संभावनाओं के संगठन में भारत

स्रोत: द्वारा जोरावर दौलत सिंह: हिंदुस्तान

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का असली मकसद था - सोवियत संघ के पतन के बाद मध्य एशिया में क्षेत्रीय विवादों को सुलझाना। साथ ही, रूस और चीन के बीच जहां-जहां अधिकारों की लड़ाई है, वहां-वहां दोनों के बीच परस्पर विश्वास बढ़ाना। असली ‘शंघाई फाइव’ तंत्र का शुरुआती विकास रूस, चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान के बीच सीमाओं पर परस्पर विश्वास बढ़ाने और नि:शस्त्रीकरण के लिए हुआ था। संगठन के समझौतों पर साल 1996 और 1997 में शंघाई और मास्को में हस्ताक्षर हुए थे। पांच साल बाद 2011 में इस बहुपक्षीय संगठन में मूल पांच सदस्यों के साथ उज्बेकिस्तान भी शामिल होने को तैयार हो गया। वर्ष 2004 में संगठन का औपचारिक सचिवालय भी स्थापित हुआ।

पिछले दशक में शंघाई सहयोग संगठन और यूरेशिया समाज बनाने के उसके एजेंडे का भी विस्तार हुआ है। तीन बुराइयों- कट्टरता, आतंकवाद व अलगाववाद से निपटना इसका मुख्य अभियान है और इस मोर्चे पर अब तक यह संगठन बहुत हद तक सफल रहा है। साल 2010 में भारत ने इस संगठन में अपने पर्यवेक्षक दर्जे को बढ़ाने और पूर्ण सदस्यता लेने के प्रति औपचारिक रुचि जताई थी। वर्ष 2017 में भारत और पाकिस्तान इस संगठन में औपचारिक सदस्य बनाए गए। अभी अफगानिस्तान, बेलारूस, ईरान, मंगोलिया को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है, जबकि श्रीलंका, तुर्की, अजरबैजान, आर्मेनिया, कंबोडिया और नेपाल संवाद भागीदार के रूप में वर्गीकृत हैं।

इस संगठन से भारत को अनेक लाभ संभावित हैं। वैसे भारत के लिए किसी नए संगठन की सदस्यता पाना कोई बड़ा मामला नहीं है। पश्चिमी देशों को पता है कि भारत के पास दूसरे विकल्प भी हैं। फिर भी यह संगठन भारत के लिए इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि इसके जरिए भारत की पहुंच यूरेशिया के उन देशों तक हो गई है, जिनके साथ दशकों से रिश्ते नहीं थे या टूटे हुए थे।

पहली बात, यह संगठन भारत-चीन संबंधों में स्थाई कारक के रूप में लाभदायक दिखता है। वर्ष 2018 में वुहान में नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की अनौपचारिक भेंट में परस्पर विश्वास बढ़ाने के प्रयासों की पृष्ठभूमि में इस वर्ष का सम्मेलन हमारे लिए एक संभावना है। भारत-चीन सहयोग में द्विपक्षीय स्थिरता लाने और ट्रंप प्रशासन के संरक्षणवादी प्रयासों से वैश्वीकरण को बचाने की दिशा में यह सम्मेलन एक बड़ा मौका है।

दूसरी बात, यह संगठन यूरेशिया क्षेत्र में शक्ति संतुलन को स्वरूप देने में भारत को भूमिका निभाने का मौका देता है। वास्तव में, रूस और भारत, दोनों इस बहुपक्षीय संगठन के जरिए व्यापक महादेशीय मुद्दों पर चीन की नीति को आकार देने में कारगर हो सकते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि संगठन के विस्तार में रूस की अहम भूमिका है। मास्को की सक्रियता के फलस्वरूप ही भारत को इस संगठन में सदस्यता मिली है।

तीसरी बात, यह संगठन उस दक्षिण एशिया को यूरेशिया क्षेत्र से जुड़ने का मौका देता है, जो आंतरिक संघर्षों में उलझा और बंटा हुआ है। दोनों क्षेत्रों के बीच शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों का भी अभाव है। शंघाई सहयोग संगठन की पिछली बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं उल्लेख किया था कि शंघाई सहयोग संगठन के देशों से मात्र छह प्रतिशत पर्यटक भारत आते हैं, जबकि यह क्षेत्र भारत के पड़ोस में है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दक्षिण एशिया किस तरह से अलग-थलग पड़ा है और सामाजिक रूप से अपने पड़ोसियों या शंघाई सहयोग संगठन के देशों से कटा हुआ है। ऐसे में, यह संगठन इस पूरे इलाके को जुड़ने का एक मंच प्रदान करता है।

चौथी बात, इस संगठन ने दक्षिण एशिया के लिए उसकी उप-क्षेत्रीय पहचान से परे एक नई पहचान बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ की है। ऐतिहासिक रूप से देखें, तो भारत व पाकिस्तान के बीच प्रतिद्वंद्विता इस उप-क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने में बाधक रही है। यह संगठन भारत व पाकिस्तान, दोनों को एक नई पहचान गढ़ने का अवसर देता है।

पांचवीं बात, अब तक शंघाई सहयोग संगठन की सबसे सफल परियोजना क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी तंत्र का निर्माण है। वर्ष 2004 में यह तंत्र सदस्य देशों में आतंकवाद, कट्टरता और अलगाववाद के खिलाफ संघर्ष को आसान बनाने के लिए बना है। इसका मुख्य कार्य परस्पर सहयोग और सूचनाओं का आदान-प्रदान है। वर्ष 2017 के अंत तक संगठन में दस से अधिक आतंकवाद विरोधी अभ्यास हो चुके थे। हालांकि यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संगठन पाकिस्तान आधारित आतंकवादी गुटों से निपटने में कितना कारगर होता है।

गौर करने की बात है कि दक्षिण एशिया इस संगठन में अपने आंतरिक विवादों को सुलझाए बिना शामिल हुआ है। संगठन के बाकी देशों के साथ ऐसा नहीं है। विशेष रूप से रूस और चीन अपने सभी क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने और द्विपक्षीय विश्वास कायम करने के बाद संगठन में आए हैं, इससे भी संगठन के विकास को बल मिला है। दूसरी ओर, भारत और पाकिस्तान अपने विवाद सुलझाने या उपमहाद्वीप में अर्थपूर्ण सहयोग कायम करने में असमर्थ रहे हैं। यहां निराशावादी लोग अनुमान लगा सकते हैं कि यह स्थिति संगठन का गला घोंट सकती है, उसके प्रयासों में बाधक बन सकती है। हालांकि एक आशावादी यही अनुमान लगाएगा कि संगठन के बहुपक्षीय तंत्र में जब सतत संवाद-संपर्क होगा, तो संबंधों को नई गति मिलेगी, धीरे-धीरे पाकिस्तानी और भारतीय अपने संबंधों पर पुनर्विचार करेंगे और परस्पर संपर्क के बेहतर अवसर निकालेंगे।

भारत वास्तव में विभाजन की वजह से यूरेशिया क्षेत्र से कट गया था। नीति-निर्माताओं और रणनीतिकारों ने 1940 के दशक में ही पहचान लिया था कि उस क्षेत्र से भारत को अपने प्राचीन सामाजिक संबंध अवश्य जोड़ने चाहिए। वैसे औपनिवेशीकरण, विभाजन व शीत युद्ध से पहले देशों और लोगों के बीच आर्थिक-सांस्कृतिक संपर्क ज्यादा खुले और निर्बाध थे। अब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हो रहे बदलाव संकेत देते हैं कि यूरेशिया के बीच ज्ञान, संस्कृति और तकनीक के सेतु बनाना 1950 के दशक की तुलना में आज ज्यादा संभव है। आज दुनिया को फिर से बांटने के नए दबावों की पृष्ठभूमि में सहयोग की यह कोशिश बहुत जरूरी है।

 

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