अंतरिक्ष में कचरे की चुनौती

स्रोत: द्वारा संजय सिंह: जनसत्ता

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अंतरिक्ष में प्रक्षेपास्त्र छोड़ कर अपने उपग्रह को मार गिराना और यह क्षमता हासिल करना भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन भारत की इस उपलब्धि के बाद अंतरिक्ष में कचरे का एक नया विवाद शुरू हो गया है। अमेरिका ने इस पर तुरंत चेतावनी दी। वैसे भी, अंतरिक्ष में कचरा चिंता का एक पुराना विषय है और अमेरिका इस पर बोलता रहा है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अंतरिक्ष यात्री मार्थियस मॉरर ने कहा कि किसी उपग्रह को नष्ट करना और मनमाने तरीके से अंतरिक्ष में मलबा पैदा करना एक जिम्मेदार अंतरिक्ष शक्ति का प्रतीक नहीं है।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 2011 में ही चेतावनी दी थी कि अंतरिक्ष में ‘कचरा’ खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका की नेशनल रिसर्च काउंसिल (एनआरसी) ने एक रिपोर्ट में कहा है कि बेकार हुए बूस्टर और पुराने उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में पृथ्वी के आसपास चक्कर लगा रहे हैं। इनसे अंतरिक्ष यान और उपयोगी उपग्रह नष्ट हो सकते है। इसलिए, कोई भीषण दुर्घटना होने से पहले अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को इन्हें हटाने का काम करना चाहिए।

(एनआरसी) ने तभी अंतरिक्ष में जमा हुए कचरे को सीमित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम बनाने जाने की जरूरत बताई थी। भारत से पहले चीन ने 2007 में ऐसी ही उपग्रह मार गिराने वाली मिसाइल का परीक्षण किया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी काफी आलोचना हुई थी। असल में उस समय मौसम संबंधी आंकड़े एकत्र करने वाला एक पुराना उपग्रह नष्ट हो गया था और इसके डेढ़ लाख हिस्से अंतरिक्ष में बिखर गए थे जो एक सेंटीमीटर के आसपास के हैं। इसके दो साल बाद पृथ्वी के कक्षा में एक सक्रिय उपग्रह और एक पुराने उपग्रह की टक्कर हो गई थी। इससे भी काफी कचरा हुआ था। चीन ने अपनी क्षमता के परीक्षण के समय एक पुराने मौसम उपग्रह को आठ सौ पैंसठ किलोमीटर की ऊंचाई पर मार गिराया था।

इसलिए, अब भारत के सफल एंटी-मिसाइल परीक्षण पर अमेरिका ने अंतरिक्ष कचरे की चिंता जताई है। अमेरिका के कार्यवाहक रक्षा मंत्री पैट्रिक शानाहान का कहना है कि इस तरह के परीक्षण से अंतरिक्ष में कचरा पैदा होता है। अमेरिका ने खुद यह परीक्षण 1959 में ही कर लिया किया था। पैट्रिक का कहना है कि अमेरिका भारत के इस दावे का अध्ययन कर रहा है कि उसने अंतरिक्ष में कचरा नहीं छोड़ा है। अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा ऐसा देश है जिसने इस तरह का परीक्षण किया है। दूसरी ओर, इस संकट का समाधान करने के लिए अमेरिका ने अंतरिक्ष में कचरे को नियंत्रित करने के लिए चुंबकीय जाली या विशालकाय छतरी के उपयोग की संभावना पर शोध की जरूरत पहले ही बताई थी।

एनआरसी के शोध का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिक डोनल्ड कैसलर ने कहा था कि चीन के परीक्षण और दो उपग्रहों की टक्कर से पृथ्वी की कक्षा में कचरे की मात्रा दुगनी हो गई है और कचरा कम करने के पच्चीस साल के प्रयासों पर पानी फिर गया। खास बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन को भी इस कचरे से बचना पड़ता है। पृथ्वी की कक्षा में कचरे के टुकड़े ये साढ़े सत्रह हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हैं। हालांकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि इन बातों का ख्याल रखते हुए उसने जानबूझ कर ‘मिशन शक्ति’ का परीक्षण कम ऊंचाई पर किया है, ताकि कचरा अंतरिक्ष में न रहे और तत्काल पृथ्वी पर गिर जाए। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने भारत के इस दावे पर संदेह जताया है। उनका कहना है कि अंतरिक्ष में मलबे को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और वह किस ओर जाएगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। अमेरिकी सेना भारत के इस परीक्षण से उत्पन्न मलबे के टुकड़ों पर नजर रखे हुए है। अमेरिका ने कहा है कि वह अंतरिक्ष और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में भारत के साथ हितों को साझा करना जारी रखेगा।

अंतरिक्ष में कचरे की समस्या विज्ञान की प्रगति से जुड़ी हुई है। एक-एक कर सभी देश तरक्की करेंगे और सब अपनी जरूरतों के अनुसार अंतरिक्ष में उपग्रह तैनात करेंगे तो वहां भीड़ बढ़ेगी और इससे हादसों का खतरा भी बढ़ेगा। मोबाइल और जीपीएस जैसे नेटवर्क और टेलीविजन प्रसारण से लेकर बहुत कुछ अंतरिक्ष में स्थापित भिन्न उपग्रहों के कारण संभव होता है और लगातार आसान, सुविधाजनक और सस्ता होता जा रहा है। इससे अंतरिक्ष में भीड़ बढ़ रही है और ऐसे कचरे की समस्या कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईएसए) का कहना है कि यदि उपग्रहों और रॉकेटों से होने वाले अंतरिक्ष के कचरे को पृथ्वी की कक्षा से साफ नहीं किया गया तो दुर्घटनाओं का खतरा और बढ़ेगा और उपग्रह ऑपरेटरों को अरबों-खरबों का नुकसान हो सकता है।

इस समय अंतरिक्ष में कचरे का जो घनत्व है, उससे पांच साल में एक बार टक्कर की आशंका है। ऐसी टक्कर से किसी भी देश का कोई भी उपग्रह बैठ सकता है और बहुत सारी सुविधाएं बंद हो जाएंगी। कचरा जितना ज्यादा होगा, दुर्घटना की आशंका उतनी ज्यादा होगी। उपग्रहों की बढ़ती संख्या से भी यह खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इन्हें नष्ट करना और नियंत्रित नहीं कर पाना ऐसे खतरे को कई गुना बढ़ाना है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने 2012 में ‘क्लीन स्पेस’ मुहिम शुरू की है, जिसका लक्ष्य अंतरिक्ष से कचरे को हटाने और सुरक्षा बढ़ाने के लिए तकनीक का विकास करना है। शोधकर्ता विभिन्न विकल्पों पर काम कर रहे हैं। लेकिन इस मिशन पर जाने और कचरे को वापस लाने के लिए धन जमा करने का फैसला इस ऐजेंसी के बीस सदस्यों को करना होगा जिसमें जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन शामिल हैं।

ब्रिटेन के एक उपग्रह ने पृथ्वी की कक्षा में अंतरिक्ष के कचरे को इकट्ठा करने के लिए एक जाल लगाया है। प्रयोग के तौर पर शुरू की गई यह कोशिश उन प्रयासों का हिस्सा है, जिसके ज़रिए अंतरिक्ष को कचरा मुक्त बनाने की योजना है। यह जाल पृथ्वी से तीन सौ किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर लगाया गया है। समझा जाता है कि करीब साढ़े सात हजार टन कचरा पृथ्वी की कक्षा में तैर रहा है, जो भिन्न उद्देश्यों से तैनात उपग्रहों के लिए खतरा हैं। अगर वास्तव में ऐसा हो पाएगा तो कचरे को उपग्रह की मदद से जाल इसे पृथ्वी की कक्षा से बाहर कर देगा। वैसे तो भारत को उपग्रह मार गिराने वाली क्षमता की जरूरत शायद ही कभी पड़े। लेकिन वक्त के साथ इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता।

अगर कभी किसी ने जासूसी करने वाला कोई उपग्रह तैनात कर दिया तो इस क्षमता की जरूरत पड़ेगी। हालांकि, यह भी अंतरराष्ट्रीय नियमों और व्यवहार के अनुसार ही होगा। इस कामयाबी के बाद भारत अब दुनिया के शक्तिशाली मुल्कों की जमात में शामिल हो गया है, और भारत के लिए यह जरूरी भी था कि वह दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराए। देश की रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने विश्वस्तर की हथियार प्रणालियों और उपकरणों के विकास और उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए काफी कुछ हासिल कर लिया है। एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का विकास और सफल प्रयोग इसरो और डीआरडीओ की साझा कोशिशों की एक बड़ी मिसाल है।

 

Print Friendly, PDF & Email