पूर्व और दक्षिण की खाई

स्रोत: द्वारा टी. एन. नाइनन: बिजनेस स्टैंडर्ड

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो हम सम्मिलन के दौर से गुजर रहे हैं, जहां कई गरीब देशों की आय अमीर देशों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है। ऐसे में दोनों के बीच का अंतर कम हुआ है। परंतु देश के भीतर अमीर और गरीब के बीच की इस खाई के दूर होने की बात करें तो हकीकत यह है कि ऐसा नहीं हुआ है बल्कि इसमें इजाफा ही हुआ है।

कर राजस्व की बात करें तो मध्य प्रदेश के कर संसाधन कर्नाटक की तुलना में आधे हैं (इसमें केंद्र से हस्तांतरित राशि शामिल नहीं है) जबकि उसकी आबादी 20 फीसदी अधिक है। उत्तर प्रदेश की आबादी तमिलनाडु से ढाई गुना है लेकिन दोनों के कर संसाधन लगभग समान हैं। अनुमान के मुताबिक ही बिहार का स्थान काफी नीचे है। उसकी आबादी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सम्मिलित आबादी से ज्यादा है लेकिन उसके कर संसाधन इन दोनों तेलुगू भाषी राज्यों का केवल 12 प्रतिशत हैं। ओडिशा के कर संसाधन केरल से आधे हैं लेकिन आबादी 30 फीसदी ज्यादा है।

केंद्रीय हस्तांतरण से कुछ ही भरपाई हो पाती है। मध्य प्रदेश को कर्नाटक की तुलना में केंद्र से दो तिहाई अधिक धन मिलता है और बिहार को तेलुगू भाषी राज्यों से 50 फीसदी अधिक। सामाजिक क्षेत्र के प्रति व्यक्ति व्यय की बात करें तो वह गरीब राज्यों में अभी भी कम बना हुआ है। अगर पिछड़े राज्यों को अन्य राज्यों की बराबरी करनी है तो यह ठीक नहीं है। बिहार सामाजिक क्षेत्र में प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 76 रुपये व्यय करता है जबकि केरल 139 रुपये खर्च करता है। उत्तर प्रदेश में यह 69 रुपये जबकि महराष्ट्र में 120 रुपये है। पश्चिम बंगाल में प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति सामाजिक व्यय 95 रुपये और कर्नाटक में 124 रुपये है। कुछ अपेक्षाकृत पिछड़े राज्यों का प्रदर्शन बेहतर है। छत्तीसगढ़ में यह व्यय 150 रुपये और ओडिशा में 115 रुपये है लेकिन आमतौर पर उन्हीं राज्यों का प्रदर्शन बेहतर है जो समृद्घ हैं।

निजी क्षेत्र के निवेश में यह असमानता अधिक मुखर होकर सामने आती है। मसलन उड़ानों की संख्या, अच्छे रोजगार आदि की संख्या इसकी बानगी हैं। देश के पूर्वी और उत्तरी इलाकों में स्थित गरीब राज्यों को केंद्रीय हस्तांतरण की भरपाई दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों के कर संसाधन सहयोग से होती है। अब तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया है लेकिन पिछले साल से विरोध की आवाजें उठने लगी हैं जब यह बात जाहिर हो गई कि वित्त आयोग (जो राज्यों को केंद्रीय स्थानांतरण का निर्धारण करता है) से गरीब राज्यों का हस्तांतरण बढ़ाया जा सकता है।

यह इजाफा उन राज्यों की कीमत पर होना है जहां से अधिक राजस्व आता है। निश्चित तौर पर 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के आगमन के बाद उम्मीद की गई थी कि वह राज्य जीएसटी का पैसा उत्पादक राज्यों से खपत करने वाले राज्यों को हस्तांतरित करेगा। यह भी एक वजह थी जिसके चलते बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी का विरोध किया था। उन्हें राज्य को राजस्व हानि होने का डर था। चौंकाने वाली बात है कि ऐसा नहीं हुआ। संभव है भविष्य में ऐसा हो।

इस बीच राज्यवार लोकसभा सीट के आवंटन का मुद्दा करीब आधी सदी से अटका हुआ है। जबकि देश के पूर्वी और उत्तरी बीमारू राज्यों में आबादी, दक्षिण की तुलना में अधिक बढ़ी है। आज परिणाम यह है कि बिहार में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में औसतन 26 लाख मतदाता हैं जबकि केरल में इनकी तादाद 16.5 लाख, मध्य प्रदेश में 25 लाख है और तमिलनाडु में 18.4 लाख है।

राज्यवार सीटों के आवंटन की समीक्षा का काम 2026 में निर्धारित है। अगर उस वक्त निर्णय लिया गया कि प्रति सीट नागरिकों का अनुपात समान किया जाए तो उम्मीद की जानी चाहिए कि दक्षिण भारत से इसका तीखा विरोध होगा। इस बीच अगर मौजूदा सीट आवंटन को निरंतर जारी रखा गया तो विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व में और अधिक असमानता आएगी क्योंकि दक्षिण के राज्यों की आबादी उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है। एक बात तो स्पष्ट है कि राज्यों में वित्तीय समता और लोकसभा के प्रतिनिधित्व में समता एक साथ नहीं लाई जा सकती। परंतु, अगर असमानताओं को यूंही जारी रहने दिया गया तो हालत और बिगड़ती जाएगी जो किसी भी दृष्टिï से उचित नहीं है। इन मुद्दों को फिलहाल टाला जा सकता है लेकिन वह कोई हल नहीं है।

 

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