कारगर उपाय नहीं सस्ता कर्ज

स्रोत: डॉ भरत झुनझुनवाला: दैनिक जागरण

भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले छह महीनों में तीन बार ब्याज दरों में कटौती की है। इसके पीछे दलील है कि इससे उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेकर उपभोग की वस्तुएं खरीदना एवं उद्यमियों द्वारा फैक्ट्री लगाना आसान हो जाएगा। परिणामस्वरूप मांग जोर पकड़ेगी और अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। ब्याज दर में कटौती का यह वांछित परिणाम इस बात पर टिका हुआ है कि उपभोक्ता कर्ज लेकर उपभोग को बढ़ाएंगे या नहीं? इसका कारण है कि उपभोक्ता कर्ज तभी लेगा जब उसे भविष्य में आय की संभावना दिखेगी। जैसे यदि किसी का मासिक वेतन एक लाख रुपये है तो वह निश्चित रूप से कर्ज लेकर कार खरीद सकता है, लेकिन यदि किसी की नौकरी छूट गई है तो भले ही कर्ज कितना सस्ता हो वह कार खरीदने का इच्छुक नहीं होगा। ऐसे में देखना चाहिए कि क्या आम आदमी की आय इस अनुपात में बढ़ रही है जिससे वह कार आदि खरीदने में रुचि दिखाएगा?

इस समय उपभोक्ता की आय पर पहला संकट मुक्त व्यापार का है। हमारे आयात निरंतर बढ़ रहे हैं जबकि निर्यात दबाव में हैं। भारत में माल के उत्पादन की लागत अधिक आती है। इसके तीन कारण दिखते हैं। पहला कारण भ्रष्टाचार है। जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार अभी भी व्याप्त है। दूसरा कारण न्यायपालिका है। यदि खरीदार पैसा अदा न करे और न्यायपालिका में मामला दायर करना पड़े तो उद्यमी के पसीने छूट जाते हैं। पांच साल के बाद निर्णय होता है और तब तक पानी उद्यमी के सिर के ऊपर से गुजर चुका होता है। तीसरा कारण है कि भारत में चीन की तुलना में प्रदूषण नियंत्रण के कानून ज्यादा प्रभावी हैं। प्रदूषण नियंत्रण का बोझ भी हमारे उद्यमियों पर पड़ता है। इन कारणों से भारत में उत्पादन लागत अधिक आती है और हमारे निर्यात दबाव में हैं।

निर्यात उद्योगों जैसे गलीचा अथवा खिलौने में रोजगार कम हो रहे हैं और आम आदमी को भविष्य में आय बढ़ने पर संदेह बना हुआ है। इसलिए ब्याज में कटौती के बावजूद उसके कर्ज लेकर उपभोग बढ़ाने में संदेह है। दूसरा कारण सरकार का आधुनिकता के प्रति मोह दिखता है। सरकार ने मेक इन इंडिया, नोटबंदी एवं जीएसटी के माध्यम से बड़े उद्योगों को बढ़ावा दिया है। छोटे उद्योगों का संकुचन हुआ है। यही कारण है कि सेंसेक्स उछल रहा है जो कि बड़े उद्योगों की सुधरती स्थिति को दर्शाता है, लेकिन देश की आर्थिक विकास दर नरम पड़ी हुई है जो समग्र अर्थव्यवस्था के ठहराव को दिखाती है।

छोटे उद्योगों के संकुचन से रोजगार कम हो रहे हैं। उपभोक्ता को भविष्य में आय पर भरोसा नहीं है। वह कर्ज लेकर कार खरीदने को तत्पर नहीं दिखता। तीसरा कारण सरकारी खर्च की दिशा का है। सरकार अपनी आय से अधिक खर्च को पोषित करने के लिए बाजार से उधार लेती है। इस उधारी को वित्तीय घाटा कहा जाता है। सरकार का वित्तीय घाटा वर्ष 1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 7.6 प्रतिशत था। इस वर्ष फरवरी में पेश किए गए अंतरिम बजट में चालू वर्ष वित्त वर्ष के लिए वित्तीय घाटे का अनुमान 3.5 प्रतिशत बताया गया है।

सरकार का वित्तीय घाटा 7.6 प्रतिशत से घटकर 3.5 प्रतिशत हो गया है। इसमें 4.1 प्रतिशत की भारी कटौती हुई है। देखना है कि यह कमी किस प्रकार के सरकारी खर्चो में कटौती करके हासिल की गई है। सरकार के खर्च दो प्रकार के होते हैं-राजस्व खर्च यानी खपत और दूसरा पूंजीगत खर्च यानी निवेश। खपत में सरकारी कर्मियों के वेतन, पुलिस, राजस्व आदि आते हैं जबकि पूंजीगत निवेश में हाईवे बनाना आदि आते हैं। सरकार की प्राप्तियों और राजस्व खर्चो अथवा खपत का जो अंतर होता है उसे राजस्व घाटा कहते हैं। सरकार का राजस्व घाटा 1990-91 में जीडीपी का 3.2 प्रतिशत था जो चालू वर्ष 2019-20 में 2.6 प्रतिशत होने का अनुमान है। यानी सरकार की खपत में 0.6 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई है। सरकार के कुल खर्चो में 4.1 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है जबकि राजस्व खर्चो में 0.6 प्रतिशत की मामूली गिरावट। शेष 3.5 प्रतिशत की कटौती सरकार के पूंजीगत खर्च में हुई है।

वर्तमान सरकार की खपत मूल रूप से पूर्ववर्ती स्तर पर कायम है जबकि निवेश में भारी कटौती हुई है। सरकार के राजस्व खर्चो अथवा खपत का बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन अथवा ठेकेदारों को जाता है। इनके द्वारा अपनी आय का एक हिस्सा सोना खरीदने में अथवा विदेश में जमा कराने में किया जाता है। इस प्रकार राजस्व खर्चो अथवा खपत का एक हिस्सा रिसकर बाहर चला जाता है। राजस्व खर्चो अथवा खपत के पूर्ववत बने रहने से रिसाव बना हुआ है और अर्थव्यवस्था मंद पड़ी हुई है। सरकार ने अपने कुल खर्च अथवा वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने में सफलता पाई है। इसके लिए वह प्रशंसा की पात्र है, लेकिन यह नियंत्रण गलत तरीके से हासिल किया गया है।

सरकार को चाहिए था कि अपने राजस्व खर्चो अथवा खपत में कटौती करती और पूंजीगत व्यय को पूर्ववत बनाए रखती। पूंजीगत व्यय बढ़ने से हाईवे इत्यादि बनाने से बाजार में सीमेंट और लोहे की मांग बढ़ती और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। इसकी तुलना में राजस्व खर्चो अथवा खपत से देश की पूंजी का रिसाव होता है और अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ती है। सरकार ने गलती यह की है कि राजस्व व्यय में कटौती न करके पूंजीगत व्यय में कटौती की है जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था मंद पड़ी हुई है। इन कारणों से उपभोक्ता को आने वाले समय में आय में वृद्धि का भरोसा नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था की हालत उस हृदय रोगी के समान है जिसका इलाज हड्डी के डॉक्टर द्वारा किया जा रहा हो। अर्थव्यवस्था का रोग आर्थिक नीतियों का है, लेकिन उसका उपचार रिजर्व बैंक के डॉक्टर द्वारा किया जा रहा है। जब अर्थव्यवस्था में आम आदमी को भविष्य में अपनी आय बढ़ने का भरोसा ही नहीं है तो वह कर्ज लेकर कार क्यों खरीदेगा?

सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अपनी तीन नीतियों में परिवर्तन करना चाहिए। पहला अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सबक लेते हुए संरक्षणवाद को अपनाना चाहिए। भारत में भ्रष्टाचार, न्यायपालिका और प्रदूषण नियंत्रण के खर्च के करण हमारे उद्योगों पर लागत का जितना बोझ बढ़ता है उसी अनुपात में चीन से होने वाले आयात पर आयात कर बढ़ा देने चाहिए जिससे हमारे उद्यमी उनसे प्रतिस्पर्धा में टिक सकें। दूसरे, सरकार को मेक इन इंडिया के अंतर्गत बड़ी स्वदेशी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मोह छोड़कर अपने छोटे उद्योगों को संरक्षण देना चाहिए। जीएसटी आदि में उन्हें छूट देनी चाहिए जिससे वे बड़ी कंपनियों के सामने टिक सकें और रोजगार सृजन कर सकें। तीसरे, सरकार को वित्तीय घाटे के नियंत्रण को लक्ष्य बनाने के स्थान पर राजस्व घाटे को घटाने का लक्ष्य बनाना चाहिए। समस्या सरकार द्वारा लिए जाने वाले कर्ज की नहीं है। समस्या खपत की है। सरकार अपनी खपत को कम करे और निवेश बढ़ाए तो अर्थव्यवस्था चल निकलेगी।

 

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