रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से ही बनेगी बात

स्रोत: द्वारा नितिन देसाई: बिजनेस स्टैंडर्ड

देश के राजनीतिक हलकों और मीडिया में राफेल लड़ाकू विमान सौदे की खूब चर्चा रही। सारी दलीलें मौजूदा सौदे और अतीत में किए गए सौदे की लागत और बातचीत की प्रक्रिया मेंप्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका पर केंद्रित रहीं। चुनावी मौसम है इसलिए यह बहस चलती रहेगी। एक बड़े अंतरराष्ट्रीय हथियार खरीद सौदे में ऐसा होना लाजिमी है।  इस बहस में असल समस्या को किनारे कर दिया गया है। समस्या है हथियार आपूर्तिकर्ताओं पर हमारी भारी भरकम निर्भरता। स्वीडन में अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान सिपरी के आंकड़ों के मुताबिकवर्ष 2017 में भारत आने वाले कुल विदेशी हथियारों की लागत 300 करोड़ डॉलर तक थी। दुनिया के अन्य वैश्विक या क्षेत्रीय शक्ति संपन्न देश नजदीकी सहयोगियों के अलावा हथियार आयात पर निर्भर नहीं रहते। वर्ष 2017 में इन देशों का कुल हथियार आयात 400 करोड़ डॉलर था। हकीकत में उनमें से कई खुद बेहतरीन हथियारों के निर्यातक हैं।

ऐसा कोई भी देश जो अहम हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हो वह सामरिक स्वायत्तता हासिल करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। लंबी अवधि के नजरिये से देखें तो राफेल सौदे को लेकर जो बातें की जा रही हैं वे सही मायने में मूल समस्या का समाधान नहीं करतीं। हमारी असल चिंता यह है कि हम न केवल लड़ाकू विमानों जैसे उन्नत हथियारों के लिए बल्कि राइफल जैसे बुनियादी हथियारों तक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। हमारी रक्षा खरीद प्रक्रिया ऐसी है कि हथियारों से जुड़े शोध, इंजीनियरिंग, नए उत्पादों, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स आदि क्षेत्रों में लंबी अवधि का निवेश नहीं आ पा रहा है। जबकि उन्नत हथियारों के निर्माण में इसकी अहम भूमिका है।

रक्षा उपकरण उद्योग काफी हद तक विनिर्माण क्षमता की विविधता और अर्थव्यवस्था की शोध क्षमता पर निर्भर करता है। क्योंकि इन्हीं के दम पर वह अपने प्रतिस्पर्धियों का मुकाबला कर सकता है। यही वजह है कि 70 वर्ष से भी पहले सन 1946 में पंडित नेहरू द्वारा रक्षा नीति पर लिखे गए एक नोट में कहा गया है, 'अगर किसी देश ने वैज्ञानिक शोध को उसके सभी स्वरूपों में उच्चतम स्तर तक नहीं पहुंचाया तो वह औद्योगिक क्षेत्र में या किसी अन्य देश के साथ युद्घ में कतई प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता।'

इसी सामरिक अवधारणा के चलते बुनियादी उद्योगों और रक्षा के क्षेत्र में डीआरडीओ और परमाणु ऊर्जा आयोग जैसे संस्थानों की स्थापना को लेकर जबरदस्त प्रतिबद्घता दर्शाई गई। विनिर्माण क्षमता में इजाफा करने और शोध प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के इस दोहरे लक्ष्य को पाने में हमें किस हद तक कामयाबी मिली है? पंचवर्षीय योजना के पहले चरण में वृहद स्तर परजीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी में इजाफा हुआ और यह सत्तर के दशक के मध्य तक यह 11 फीसदी से बढ़कर 16 फीसदी हो गया। परंतु उसके बाद से यह अनुपात 17 फीसदी के आसपास ठिठका हुआ है। हालांकि यह आंकड़ा उन व्यापक बदलावों को नहीं समेटता जो विनिर्माण के क्षेत्र में आए हैं।

इतना ही नहीं हमें यह भी समझना होगा कि विनिर्माण क्षेत्र के बाहर जो भी कुछ घट रहा है, उदाहरण के लिए सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, उनका भी महत्त्वपूर्ण सामरिक मूल्य है। फिर भी अगर कोई भारत की तुलना चीन से करे तो हम इस नतीजे की अनदेखी नहीं कर सकते कि अधिकांश उन्नत उत्पादों के लिए हम अभी भी उत्पादन तकनीक,विशिष्ट पदार्थों और इंजीनियरिंग घटकों के आयात पर निर्भर हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी तस्वीर अच्छी नहीं है। आकलन के मुताबिक वैश्विक शोध एवं विकास पर होने वाले व्यय के 4 फीसदी के लिए भारत उत्तरदायी है। तुलनात्मक रूप से देखें तो चीन इस मद में 21 फीसदी का हिस्सेदार है। यह यूरोप के लगभग बराबर और अमेरिका से थोड़ा कम है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भी जीडीपी के अनुपात के रूप में हमारा व्यय केवल 0.7 फीसदी है।

जाहिर सी बात है कि हमें अभी विश्वस्तरीय विनिर्माण और विज्ञान तथा तकनीक क्षमता विकसित करने में लंबा समय लगेगा। मांग की लंबी अवधि की आश्वस्ति के साथ उपयुक्त रक्षा उपकरण उद्योग विकसित करना न केवल रणनीतिक स्वायत्तता के लिए आवश्यक है बल्कि इसकी बदौलत हम अर्थव्यवस्था के असैन्य भाग को और उन्नत बना सकेंगे। अमेरिका की असैन्य तकनीक का बहुत बड़ा हिस्सा उसके रक्षा शोध एवं निर्माण क्षेत्र में किए गए भारी भरकम निवेश पर निर्भर करता है। रक्षा शोध एवं शोध में यह निवेश उसका निजी क्षेत्र भी करता हैऔर सरकारी क्षेत्र भी। इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

पीछे मुड़कर देखें तो वर्ष 2004-05 में केलकर समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए हमें स्वदेशी हथियार निर्माण पर काम करना चाहिए।इसका एक अहम हिस्सा था उन निजी और सरकारी कंपनियों की पहचान जो दीर्घावधि में शोध, विकास और उत्पादन कर सकें। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ। एक ओर एचएएल जैसी सरकारी कंपनियां जिन्होंने महत्त्वपूर्ण तकनीकी दक्षता हासिल की है, उन्हें अक्षम होने और कमजोर प्रदर्शन के आरोप के साथ किनारे लगाया जा रहा है और दूसरा निजी क्षेत्र को सक्षम बनाने के प्रयास भी अनुबंधित विनिर्माण से आगे नहीं बढ़ सके हैं। निजी क्षेत्र को शोध एवं क्षमता विस्तार न करने देने की वजह स्पष्ट नहीं है।

शायद ऐसा इसलिए किया गया होगा क्योंकि इससे सांठगांठ वाले पूंजीवाद के आरोप लग सकते हैं। डीआरडीओ को फंड दिया गया और वह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर होने वाले व्यय के एक तिहाई का जिम्मेदार है। इसने कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियां भी हासिल की हैं। परंतु अभी भी उपभोक्ता सेवाओं और डीआरडीओ के बीच विश्वास की भारी कमी है। एक अन्य वजह यह है कि स्वदेशी उत्पादन विकल्प की प्रतीक्षा के बजाय तत्काल आयात को तरजीह दी जा रही है। इन तमाम कमियों को दूर करना होगा। हमें अब उपभोक्ता सेवाओं, शोधकार्य और चयनित उत्पादन कंपनियों एक साथ लाकर राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप रक्षा तंत्र विकसित करना होगा। एक बहुदलीय सुरक्षा परिषद गठित करके इन राष्ट्रीय लक्ष्यों को बढ़ावा देना होगा। हमें दीर्घावधि के लिए मजबूत और भरोसेमंद सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ अल्पकालिक जोखिम उठाने ही होंगे। केवल ऐसा करके ही हम वह आवश्यक रणनीतिक स्वायत्तता प्राप्त कर सकेंगे जो हमारे राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

 

Print Friendly, PDF & Email