सबसे ज्यादा जरूरी है समान पाठ्यक्रम

स्रोत: द्वारा कृपशंकर चौबे: दैनिक जागरण

नई शिक्षा नीति के रूप में देश को समान पाठ्यक्रम लागू करने, इतिहास के एकांगी पक्ष को दूर करने और नई पीढ़ी को देश की सांस्कृतिक थाती से भलीभांति परिचित कराने का एक अवसर मिला है। इस अवसर का सदुपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षा के जरिये देश को संवारने के काम में पहले ही देर हो चुकी है। स्वतंत्र भारत में जिस चीज की सर्वाधिक अनदेखी हुई है वह है-प्राथमिक शिक्षा। स्वाधीनता से पहले प्राथमिक शिक्षा का एक कामचलाऊ ढांचा था। थोड़े-बहुत बदलाव के साथ वह जैसे-तैसे घिसटता रहा, किंतु हाल के दशकों में वह ढांचा जर्जर हो गया।

सरकारी विद्यालय कहीं छत विहीन पड़े हैं तो कहीं शिक्षक विहीन। गांवों और शहरों के सरकारी विद्यालयों में संसाधनों की भारी कमी है। इसीलिए सरकारी उपक्रमों की रिक्तता को निजी स्कूल सहजता से भरते गए। निजी विद्यालय अच्छे भवन, शैक्षणिक प्रबंधन और व्यावसायिक कौशल के कारण बेहतर विकल्प देते हैं और इसीलिए अभिभावकों को सहज ही आकृष्ट कर लेते हैं। जाहिर है कि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को सीखने के वे अवसर मुहैया नहीं हैं जो निजी विद्यालयों यानी मिशनरी, कॉन्वेंट, पब्लिक, आवासीय अथवा इंटरनेशनल स्कूलों के विद्यार्थियों को उपलब्ध हैं।

मिशनरी और कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे एक्टिव लनिर्ंग बोर्ड की सहायता से स्मार्ट क्लास रूम में पढ़ते हैं, वे ई-लनिर्ंग, ई-सामग्री, ई-क्लास के अभ्यस्त हैं, कंप्यूटर में पारंगत हैं। पब्लिक स्कूलों की तरह सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों को सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उनके पाठ्यक्रम भी एक समान नहीं हैं, किंतु कालेजों में दाखिले के लिए उन्हीं विद्यार्थियों से उन्हें प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी दोनों को एकसमान मुकाबला करना पड़ता है। जब एकसमान सुविधा एवं शिक्षा नहीं दी गई तो प्रतियोगी परीक्षाओं में दोनों से एक समान प्रश्न पूछना क्या न्यायसंगत है? कहने की जरूरत नहीं कि सरकारी विद्यालय हों अथवा निजी, सर्वत्र एक समान पाठ्यक्रम लागू किया जाना चाहिए। तभी विषमता की खाई पटेगी और तभी सभी विद्यार्थी एक धरातल पर नजर आएंगे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रारूप में कौशल और हुनर पर जितना जोर दिया गया है उतना ही जोर नियमित विषयों के पाठ्यक्रमों में एकरूपता कायम करने पर भी देना चाहिए। नियमित विषयों के पाठ्यक्रमों के अलावा विद्यार्थियों को संस्कारी, संयमी और अनुशासित बनाने के लिए स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक वानिकी और अधिकार-कर्तव्य जागरूकता कार्यक्रम जैसी पाठ्यचर्याएं भी शामिल की जानी चाहिए। इन पाठ्यचर्याओं से विद्यार्थी अनुशासन के महत्व को जान सकेंगे। वे भारत, भारतीयता, देश के महापुरुषों को जान सकेंगे। वे मानव मूल्यों का महत्व जान सकेंगे। ये पाठ्यचर्याएं विद्यार्थियों को शिक्षित बनाने के साथ ही समर्थ भी बनाएंगी। इससे समरस भारत के निर्माण में मदद मिलेगी। पाठ्यक्रम तैयार करते समय यह ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि उसे पढ़कर विद्यार्थी अपने अतीत और सांस्कृतिक थाती से भलीभांति परिचित हो सकें।

केंद्रीय बोर्डो से लेकर राज्यों के बोर्डो में अभी जो इतिहास पढ़ाया जाता है वह एकांगी है। नई शिक्षा नीति को लागू करते समय इतिहास के एकांगी पक्ष को दूर करने का एक अवसर मिला है। इसी तरह भारतीय संस्कृति के उद्गम स्नोत, वैदिक समाज दर्शन, उपनिषद, भगवद्गीता, वेदांत, सिंधु सभ्यता बनाम वैदिक सभ्यता, जैन संस्कृति, बौद्ध संस्कृति, सिख संस्कृति और इस्लाम संस्कृति से विद्यार्थियों को भलीभांति परिचित कराने वाला पाठ्यक्रम बनाने का भी यह अवसर है।

राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले पाठ्यक्रम की अस्सी प्रतिशत सामग्री राज्यों में अनिवार्यत: स्वीकार की जाए। बीस प्रतिशत सामग्री स्थानीय महत्व एवं विरासत को ध्यान में रखते हुए शामिल की जा सकती है। जब तक पूरे देश में कम से कम अस्सी प्रतिशत पाठ्यक्रम एक समान नहीं लागू होगा तब तक एक समान शिक्षा व्यवस्था नहीं लागू हो सकेगी। एक समान शिक्षा व्यवस्था लागू होने पर राष्ट्रीय एकता को भी मजबूती मिलेगी। एक समान पाठ्यक्रम बनाने और उसे लागू करने के समानांतर प्रश्न पत्र और अंक देने का ढांचा भी एक समान होना चाहिए।

केंद्रीय बोर्ड अंक देने के मामले में अतिशय उदारता दिखाते हैं। इसी कारण राज्यों के बोर्ड से उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों के अंक केंद्रीय बोर्डो की तुलना में कम होते हैं। केंद्रीय और राज्यों के शिक्षा बोर्डो के प्रश्न पत्र निर्माण, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और अंक देने की पद्धति में भी एकरूपता आवश्यक है। नई शिक्षा नीति की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि वह देशभर में एक समान पाठ्यक्रम लागू करने और सबको एक समान शिक्षा का अवसर देने की राह को कितना सुगम बनाती है?

मातृभाषा में शिक्षा नहीं पाने के चलते बच्चे शैक्षिक उपलब्धि में पिछड़ जाते हैं। ज्ञानार्जन और एक दूसरी भाषा को सीखना तभी फलीभूत हो सकता है जब बच्चे के पास अपनी मूल भाषा की दक्षता हो। इसीलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रारूप में बच्चों को कम से कम पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा में पढ़ाने की बात कही गई है। प्रारूप में कहा गया है कि बच्चों को प्री-प्राइमरी से लेकर कम से कम पांचवीं तक और वैसे आठवीं तक मातृभाषा में ही पढ़ाना चाहिए। प्री-स्कूल और पहली कक्षा में बच्चों को तीन भारतीय भाषाओं के बारे में भी पढ़ाना चाहिए जिसमें वह उन्हें बोलना सीखे और उनके अक्षर पहचाने और पढ़े।

तीसरी कक्षा तक मातृभाषा में ही लिखे और उसके बाद दो और भारतीय भाषाएं लिखना भी शुरू करे। अगर कोई विदेशी भाषा भी पढ़ना और लिखना चाहे तो यह इन तीन भारतीय भाषाओं के अलावा चौथी भाषा के तौर पर पढ़ाई जाए। भारत एक बहुभाषी देश है। यहां संस्कृत, तमिल और फारसी जैसी भाषाएं हैं जिनकी बड़ी प्राचीन परंपराएं हैं और विपुल साहित्य भी है। ये सभी भाषाएं भारत के विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक विशिष्टता को संजोये हुए देश की बहुरंगी छटा प्रस्तुत करती हैं।

नई शिक्षा नीति के प्रारूप में भाषा की सहायता से सामाजिक-सांस्कृतिक एका की ओर बढ़ने का प्रस्ताव दिया गया है ताकि विद्यार्थी को भाषा के अध्ययन के क्रम में प्रत्येक संस्कृति का परिचय मिले और सांस्कृतिक संवेदना को पनपने का भी अवसर मिले। कहना न होगा कि सांस्कृतिक अनभिज्ञता से निपटने के लिए भाषा और संस्कृति को शिक्षा में स्थापित करना एक बड़ा कदम होगा। भाषाओं की विविधता और उनके बीच संवाद स्थापित करने में इससे मदद मिलेगी। भारतीय भाषाओं में एक सहकार संबंध भी कायम होगा।

 

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