जड़ों में छिपा है खुशी का मंत्र

स्रोत: द्वारा पीयूष द्विवेदी: दैनिक जागरण

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (यूएनएसडीएसएन) द्वारा वर्ष 2019 की विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट जारी की गई। संयुक्त राष्ट्र के 156 सदस्य देशों में प्रसन्नता का स्तर बताने वाली इस रिपोर्ट की शुरुआत 2012 में हुई थी। तबसे हर साल मार्च महीने में इसे जारी किया जाता रहा है। इस साल की विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट भी बीते वर्षो की ही तरह भारत के लिए निराशाजनक रही है।

गत वर्ष इस रिपोर्ट में भारत का स्थान 133वां था, जो कि इस साल और गिरकर 140वें पायदान पर पहुंच गया है। हमारे सभी पड़ोसी देश इस बार भी हमसे बेहतर स्थिति में बने हुए हैं। इस रिपोर्ट का आधार कुछ खास मानक हैं, जिनकी बेहतरी के आधार पर यह संबंधित देशों में प्रसन्नता का स्तर तय करती है। प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक स्वतंत्रता, उदारता, सामाजिक अवलंबन, भ्रष्टाचार की कमी, स्वस्थ जीवन की संभावना इन छह प्रमुख मानकों के आधार पर विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट तैयार की जाती है। जो देश इन छह बिंदुओं पर जितनी बेहतर स्थिति में होते हैं, वहां प्रसन्नता की स्थिति उतनी ही बेहतर मानी जाती है।

उक्त तथ्यों को देखते हुए विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट और उसके मानकों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पहली बात कि यह रिपोर्ट एक से मानकों के आधार पर हर देश में प्रसन्नता को माप रही है, जबकि वास्तव में स्थिति ऐसी नहीं है। जैसे पाकिस्तान की आबादी भारत की आबादी के लगभग पांचवें हिस्से से भी कम है, इस कारण पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय भारत से कुछ अधिक अवश्य है, लेकिन क्रय क्षमता के मामले में भारत पाकिस्तान से कहीं बेहतर स्थिति में है।

2017 की विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लोगों की क्रय क्षमता 7060 पीपीपी डॉलर है, वहीं पाकिस्तान की 5830 पीपीपी डॉलर। इसके बाद अधिक आबादी के कारण प्रति व्यक्ति आय में पाकिस्तान के मामूली रूप से आगे होने का क्या मतलब रह जाता है। भ्रष्टाचार की बात करें तो 2018 की ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत जहां भ्रष्टाचार पर रोकथाम करने वाले देशों में 75वें स्थान पर है तो वहीं पाकिस्तान 117वें स्थान के साथ भारत से बहुत पीछे है। यानी भ्रष्टाचार की कमी के मामले में भी हम पाकिस्तान से कहीं बेहतर स्थिति में हैं।

रही सामाजिक स्वतंत्रता और उदारता जैसी बातें तो दुनिया जानती है कि इस मामले में पाकिस्तान की क्या हालत है। जिस मुल्क का निर्माण ही कट्टरता की बुनियाद पर हुआ है, वहां उदारता के विषय में सोचना ही बेमानी है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और महिलाओं की दुर्दशा भी किसी से छिपी नहीं है। अत: इन मामलों में भी भारत में पाकिस्तान से बहुत अधिक बेहतर वातावरण है। बावजूद इसके आखिर किस आधार पर विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट में पाकिस्तान शुरू से ही भारत से बेहतर स्थिति में बना हुआ है, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। संयुक्त राष्ट्र को अपनी इस रिपोर्ट के मानकों का एक बार पुन: अवलोकन करते हुए उन्हें और अधिक सुसंगत और तार्किक बनाने का प्रयास करना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर तो सवाल उठते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भारत में हर तरफ प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। अगर जमीनी स्तर पर देखें तो स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं यहां प्रसन्नता के स्तर में कमी आ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक देश में कम से कम 6.5 प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जो अवसाद संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं। शहरी क्षेत्र में इस समस्या का विशेष प्रभाव है, जहां प्रत्येक सौ में 3 लोग अवसाद में जी रहे हैं। देश में अवसाद का यह बढ़ता ग्राफ प्रसन्नता के कम होने की ही गवाही दे रहा है।

सवाल उठता है कि वे क्या कारण हैं जो लोगों में इस कदर अवसाद और अप्रसन्नता जैसी विसंगतियां पैदा कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए पटना निफ्ट में प्राध्यापक और मोटिवेशनल स्पीकर रत्नेश्वर सिंह कहते हैं, ‘प्रसन्नता के मामले में भारत के पिछड़ने के कई कारण हैं, जिनमें पहला कारण तो जनसंख्या है जिससे अन्य देशों की अपेक्षा हमारे लिए चुनौतियां अधिक हैं। दूसरा कारण है शिक्षा की कमी। अशिक्षित लोग जहां रोजी-रोटी के संघर्ष में परेशान हैं तो वहीं जो शिक्षित एवं रोजगारयुक्त हैं उनमें और अधिक पाने की अपेक्षा संघर्ष पैदा किए हुए है।

इन सबके बावजूद जो सबसे बड़ी वजह है, वह यह कि भारतीय लोग मानसिक स्तर पहले की अपेक्षा पिछड़ गए हैं। भारतीय दर्शन में अभाव में भी खुश रहने के जो तरीके बताए गए थे, यूरोपीय प्रभाव में हम उनसे दूर होते जा रहे हैं। अत: अगर हमें अपनी प्रसन्नता का स्तर बेहतर करना है तो उसके लिए रोजगार आदि की उपलब्धता के लिए काम करने के साथ-साथ भारतीय प्राचीन दर्शन, जिसमें योग आदि की व्यवस्था है, की तरफ भी मुड़ना पड़ेगा।’ इसमें कोई दोराय नहीं कि जनसंख्या हमारे लिए एक बड़ी समस्या है, पर इससे भी बड़ी दिक्कत यह है कि आधुनिकता के अंधोत्साह में हम अपने भारतीय दर्शन के मूल्यों से कटते जा रहे हैं।

भारतीय दर्शन में सुख के लिए मुख्यत: दो मार्गो का प्रतिपादन किया गया है-संतोष और समता। देखा जाए तो वर्तमान समय में हम इस संतोष के मार्ग को छोड़ अधिक से और अधिक पाने की यूरोपीय मान्यता के बहाव में बहे जा रहे हैं। अपने पास जो है, उसे पर्याप्त मानकर संतुष्ट रहने के बजाय दूसरे से अपनी तुलना करने और फिर उससे अधिक अर्जित करने की चाह ने घर से लेकर कार्यस्थल तक लोगों में ऐसी अंधी होड़ पैदा कर दी है, जिसने उनका सुख-चैन छीन लिया है।

दूसरा मार्ग है समता का जिसका प्रतिपादन गीता से लेकर रामचरितमानस तक में मिलता है। गीता में सुख-दुख, जीत-हार, लाभ-हानि सभी परिस्थितियों में एक समान भाव रखने की बात कही गई है। विडंबना है कि गीता को घर में रखकर पूजने वाला भारतीय समाज उसके इस संदेश को अप्रासंगिक एवं अव्यावहारिक मानकर भूल चुका है, जिसके परिणामस्वरूप अवसाद और निराशा के चंगुल में फंसकर प्रसन्नता से दूर होता जा रहा।

ऐसे में यह कहना ठीक होगा कि भारतीय समाज भविष्य में जनसंख्या, रोजगार जैसी समस्याओं को यदि सुलझा भी लेता है, तब भी अपनी वैचारिक जड़ों अर्थात भारतीय दर्शन की तरफ लौटे बिना मानसिक प्रसन्नता को प्राप्त नहीं कर सकता। भारत भविष्य में रोजगार जैसी समस्याओं को यदि सुलझा भी लेता है, तब भी अपनी वैचारिक जड़ों अर्थात भारतीय दर्शन की तरफ लौटे बिना मानसिक प्रसन्नता को प्राप्त नहीं कर सकता

 

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