अमेरिका के लिए भारत

स्रोत: द्वारा विकेश कुमार बडोला: जनसत्ता

वर्ष 2018 का आखिरी दिन अमेरिका के साथ भारत के संबंधों के संदर्भ में उल्लेखनीय कहा जाएगा। इस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व को मजबूत करने और भारत के साथ अनेक स्तरीय संबंध प्रगाढ़ करने संबंधी एक विधेयक पर हस्ताक्षर किए। इस विधेयक में जहां हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बढ़ाने में अमेरिका व भारत के मध्य रणनीतिक भागीदारी को स्वीकृति प्रदान की गई है, वहीं विधेयक में क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए बाधक माना गया।

विधेयक की धारा 204 में दोनों देशों के महत्त्वपूर्ण राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सशक्त और व्यापक बनाने का वर्णन है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दक्षिण चीन सागर सहित हिंद महासागर और पश्चिमी-मध्य प्रशांत महासागर भी आते हैं। ‘एशिया रीएश्योरेंस इनिशिएटिव एक्ट-2018’ नामक बिल में अमेरिका ने भारत को अपना प्रमुख रक्षा भागीदार घोषित किया है। बिल में दोनों देशों के बीच रक्षा कारोबार और प्रौद्योगिकी साझा करने का वर्णन भी है। यह बिल पिछले साल अप्रैल में सीनेटर कोरी गार्डनर और एड मार्के ने संसद में प्रस्तुत किया था।

भारत के साथ मैत्रीपूर्ण प्रतिबद्धता का आभास अमेरिका की दक्षिणपंथी सरकार के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के अपने भाषणों में ही दे दिया था और इस दिशा में पहल भी वे 2017 में कर चुके थे। वर्ष 2017 के दिसंबर के तीसरे हफ्ते में अमेरिका ने अपनी पहली बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की घोषणा की थी, जिसके अंतर्गत ट्रंप ने दक्षिण एशिया में भारतीय हितों की रक्षा के लिए उसे अपने विशिष्ट मित्र व सहयोगी की संज्ञा दी थी।

अमेरिका दो साल से भारत को अपना विशिष्ट मित्र मानने के जो आधिकारिक संकल्प दिखा रहा है और संसद में बहुमत से जो विधेयक पारित किए जा रहे हैं, वह भारतीयों के लिए गर्व की बात है। हमें इस मैत्रीपूर्ण संबंध का उपयोग विश्व में शांति और विकास के लक्ष्य हासिल करने के साधन के रूप में करना चाहिए। यदि इस संदर्भ में हम में से कुछ लोग ये सोचें कि अमेरिका भारत को अपना मित्र इसलिए बना रहा है क्योंकि दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व एशिया सहित रूस-चीन के राजनीतिक अतिक्रमण व अधिकार वाले अखिल वैश्विक क्षेत्रों में उसे अपने लिए कुछ शक्तिशाली दक्षिण एशियाई देशों की आवश्यकता है, तो यह सोच पूर्वाग्रही ही समझी जानी चाहिए।

यदि ऐसा है भी तो इससे भारत किसी हानि की स्थिति में नहीं है। पिछले एक-डेढ़ वर्ष में दक्षिण एशिया में अमेरिका के मार्गदर्शन और संरक्षण में शक्ति-संपन्न राष्ट्रों की जो गुटसापेक्षता आकार लेती रही है, उसका नेतृत्व भारत ने ही किया है। जापान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया जैसे देश इसमें अन्य सहयोगी हैं। यदि दक्षिण एशिया में भारतीय नेतृत्व में शक्तिशाली राष्ट्रों का गुट तैयार हो रहा है तो इसकी आवश्यकता भी है, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकाधिक गुटों में विभाजित राष्ट्रों के मध्य उत्पन्न शीत युद्ध के जोखिम कम होते हैं।

एक तरह से यह कूटनीतिक संतुलन वाली स्थिति है, जिसकी संरचना एक ही गुट के देशों के बीच व्यावसायिक, आर्थिक और अन्य मतभेदों के होते हुए भी बनती है। अमेरिका और भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। चूंकि दक्षिण एशिया में अमेरिका पूरा राजनीतिक और कूटनीतिक संरक्षण करने का दायित्व भारत को सौंपना चाहता था, इसीलिए उसने एशिया महाद्वीप में अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों चीन और रूस से क्षेत्रीय कूटनीति के सहारे भिड़ने के लिए भारत, जापान और आस्ट्रेलिया को लेकर एक गुट खड़ा किया था। लेकिन पिछले एक-डेढ़ वर्ष में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व की अनेक अन्य शक्तिशाली संस्थाओं द्वारा उसके विरोध में उठाए गए मुद्दों का जवाब देने के लिए ‘अमेरिका पहले’ (अमेरिका फर्स्ट) की जिस नीति पर काम शुरू किया, उसके कई बिंदुओं से दक्षिण एशिया के उसके संभावित सहयोगी भारत, जापान और आस्ट्रेलिया भी सहमत नहीं हैं।

हालांकि इन देशों ने अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था के मानदंडों के विपरीत निर्णयों के लिए कोई प्रकट विरोध दर्ज नहीं किया, लेकिन ऐसे फैसलों में इन्होंने अमेरिका का किसी तरह का कोई समर्थन भी नहीं किया। भारत, जापान और आस्ट्रेलिया की यह तटस्थता अमेरिका को कैसे स्वीकार हो सकती थी! फलस्वरूप उसने भी विश्व के अनेक मंचों पर शक्तिशाली राष्ट्र के अपने दायित्वों के संबंध में कोई प्रभावशाली वक्तव्य नहीं दिया। अब इन्हीं बातों के संज्ञान में अमेरिका भारत के माध्यम से अपनी नव-नीतियों को दशा-दिशा देने की सोच रहा है।

इस समय अमेरिका और भारत दोनों ही देश संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं। अमेरिका में जहां सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी सरकार के सम्मुख दशकों तक सत्तारूढ़ रहे डेमोक्रेट्स के विपरीत वास्तव में अमेरिकी जनता के हित में कुछ कठोर निर्णय लेकर खुद को सिद्ध करने की चुनौतियां हैं, वहीं भारत भी नवनिर्माण के लिए प्रयासरत है। दोनों ही देशों में इस समय सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी सरकारों के सामने घर-बाहर की अनेक विकराल समस्याएं खड़ी हैं। अमेरिका के लिए ईरान, उत्तर कोरिया, फिलस्तीन, सीरिया, अफगानिस्तान, चीन और रूस के संदर्भ में जो संकट उपस्थित हैं, उनका समाधान अमेरिका आज की विश्व व्यवस्था में एकांगी होकर नहीं कर सकता।

इसके लिए उसे भूमध्य सागर के आर-पार अपने क्षेत्रीय सहयोगी चाहिए। उस पार उसके पास इजराइल, सऊदी अरब जैसे सहयोगी हैं, तो इस पार भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और आस्ट्रेलिया। इसी तरह पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, भूटान आदि देशों के संबंध में भारत की चुनौतियों का हल अमेरिकी संरक्षण में संस्थापित दक्षिण एशियाई देशों का गुट (जापान-आस्ट्रेलिया-दक्षिण कोरिया) है।

दक्षिण एशिया से संबंधित अपने ताजा विधेयक में भारत को प्रमुख साझीदार बनाने के साथ ही अमेरिका ने इजराइल के साथ एक और चौंकाने वाला फैसला किया है। इस फैसले में ये दोनों देश संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक व सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) से आधिकारिक रूप में अलग हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक शांति के लिए अमेरिका के ही सहयोग से स्थापित इस संस्था से अमेरिका-इजराइल का अलग होना संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं की अप्रासंगिकता और अनुपयोगिता का ही द्योतक है। जिस प्रकार विगत कुछ दशकों से स्वयं संयुक्त राष्ट्र और इसके आनुषंगिक संगठन जैसे- मानवाधिकार संगठन, यूनेस्को इत्यादि अपनी विरोधाभासी नीतियों, योजनाओं और निर्णयों के लिए अधिसंख्य देशों की दृष्टि में अविश्वसनीय बने हैं, उस स्थिति में यूनेस्को से अमेरिका व इजराइल का अलग होना असहज नहीं करता।

भारत के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों का समर्थक बन कर अमेरिका अपने दक्षिण एशियाई हितों को साधने की कोशिश करेगा। लेकिन इसमें भारत या किसी और देश को आपत्तिजनक कुछ भी नहीं लगना चाहिए। हां, भारत को अमेरिका की मैत्री के बदले रूस-चीन के साथ पूर्व निर्धारित अपनी कूटनीतियों को नए सिरे से संभालना होगा। ब्रिक्स, जी-20, जलवायु सम्मेलन और अन्य अनेक वैश्विक वार्ताओं में भारत इस दिशा में अपेक्षित कार्य कर भी रहा है। पिछले साढ़े चार वर्षों में आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भारत का महत्त्व बहुत बढ़ा है। चाहे देशों की आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन करने वाली विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएं हों या फिर देशों में व्यवसाय के सुगमतापूर्वक परिचालन का आकलन करने वाले वैश्विक संगठन, इन सभी ने भारत को उच्च श्रेणी में रखा है।

सामरिक क्षेत्र में भारत नित नए आयाम छू ही रहा है। संस्कृति और पर्यावरण के क्षेत्र में भी भारत की साहित्यिक और दार्शनिक विरासत विश्व के लिए अनुकरणीय बनी हुई है। अमेरिका के लिए भारत का महत्त्व और उपयोगिता जिन बिंदुओं पर निर्धारित हो रहे हैं, उनमें दोनों देशों की सरकारों के मध्य विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर निरंतर होने वाले सकारात्मक संवाद की बड़ी भूमिका है।

 

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