संतुलित उपयोग जरूरी

स्रोत: द्वारा डॉ. रामकुमार वर्मा: राष्ट्रीय सहारा

विश्व स्वास्य संगठन का टीवी, मोबाइल आदि के बच्चों पर प्रभाव से संबंधित रिपोर्ट शिक्षा एवं जीवन में तकनीकी के अंधाधुंध प्रयोग पर उचित निर्णय लेने के लिए एक महत्त्वपूर्ण विमर्श है। संगठन का कहना है कि टीवी, मोबाइल या लैपटॉप पर ज्यादा वक्त बिताने से बच्चों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। संगठन ने दुनिया भर में मोटापे के बढ़ते खतरे से निपटने और बच्चों का बेहतर विकास सुनिश्चित करने के लिए अभियान चलाया है।

इसके तहत स्क्रीन टाइम यानी मोबाइल या टीवी के सामने बीतने वाले समय संबंधी निर्देश जारी किए हैं। दिशा-निर्देश के अनुसार जीवन के शुरुआती पांच साल बच्चों के दिमागी विकास और स्वास्य के लिहाज से महत्त्वपूर्ण होते हैं। जरूरी है कि इस वय समूह के बच्चों का स्क्रीन टाइम कम से कम रखने की कोशिश की जाए। संगठन का यह भी निर्देश है कि एक साल से कम उम्र के बच्चों को खेल आदि के माध्यम से अधिक सक्रिय रखने की जरूरत है। हालांकि संगठन की रिपोर्ट और दिशा-निर्देश आवश्यक होते हुए भी प्र्याप्त नहीं हैं।

पूर्व प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक तथा उच्च-शिक्षा में मशीनों के प्रयोग की मात्रा पर एक विस्तृत दिशा-निर्देश की जरूरत न केवल आज की शिक्षा व्यवस्था को है, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए भी आवश्यक है। स्वास्य वैज्ञानिक, शिक्षा-शास्त्री, मनौवैज्ञानिक, दार्शनिक, समाजशास्त्री आदि के एक संयुक्त दल की मदद से इस विषय पर व्यापक शोध की जरूरत है कि शिक्षा व्यवस्था एवं मानव जीवन में मशीन या यंत्र से संचालित तकनीक का कितना इस्तेमाल मानव के शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक तथा मानवीय गुणों के विकास के लिए अनुकूल या नुकसानदेह है।

तकनीक के बढ़ते प्रयोग को संतुलित आकार देने के लिए संगठन को और अधिक तथा व्यापक रूप से कार्य करने की जरूरत है ताकि मानव, मानवता एवं मानवीय स्पर्श को सुरक्षित रखा जा सके-चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या जीवन का। विश्व के अन्य राष्ट्रों की भांति भारत भी आज शिक्षा को डिजिटल आकार देने के लिए प्रयासरत है। हमारे बजट प्रावधान के माध्यम से ब्लैकबोर्ड को डिजिटल- बोर्ड से स्थानान्तरित करने की योजना मुखर है। हम सारांश, स्टेम-स्कूल, ई-बस्ता, विद्यांजली, स्वयं, स्वयं-प्रभा आदि कार्यक्रमों के माध्यम से डिजिटल भारत के निर्माण के लिए प्रस्तुत एवं तत्पर हैं।

स्कील-इंडिया, कैम्पस-कनेक्ट, ग्लोवल इनिसियटिव ऑफ एकेडमिक नेटवर्क्‍स, नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी, नेशनल एकेडमिक डिपोजिटरी, ई-लर्निग, मोबाइल बेस्ड लर्निग, ब्लेनडेड लर्निग एप्रोच, डिगिलौकर, विडियो-वेस्ड लर्निग, ओपन एजुकेशनल रिसोर्स, वर्चुअल रियलिटी एवं अगमेंटेट रियलिटी पफॉर लर्निग, प्रसनलाइज्ड एंड एडप्टिव लर्निग आदि की मदद से भारतीय शिक्षा एक डिजिटल शक्ति बनने की दिशा में लगातार अग्रसर है। स्टडी वेव्स ऑफ एक्टिव लर्निग फॉर यंग एसपायरिंग माइंड एक देशी आईटी प्लेटफॉर्म है, जिसकी मदद से भारत में बहुत सारे ऑनलाइन पाठय़क्रम को शुरू करना है।

इसका उद्देश्य विभिन्न प्रकार के पाठय़क्रम एवं विषय को शुरू कर उच्च गुणवत्ता वाली ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करनी है। स्वयं प्रभा प्रोजेक्ट डीटीएच चैनल के माध्यम से चौबिसों घंटे और सातों दिन शैक्षिक प्रसारण की शुरुआत कर चुका है। अन्तरराष्ट्रीय अनुभव एवं गुणवत्ता से भारतीय शिक्षा को लाभ पहुंचाने के लिए ग्लोवल इनिसियटिव ऑफ एकेडमिक नेटवर्क्‍स की शुरुआत हो चुकी है। नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी के माध्यम से भारतीय उच्च शिक्षा को विश्व में कहीं भी उपलब्ध अध्ययन सामग्री को किसी एक पुस्तकालय में बैठे अध्ययनकत्र्ता को उपलब्ध कराना है। इसकी मदद से अधिगमकत्र्ता न केवल ई-जरनल बल्कि दुर्लभ किताबों एवं दस्तावेज तक आसानी से पहुंच सकेंगे।

अकादमिक पुरस्कार एवं अन्य महत्त्वपूर्ण दस्तावेज को सरुक्षित रखने की योजना है नेशनल एकेडमिक डिपोजिटरी एंड डिगी-लौकर। शैक्षिक परिसरों को वाई-फाई से जोड़कर ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था एक महत्त्वपूर्ण कदम है। ब्लेनडेड लर्निग एप्रोच आईसीटी तथा कक्षा-शिक्षण के बीच समन्वय स्थापित कर उन्हें जोड़ना है। ई-बस्ता एक ऐसा संयुक्त प्लेटफॉर्म है जहां शिक्षक, विद्यार्थी, पुस्तक-प्रकाशक मिलकर किसी भी सूचना एवं तय को आसानी से उपलब्ध करा सकते हैं।

सारांश केन्द्रीय मायमिक शिक्षा बोर्ड की ऐसी पहल है, जो इसके विद्यालयों के विश्लेषण एवं मूल्यांकन की सुविधा प्रदान करती है ताकि शिक्षण को सुधर कर और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके। शाला-सि( न्यूपा द्वारा विकसित राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जो विद्यालय के मूल्यांकन एवं उनकी गुणवत्ता को माप उनकी कमियों को दूर कर सकता है। स्टेम-साइंस, टेक्नोल्जी, इंजीनियरिंग एवं मैथ (एसटीईएम) वास्तविक विश्व समस्याओं एवं प्रोजेक्ट की मदद से बच्चों को सामूहिक तथा सामुदायिक अधिगम प्रदान करने वाली योजना हैं। विद्यांजली एक प्रयास है, निजी संस्थानों एवं सामुदायिक भागीदारी सरकारी विद्यालयों के लिए सुनिश्चित करने का।

तात्पर्य भारत शिक्षा के हर स्तर पर डिजिटल माध्यम से शिक्षा प्रदान करने के लिए कृत संकल्प है। उपलब्धि हासिल करने का हमारा कोई भी प्रयास एवं हमारी कोई भी शैक्षिक योजना मानव हित एवं मानव स्थास्य से बढ़कर नहीं हो सकता। शिक्षा के माध्यम से प्रकृति एवं प्राकृतिक गतिशीलता को नियंत्रित करने के प्रयास में हमें मिलेनियम एवं सस्टेनेवुल डवलपमेंट गोल्स के साथ-साथ मानवाधिकार के आयामों पर भी विचार करना होगा।

यूनेस्को कमीशन आन एजुकेशन (1996) के लर्निग टू लीव टूगेदर एवं लर्निग टू बी के साथ-साथ हमें यूनेस्को (1972) के इंटरनेशनल कमीशन ऑन एजुकेशन के प्रतिवेदन के साइंटिफिक हयूमनिज्म, डवलपमेंट ऑफ क्रियटिविटी, सोशल कमीटमेंट एवं कमप्लिट मैन को भी ध्यान में रखना होगा। शिक्षा में मानवीय संवेदना दिए बिना शिक्षा निर्धारित उद्देश्य से भटक सकती है। इस दृष्टि से जरूरी है कि हम शिक्षण-अधिगम में मशीनी तकनीक का संतुलित उपयोग करते हुए मानवीय तकनीक जैसे शिक्षण-कौशल, संचार-कौशल, शोध-कौशल तथा प्रबंध आदि जैसे कौशलों का उपयोग करें।

 

 

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