर होता भारत ईरान के ज्यादा नजदीक हो जाए। कई सुन्नी इस्लामिक मुल्क इस सच्चाई को जानते हैं कि पाकिस्तान की सैन्य शक्ति और भूगोल इस्लामिक मुल्कों के लिए महत्त्वपूर्ण है। पर पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन कई इस्लामिक देशों के लिए भी बड़ा खतरा हैं। पेट्रोलियम और गैस के संसाधनों से युक्त सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भारत की आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करना चाहते हैं। दोनों मुल्कों को भारत में ऊर्जा का बड़ा बाजार दिख रहा है। इससे भी पाकिस्तान की परेशानी बढ़ रही है।

ओआइसी के भीतर भी गहरी राजनीति है। भारत को इससे बचना होगा। इस संगठन के सदस्य देशों के बीच ही आपस में भारी विरोध हैं। कई देश तो एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते। उनकी आंतरिक राजनीति में पड़ना भारत के लिए खतरनाक भी हो सकता है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का जोरदार विरोध सुन्नी इस्लामिक देश कतर से है। ईरान और सऊदी अरब के बीच जंग तो जगजाहिर है। दोनों मुल्क यमन में एक-दूसरे के सामने सैन्य टकराव में हैं। दोनों के बीच शिया-सुन्नी विवाद भी तनाव का बड़ा कारण है।

दिलचस्प तो यह है कि ओआइसी की बैठक में जब भी इस्लामिक देशों के भीतर शिया या सुन्नी अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की बात उठती है तो कोई हल नहीं निकलता। ईरान में सुन्नी मुसलमानों और सऊदी अरब में शिया अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का मसला लगातार उठता रहा है। लेकिन इस्लामिक सहयोग संगठन इसे हल करने में विफल रहा है। पाकिस्तान में भी शिया आबादी का उत्पीड़न किसी से छिपा नहीं है। पाकिस्तान सरकार इन सुन्नी आतंकी संगठनों की मदद करती रही है। लेकिन इस्लामिक सहयोग संगठन चुप रहा है।

भारत को खास सतर्क रहने की जरूरत इसलिए भी है कि मोहम्मद बिन जायद और मोहम्मद बिन सलमान ईरान के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। भारत को इस बैठक में बुला कर वे भारत को इस्लामिक दुनिया की आंतरिक राजनीति में भी इस्तेमाल करना चाहेंगे। वे चाहते हैं कि भारत ईरान से दूरी बनाए। पर भारत के लिए ईरान से दूरी बनाना खतरनाक होगा, क्योंकि भारत का चाबहार में भारी निवेश है। ईरान भारत के लिए अफगानिस्तान में जाने का रास्ता भी दे रहा है। इसलिए सुन्नी इस्लामिक मुल्कों की राजनीति और कूटनीति दोनों को भारत को समझना होगा।

 

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