प्रहसन ही बनती रही है सार्वभौम आय योजना

स्रोत: द्वारा विजय जोशी: बिजनेस स्टैंडर्ड

सार्वभौम बुनियादी आय (यूबीआई) का मुद्दा भारत के सार्वजनिक विमर्श एवं राजनीतिक बहस में दाखिल हो चुका है। विभिन्न योजनाओं में इस शब्दावली का इस्तेमाल हुआ है। तेलंगाना की रैयत बंधु योजना, मोदी सरकार के हालिया अंतरिम बजट में छोटे किसानों के लिए मदद की घोषणा और राहुल गांधी का सरकार में आने पर सभी गरीबों की आय सुनिश्चित करने का वादा, इन सभी में यूबीआई का प्रावधान है। मैंने अपनी किताब (इंडियाज लॉन्ग रोड, पेंग्विन इंडिया, 2016) में सार्वभौम आय योजना के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव रखा था। इसके अलावा इंडियन जर्नल ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट (2017) में प्रकाशित अपने लेख में भी इस पर अपनी राय रखी थी। इस तरह एक तरह का संतुष्टि भाव रखने के लिए मुझे माफ किया जा सकता था लेकिन मेरी प्रतिक्रिया ऐसी नहीं रही है। 'बुनियादी आय' के नाम पर सामने आ रही योजनाओं को देखकर तो मैं स्तंभित होने की हद तक निराश हूं।

बुनियादी आय की विशुद्ध अवधारणा देश के हरेक नागरिक को सम्मानजनक जीवन के लिए एक शर्त-रहित एवं सार्वभौम नकद हस्तांतरण का प्रावधान करती है। 'अच्छी आय' की मात्रा तय करने का काम काफी लचीला है, लिहाजा व्यावहारिक स्तर पर इस आदर्श को वित्तीय संदर्भ में हासिल कर पाना नामुमकिन है और इस अवधारणा में थोड़ी काटछांट करना अपरिहार्य है। मेरे हिसाब से, भारत में यूबीआई योजना के लिए नकद हस्तांतरण का प्रावधान तेंडुलकर गरीबी रेखा (टीपीएल) और भारत की गरीब जनसंख्या की औसत आय में अंतर के बराबर रखने की बात कही गई थी। जिसे जीवनयापन की लागत के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

यह फासला टीपीएल का करीब 25 फीसदी यानी प्रति व्यक्ति 3,500 रुपये के बराबर है। वर्ष 2019-20 की कीमतों के आधार पर यह फासला प्रति व्यक्ति 4,000 रुपये और प्रति परिवार 20,000 रुपये प्रति वर्ष बैठता है। हस्तांतरित होने वाली यह राशि अधिक नहीं है लेकिन गरीबों की जिंदगी में सार्थक अंतर पैदा करने के लिए यह काफी है। मैंने इस तरह की 'यूबीआई पूरक ' योजना के लिए उर्वरक सब्सिडी जैसी गैर-योग्यता कीमत सब्सिडी को खत्म कर संसाधन बढ़ाने की वकालत की थी। ऐसी सब्सिडी जमीनी स्तर पर प्रभाव डालने के मामले में निष्प्रभावी साबित हुई हैं।

मैंने दिखाया कि इस स्तर पर सार्वभौम बुनियादी आय योजना (यूबीआईएस) लागू करने में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.5 फीसदी से अधिक लागत नहीं आएगी। ध्यान रखें कि गैर-योग्यता वाली सब्सिडी (जीडीपी की 5.5 फीसदी) का उन्मूलन राजकोषीय स्थान बनाने का केवल एक संभावित स्रोत है। संसाधन दूसरे तरीकों से भी जुटाए जा सकते हैं। मसलन, काफी हद तक अक्षम हो चुके कुछ सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर कुछ वर्षों तक सालाना जीडीपी की एक फीसदी रकम जुटाई जा सकती है। इसी तरह अनावश्यक कर रियायतों के खात्मे से जीडीपी की 1.5 फीसदी राशि मिल सकती है। एक सीमा से अधिक कृषि आय पर भी कर लगाकर 0.5 फीसदी जीडीपी जुटाई जा सकती है। गलत तरीके से लक्षित कल्याणकारी योजनाओं को बंद करने से भी जीडीपी की 1.5 फीसदी राशि मिल सकती है। जीडीपी की 10 फीसदी राशि की संभावना तैयार होने के बाद 3.5 फीसदी जीडीपी व्यय वाली एक सार्वभौम बुनियादी आय योजना लागू की जा सकती है।

इसके अलावा सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे सामाजिक व्यय को भी बढ़ाया जा सकता है। बाकी राशि का इस्तेमाल समेकित राजकोषीय घाटे को कम करने में किया जा सकता है। इस तरह एक सार्वभौम आय योजना अगले कुछ वर्षों में हासिल किए जा सकने लायक एक सुसंगत सुधार कार्यक्रम में फिट बैठ सकती है जिसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारें आंशिक रूप से वित्त मुहैया कराएंगी।  इस तरह एक सुसंगत सुधार रणनीति के अंग के तौर पर सार्वभौम एवं बिना-शर्त बुनियादी आय पूरक योजना व्यवहार्य होगी।

इसके साथ ही अक्सर दोहराया जाने वाला वह एतराज भी गलत है कि दूसरे बड़े लक्ष्यों को तिलांजलि देकर ही इसे लागू किया जा सकता है। सार्वभौमिकता को त्याग कर और दो-तिहाई जनसंख्या तक इस योजना का दायरा सीमित कर राजकोषीय लागत में आगे और कमी लाई जा सकती है। बाकी एक-तिहाई आबादी को अपेक्षाकृत साधन-संपन्न माना जाता है। हालांकि इस प्रक्रिया में सही व्यक्ति की पहचान की समस्या खड़ी होगी लेकिन आयकर, पांच एकड़ से अधिक जमीन का स्वामित्व और कार या मोटरसाइकिल जैसी महंगी उपभोक्ता वस्तुओं की मौजूदगी जैसे मानकों के आधार पर ऐसा किया जा सकता है। इस तरह की आंशिक सार्वभौम आय योजना लागू करने पर जीडीपी का 2.3 फीसदी खर्च ही आएगा। लेकिन कवरेज में आगे और कटौती से परहेज किया जाना चाहिए क्योंकि इससे लाभार्थियों की पहचान की बड़ी समस्या खड़ी होने के साथ ही सार्वभौम आय योजना का मूल मकसद ही धराशायी हो जाएगा।

हाल के समय में सुर्खियां बनने वालीं बुनियादी आय योजनाएं कवरेज और राजकोषीय निहितार्थ के संदर्भ में वास्तविक लक्ष्यों से दूर ही रही हैं। रैयत बंधु और कलिया योजनाओं में कवरेज सीमित है और कई ग्रामीण एवं शहरी गरीबों को उससे बाहर रखा गया है। मोदी सरकार की तरफ से घोषित योजना पर भी यही बात लागू होती है। इसके अलावा इसकी आय समर्थन योजना का स्तर इतना कम रखा गया है कि उससे कोई सार्थक फर्क पैदा हो पाना मुश्किल है। राजकोषीय नजरिये से मोदी सरकार की यह योजना न तो सब्सिडी पर हमला करती है और न ही वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए संसाधन जुटाने में ही कोई योगदान देती है। इस वजह से मोदी सरकार की यह योजना एक सुसंगत रणनीति का हिस्सा नहीं है। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भारत में शुरू की गई हालिया आय समर्थन योजनाएं अपने मकसद पर खरी नहीं उतरती हैं। वे तो महज लोक-लुभावन प्रयास हैं।

वहीं राहुल गांधी की प्रस्तावित आय योजना के बारे में कोई ब्योरा नहीं दिया गया है। बदकिस्मती से, इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों का कर्ज माफ करने का भी प्रस्ताव उनकी तरफ से रखा गया जिससे बड़ी नैतिक समस्या भी खड़ी हो सकती है। अगर कांग्रेस अपने घोषणापत्र में कर्ज माफी की योजना लाने का प्रस्ताव नहीं शामिल करती है और एक दो-तिहाई आबादी को कवर करने वाली सार्वभौम बुनियादी आय योजना का खाका पेश करती है तो अच्छा होगा। इस योजना के लिए धन का इंतजाम सक्षमता, वृद्धि एवं समतामूलक ढंग से जुटाई जाने वाली राशि से होगा। भारत के लिए सही मायने में एक बुनियादी आय योजना का क्रियान्वयन आश्चर्यजनक होगा। हालांकि अभी तक तो इस विचार के नाम पर प्रहसन ही देखने को मिले हैं।

 

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