भारतीय टेलीविजन बाजार को रफ्तार देता असली ड्रामा

स्रोत: द्वारा वनिता कोहली-खांडेकर: बिजनेस स्टैंडर्ड

भारत में टेलीविजन देखने वालों की संख्या, उनमें मौजूद विविधता और एक ही तरह के नतीजे होने का अहसास। टेलीविजन दर्शक संख्या के बारे में आकंड़े जारी करने वाली संस्था ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) की रिपोर्ट 'व्हाट इंडिया वॉच्ड 2018' देखकर इसी तरह का भाव पैदा हुआ।

बार्क अपने आंकड़े देश भर के चुनिंदा 40,000 घरों के करीब 1.80 लाख लोगों से मिले इनपुट के आधार पर जारी करती है। इस लिहाज से टीवी दर्शकों के आकलन के लिए बार्क दुनिया की सबसे बड़ी प्रणाली संचालित कर रही है। दुनिया के दूसरे बड़े टीवी बाजार भारत में विज्ञापनदाताओं, प्रसारकों और मीडिया एजेंसियों के साझे उद्यम के तौर पर शुरू बार्क देश के कुल 595 चैनलों पर नजर रखती है।

इन आंकड़ों से टीवी उद्योग को वह मुद्रा मिल जाती है जिसके जरिये 5.6 अरब डॉलर आकार वाले विज्ञापन एवं कंटेंट राजस्व पर व्यय होता है। भारत के मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग का करीब 45 फीसदी हिस्सा टेलीविजन  कारोबार (74,000 करोड़ रुपये) का है और 45 लाख लोगों को इसमें रोजगार मिला हुआ है। विज्ञापनदाता, प्रसारक, निवेशक या कंटेंट निर्माण की गतिविधियों पर नजर रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए बार्क के आंकड़े काफी अहम होते हैं।

सबसे पहले आंकड़ों पर गौर करते हैं। भारत के 19.7 करोड़ घरों में रहने वाले 83.6 करोड़ लोग टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम देखते हैं। सामान्य मनोरंजक कार्यक्रमों से लेकर फिल्में, खेल और समाचार तक इन चैनलों पर देखे जाते हैं। इसके पहले वर्ष 2016 में जब यह सर्वे किया गया था तो टीवी दर्शकों की संख्या 79 करोड़ आंकी गई थी।

वर्ष 2017 की तुलना में 2018 में टीवी दर्शकों की संख्या 13 फीसदी बढ़ी है। इस अवधि में 75 नए टीवी चैनल शुरू हुए और हर हफ्ते टीवी पर कुल 24,076 फिल्में प्रसारित की गईं। ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर कार्यक्रम देखने के शौकीनों के लिए यह आंकड़ा मायने रखता है कि करीब 48 करोड़ भारतीयों ने रोजाना 50 मिनट ऑनलाइन वीडियो देखा। दूसरी तरफ टीवी पर एक दर्शक हफ्ते में औसतन 3.45 घंटे व्यतीत करता है। इससे पता चलता है कि ऑनलाइन कंटेंट की वृद्धि टीवी के लिए नुकसानदायक न होकर असल में पूरक साबित हुई है।

दूसरा निष्कर्ष भारत की विविधता से संबंधित है और यह पहलू मुझे हमेशा विस्मृत करता है। भारत के 29 राज्यों और 22 प्रमुख भाषाओं से जुड़ी सामाजिक वास्तविकता टीवी देखने की हमारी आदतों में भी झलकती है। हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड और बांग्ला यहां की प्रमुख भाषाएं हैं। यह देखना दिलचस्प है कि हिंदी चैनलों की तुलना में तमिल, तेलुगू एवं अन्य सामान्य मनोरंजक चैनलों के दर्शक अधिक समय तक टीवी देखते हैं।

कुल टीवी दर्शकों में से 53 फीसदी से अधिक लोग सामान्य मनोरंजन चैनल देखते हैं और उसमें भी ड्रामा कार्यक्रम देखने वालों की संख्या अधिक है। इसका मतलब है कि भारतीय टेलीविजन जगत पर फिक्शन का दबदबा कायम है। ओटीटी कंटेंट के विश्लेषण से भी यही बात साबित होती है। सामान्य मनोरंजन चैनलों के बाद फिल्में दिखाने वाले चैनलों का स्थान आता है जिनकी दर्शक संख्या वर्ष 2010 के महज 12 फीसदी से बढ़कर अब 24 फीसदी तक जा पहुंची है।

फिल्में टीवी की तरह ओटीटी में भी काफी अहम स्थान रखती हैं और पुरुष-महिला या ग्रामीण-शहरी दर्शकों- हर किसी पर यह लागू होता है। दुर्भाग्य से समाचार चैनल 7.2 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर हैं। लगता है कि खबरों की प्रस्तुति के मानदंडों में आई गिरावट ने समाचार चैनलों की तरफ अधिक दर्शकों को आकर्षित किया है। मेरी नजरें खेल कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों की संख्या में उछाल संबंधी आंकड़े ढूंढ रही थीं। आखिर कबड्डी, बैडमिंटन और फुटबॉल को लेकर पिछले कुछ वर्षों में काफी हो-हल्ला हुआ है। प्रसारण व्यवसाय और खेल पारिस्थितिकी दोनों पर क्रिकेट इस कदर हावी रहा है कि बाकी दूसरे खेल दब ही गए। लेकिन कबड्डी टूर्नामेंट एक बड़ी राहत लेकर आए हैं।

खेल प्रसारण में क्रिकेट के बाद दूसरे स्थान पर कबड्डी ही है और इसका हिस्सा 15 फीसदी तक पहुंच चुका है। लेकिन खेल दर्शकों की संख्या कई वर्षों तक 2 फीसदी पर स्थिर रहने के बाद पिछले साल तीन फीसदी तक पहुंची है। आज के समय में टेलीविजन पर कई तरह के खेल कार्यक्रम कई भाषाओं में उपलब्ध हैं, फिर भी उनकी वृद्धि क्यों नहीं हो पा रही है?

इसी से तीसरी महत्त्वपूर्ण बात भी पता चलती है। चीजें किस तरह वैसे ही बनी रहती हैं। सामान्य मनोरंजन, फिल्मों, बच्चों और खेल कार्यक्रमों का अनुपात मोटे तौर पर पिछले 18 वर्षों से वही बना हुआ है। सामान्य मनोरंजन चैनल देखने वालों की संख्या अमूमन कुल दर्शकों की आधी रही है जबकि किड्स चैनल की हिस्सेदारी 5-6 फीसदी रही है। हालांकि फिल्में प्रसारित करने वाले चैनलों की दर्शक संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। भारत में निजी चैनलों का प्रसारण शुरू होने के 28 साल बाद भी ड्रामा, फिल्म और समाचार टीवी दर्शक संख्या को रफ्तार दे रहे हैं। 1990 के दशक में तारा और अमानत जैसे सीरियल थे तो अब नागिन एवं इश्क सुभान अल्ला मौजूद हैं।

ओटीटी के लिए भी यही सच है। नेटफ्लिक्स के ग्राहकों की संख्या में उस समय जबरदस्त उछाल आई जब गत जून में उसने पहला भारतीय ओरिजिनल कार्यक्रम सेक्रेड गेम्स रिलीज किया। हमें अब भी अच्छी कहानियों की तलाश रहती है और ऐसी कहानियां हमें सामान्य चैनलों या मूवी चैनलों पर ही देखने को मिलती हैं। कभी-कभी समाचार चैनल भी बेहद नाटकीय अंदाज में खबरें पेश करते हैं और घटनाओं को फिक्शन की तरह दिखाते हैं, लेकिन हर बार एक कहानी की तलाश ही हमें स्क्रीन की तरफ रुख करने के लिए मजबूर करती है।

 

 

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