चीनी हठ और हांगकांग का संघर्ष

स्रोत: द्वारा सलिल त्रिपाठी: हिंदुस्तान

जून 1989 में बीजिंग में तियानमेन चौक पर एक आदमी एक टैंक के सामने खड़ा हो गया था, लेकिन अंतत: वहां टैंक ही बचा। बीजिंग और अन्य जगहों पर हजारों लोग नरसंहार में मारे गए थे। हांगकांग में लाखों लोगों ने उस प्रत्यर्पण संधि का विरोध किया, जिसकी वजह से हांगकांग पर बीजिंग का शिकंजा और कस जाएगा। हांगकांग की चीन समर्थक मुख्य कार्यकारी कैरी लेम इस कानून को लागू करने के लिए लालायित थीं, लेकिन जब स्थानीय शेयर बाजार में हेंग सेंग सूचकांक 1.2 प्रतिशत गिर गया और विरोध प्रदर्शन करने वाले हजारों की संख्या में फिर आ जुटे, तो कैरी लेम पर असर हुआ। प्रस्तावित कानून फिलहाल टल गया है। चीन अभी भी एक ऐसा देश है, जहां दो व्यवस्थाएं हैं, लेकिन ऐसा आखिर कब तक रहेगा?

हर वर्ष 4 जून को हांगकांग के विक्टोरिया पार्क में हजारों लोग जुटते हैं, हाथों में मोमबत्तियां लेकर तियानमेन चौक नरसंहार को याद करते हुए। इस बार विरोध-प्रदर्शन के साथ उस नरसंहार की 30वीं वर्षगांठ मनाई गई है। इस बार प्रदर्शन में मार्मिकता और सामयिकता ज्यादा है, क्योंकि नए प्रत्यर्पण कानून को लेकर बड़ी नाराजगी है। विदेशी दूतावासों, औद्योगिक समाज और मानवाधिकार विशेषज्ञों के विरोध के बावजूद हांगकांग में आमतौर पर कानून लागू करने की प्रक्रिया रबर स्टांप की तरह रही है। हालांकि इस बार ऐसा नहीं हुआ। हांगकांग में रहने वालों में से हर सातवां इंसान विरोध प्रदर्शन के लिए सड़क पर निकल आया।

इस बार चिंता ज्यादा है, क्योंकि यह कानून सार्वजनिक रूप से लागू होगा। यह हांगकांग में हर उस व्यक्ति को संकट में डाल देगा, जिस पर चीन मुकदमा चलाना चाहता है। व्यवसायी, राजनीतिक विरोधी, पुस्तक विक्रेता और सामाजिक कार्यकर्ता खतरे में पड़ जाएंगे। यह कानून बीजिंग के अनुकूल इसलिए नहीं है, क्योंकि मतदाता बीजिंग के अनुकूल उम्मीदवारों को ही तरजीह देते हैं, बल्कि यह इसलिए है कि इसकी व्यवस्था के अनुसार, स्क्रीनिंग कमेटी असांविधानिक विचार रखने वालों को चुनाव से बाहर कर सकती है।हांगकांग में सीमित लोकतंत्र है, जिस पर ब्रिटेन और चीन में सहमति बनी थी। वर्ष 1997 तक हांगकांग ब्रिटिश कॉलोनी था और उसके बाद वहां चीन की संप्रभुता लागू हो गई।

30 जून को उस हस्तांतरण को 22 वर्ष पूरे हो जाएंगे। चीन और ब्रिटेन के बीच सहमति बनी थी कि आगामी 50 वर्ष तक हांगकांग में जीवन और लोगों की स्वतंत्रता में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। 50 वर्ष में से अभी आधे भी पूरे नहीं हुए हैं और बदलाव की कवायद शुरू हो गई है। हांगकांग के चीन में विलय के लिए वर्ष 1984 में चीनी-ब्रिटिश संयुक्त घोषणापत्र पर ब्रिटेन की ओर से प्रधानमंत्री मारगे्रट थैचर और चीन की ओर से देंग शियाओ पिंग ने हस्ताक्षर किए थे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह गारंटी चाहता था कि वर्ष 1997 के बाद भी हांगकांग की स्वायत्तता सुनिश्चित रहेगी।

जब देंग ने 1978 में सत्ता संभाली थी, तब चीन माओ की कथित सांस्कृतिक क्रांति की भयावहता से उबर रहा था। 1980 के दशक में चीन कम्युनिस्ट राष्ट्र था और आज भी है। वहां एक भी विश्वसनीय शेयर बाजार नहीं है। शंघाई मुद्रा बाजार की 1990 में पुनस्र्थापना हुई थी। आज हांगकांग की मुक्त अर्थव्यवस्था को संरक्षण की जरूरत है। चीन से अलग हांगकांग उद्योग समर्थक क्षेत्र था, वहां टैक्स दर कम थी और वस्तुओं, सेवाओं, लोगों और विचारों के प्रति खुलापन था। निवेशक बैंक वहां व्यवसाय करना चाहते थे, अर्थशास्त्री मुक्त भाव से क्षेत्र पर टिप्पणी करते थे। अलग मत रखने वाले भी वहां रहते थे।

पत्रकार वहां एशिया के बारे में खुलकर लिखते थे, उन्हें वहां सरकारी सेंसरशिप का भय नहीं था। ऐसे में हांगकांग के चीन में विलय के संयुक्त घोषणापत्र का मकसद था एक देश में दो व्यवस्था सुनिश्चित करना। तियानमेन ने अनेक भ्रमों को दूर कर दिया, लेकिन चीनी तो लंबा खेल खेलते रहे हैं। देंग जानते थे कि वह उद्योग जगत की कमजोर स्मृति पर विश्वास कर सकते हैं। वही हुआ, कंपनियां 1990 के दशक की शुरुआत में चीन लौट आईं। वर्ष 1997 तक आते-आते चीन का गुआनडोंग प्रांत और उसका भी विशेषकर शेंझान शहर बिल्कुल हांगकांग की ही तरह दिखने लगा।

मैं 1990 के दशक में सिंगापुर और हांगकांग में रिपोर्टर था। हांगकांग में कई प्रकाशन सक्रिय थे, जो लिखने की ऐसी आजादी देते थे, जो आस पास कहीं नहीं थी। हांगकांग के हस्तांतरण की रात मैं वहीं था। प्रवासियों के आलीशन भवनों में पार्टियां चल रही थीं, लेकिन मोंग काक जैसी व्यस्त सड़कों पर अपेक्षाकृत शांति थी। हांगकांग में केंटोनीज बोलने वाले कुछ चीनी निवासी क्षेत्र की चीन में वापसी का उत्सव मना रहे थे। अनेक प्रवासी विशेषज्ञों ने माना था कि हांगकांग के चीनी वास्तव में लोकतंत्र नहीं चाहते। इन विशेषज्ञों ने उदारवादी नेताओं इमेली लाउ और मार्टिन ली को बहकाने वाला कहा था। हालांकि बाद में तियानमेन चौक नरसंहार के स्मरणोत्सवों और 2014 के अंब्रेला मूवमेंट ने जता दिया कि हांगकांग के लोग आजादी की परवाह करते हैं।

बीजिंग में वर्ष 2012 में शी जिनपिंग के उभार के साथ ही काफी चीजें बदल चुकी हैं। वर्ष 2015 में हांगकांग के पांच ऐसे पुस्तक विक्रेता गायब हो गए, जो चीनी संभ्रांत वर्ग के जीवन के बारे में रसीली किताबें छापने में माहिर थे। बाद में वे पुस्तक विक्रेता चीनी धरती पर सामने लाए गए और अपना अपराध स्वीकारते दिखे। विशेषज्ञों ने माना कि अपराध की स्वीकारोक्ति दबाव डालकर प्राप्त की गई थी और छूटने वाले एक पुस्तक विक्रेता ने भी इसी ओर संकेत किया। अंब्रेला मूवमेंट के नौ नेताओं को सार्वजनिक उपद्रव का दोषी माना गया है, इस अपराध के लिए औपनिवेशिक दौर के कड़े कानून के तहत लंबी कैद का प्रावधान है। मई महीने में जर्मनी ने हांगकांग के दो सामाजिक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक शरण दी है, इससे भी हांगकांग प्रशासन शर्मिंदा है। 

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग संयुक्त घोषणापत्र को पुनर्परिभाषित करना चाहते हैं। बीजिंग सोचता है कि भूमिकाएं पलट गई हैं। संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाला ब्रिटेन बे्रग्जिट वगैरह में फंसा है। चीन का विश्वास है, अब किसी को इसकी परवाह नहीं, लेकिन हांगकांग के लोगों को परवाह है। वे चाहते हैं, उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए, लेकिन वे कभी अकेले रहे नहीं हैं। और इसीलिए संघर्षरत हैं। 

 

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