शिक्षा पर नए सुझाव और पुरानी चिंताएं

स्रोत: द्वारा हरिवंश चतुर्वेदी निदेशक: हिंदुस्तान

तीन दशक बाद शिक्षा नीति को बदलने की कवायद शुरू हुई है। पिछली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में तय हो पाई थी, जिसे कुछ फेरबदल के बाद 1992 में उसे लागू किया गया था। एनडीए सरकार ने 2014 में सत्तारूढ़ होने के बाद पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रहमण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन करके उसे नई शिक्षा नीति का प्रारूप बनाने का काम दिया था।

इसकी ड्राफ्ट रिपोर्ट तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को प्रस्तुत की गई थी, पर कुछ विवादों के कारण वह रिपोर्ट मंजूर नहीं हो पाई। प्रकाश जावडे़कर ने मानव संसाधन मंत्रालय का पदभार ग्रहण करने के बाद 24 जून, 2017 को के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक आठ सदस्यीय समिति का गठन किया था और उसे फिर से नई शिक्षा नीति का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी दी।

इसमें ज्यादातर शिक्षा से जुडे़ लोगों को सदस्य बनाया गया था, जबकि पिछली कमेटी में नौकरशाहों की भरमार थी। कस्तूरीरंगन समिति ने पिछली दिसंबर में अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट मानव संसाधन मंत्री को सौंप दी। लेकिन आम चुनावों के कारण एनडीए सरकार ने इसके क्रियान्वयन को नई सरकार के गठन तक के लिए टाल दिया गया। अब लगता है कि अगले दो-तीन माह में नई शिक्षा नीति के मसौदों को अंतिम रूप दे दिया जाएगा।

नई शिक्षा नीति को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत कराने के लिए एनडीए सरकार को संभलकर चलना होगा। 1986 और 1992 में जब शिक्षा नीति तैयार हुई और उसमें रद्दोबदल हुआ, तब और अब की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में बहुत अंतर आ गया है। उस समय संसद और अधिकांश राज्य सरकारों पर कांग्रेस पार्टी का आधिपत्य था। मध्यवर्ग और समाज का पिछड़ा तबका शिक्षा के प्रति जागरूक तो बन गया था, किंतु आज की तरह महत्वाकांक्षी नहीं था।

आज हमारे देश में करीब 35 करोड़ ऐसे नौनिहाल हैं, जो स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर कोई न कोई पढ़ाई कर रहे हैं। एक करोड़ से ज्यादा शिक्षकों के हाथों में यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे उन्हें उनकी भावी जिंदगी और जीविकोपार्जन के लिए तैयार करें। नई शिक्षा नीति के प्रारूप में ऐसे अनेक बिंदु हैं, जिन पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। कस्तूरीरंगन कमेटी का कहना है कि उसने इसे बनाने के लिए हर स्तर पर, हर वर्ग के लोगों और विशेषज्ञों से चर्चा की है। इस चर्चा को जमीनी स्तर से लेकर उच्च स्तर तक सहभागी ढंग से चलाया गया है।

प्रारूप में कहा गया है कि नीति को जिन मजबूत खंभों पर खड़ा किया गया है, वे हैं सबके लिए उपलब्धता, समानता, गुणवत्ता, वहनीयता और जवाबदेही। कस्तूरीरंगन कमेटी की एक बड़ी सिफारिश है कि मानव संसाधन मंत्रालय को फिर से शिक्षा मंत्रालय का नाम दिया जाना चाहिए। स्कूली शिक्षा के लिए कमेटी का एक बड़ा सुझाव शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 का दायरा बढ़ाकर तीन वर्ष से 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों व युवाओं की शिक्षा को उसमें शामिल करना है।

स्कूली शिक्षा हमारी शिक्षा प्रणाली का आधार स्तंभ है। इसकी दरो-दीवारें कई कारणों से कमजोर होती गई हैं। पिछले 32 वर्षों में कई कानून बनाए गए, सुधारे गए और कार्यक्रम चलाए गए, किंतु हमारी स्कूली शिक्षा प्राथमिक स्तर पर शत-प्रतिशत दाखिले की उपलब्धि से आगे नहीं बढ़ पाई। नई शिक्षा नीति के प्रारूप में 5+3+3+4 के शैक्षणिक फॉर्मूले के आधार पर स्कूली शिक्षा को चार खंडों में बांटा गया है। इस तरह, अब स्कूली शिक्षा को 12 वर्ष से बढ़ाकर 15 वर्ष किया जाना प्रस्तावित है।

इसी के साथ स्कूली शिक्षा में पढ़ाई का बोझ कम करने की बात कही गई है। इस प्रस्तावित नीति की एक अहम बात यह है कि ज्ञान सीखने को सिर्फ पढ़ाई-लिखाई तक सीमित न रखकर उसे सह-शैक्षणिक व एक्सट्रा-करिक्यूलर गतिविधियों से जोड़ा जाएगा, जैसे कला-संगीत, खेलकूद, योग, समाजसेवा, दस्तकारी आदि। स्कूली शिक्षा के लिए अच्छे शिक्षकों की आवश्यकता होती है, जिनका प्रशिक्षित होना जरूरी है। अब तक दो वर्षीय बीएड की डिग्री की जो बंदरबांट चल रही थी, उसे बंद किया जाएगा। खास विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को ही चार वर्षीय बीएड कोर्स चलाने की अनुमति दी जाएगी।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी भारी बदलाव की सिफारिश की गई है। अब उच्च शिक्षा में तीन तरह के संस्थान रहेंगे। एक, जो विश्वस्तरीय शोधकार्यों में संलग्न हैं;  दूसरे वे, जो उच्चस्तरीय शिक्षण तथा अच्छे शोधकार्यों को चला रहे हैं और तीसरे वे, जो सिर्फ स्नातक स्तर पर अच्छी पढ़ाई की सुविधा दे रहे हैं। इनको आगे बढ़ाने के लिए मिशन नालंदा और मिशन तक्षशिला के नाम से दो प्रोजेक्ट चलाए जाएंगे।

बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे त्रिवर्षीय कार्यक्रम अब चार वर्षों या तीन वर्षों के विकल्प के रूप में चलाए जाएंगे। उच्च शिक्षा के नियमन व प्रबंध में भी बड़े व्यापक परिवर्तन प्रस्तावित किए गए हैं। शैक्षणिक सुधारों के सफल क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित किया जाएगा, जो केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल बैठाने का काम करेगा। साथ ही एक नेशनल रिसर्च फाउंडेशन भी होगा, जो पूरे देश की उच्च शिक्षा में शोध व अनुसंधान के लिए उचित माहौल पैदा करेगा।

सैम पित्रोदा कमेटी और  यशपाल कमेटी की तरह कस्तूरीरंगन कमेटी ने भी एक शीर्ष नियमन आयोग के गठन का सुझाव दिया है। उच्च शिक्षा के एक्रेडिटेशन का सारा काम नैक संस्था के द्वारा किया जाएगा, जो पुनर्गठित की जाएगी। अलग-अलग विषय की पेशेवर शिक्षा के स्तर तय करने के लिए स्तर निर्धारण संस्थाएं बनाई जाएंगी और यूजीसी के पास सिर्फ अनुदान देने का काम बचा रह जाएगा।

बेशक यह प्रारूप अनेक संभावनाओं से परिपूर्ण है, पर उसके साथ अनेक आशंकाएं भी जुड़ी हैं। क्या स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के लिए सुझाए गए सुधारों को समयबद्ध ढंग से लागू करने के लिए हमारा सरकारी ढांचा समर्थ होगा? क्या इन सुधारों को शिक्षाविदों, उद्योग जगत और सिविल सोसाइटी से वांछित सहयोग मिल पाएगा? क्या इनके लिए केंद्र और राज्यों के बीच जरूरी सर्वानुमति बन पाएगी? और सबसे अहम मुद्दा होगा कि अभी तक सकल राष्ट्रीय आय का तीन प्रतिशत से भी कम खर्च करने वाली व्यवस्था इन सुधारों पर इससे दोगुना और तिगुना खर्च कर पाएगी?

 

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