भारत के लिए क्वाड गुट अभी खास उपयोगी नहीं

स्रोत: द्वारा प्रेमवीर दास: बिजनेस स्टैंडर्ड

हाल में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक गुट बनाने का मसला सामरिक जगत में काफी चर्चा का विषय रहा है। असल में, इन देशों के अधिकारियों का एक समूह निचले स्तर पर सक्रिय भी हो चुका है। कुछ लोग यह दलील देते हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इन चारों देशों के एक-दूसरे से मेल खाने वाले सामरिक एवं सुरक्षा हित हैं लेकिन कई लोग इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि ऐसे किसी गुट के गठन के लिए जरूरी तालमेल इन देशों के बीच स्थापित हो चुका है।

इस चौकड़ी की संकल्पना सामुद्रिक क्षेत्र में सहयोग से संबंधित है। इसकी शुरुआत 1990 के दशक में उस समय हुई थी जब पूर्व सोवियत संघ के पतन के बाद भारत-अमेरिका के रिश्ते सुधरने शुरू हुए। दोनों देशों के संपर्क को गति देने का काम रक्षा सहयोग ने किया। इसी क्रम में भारत और अमेरिका की नौसेनाओं ने 'मालाबार' नाम से संयुक्त अभ्यास करना शुरू किया। समय बीतने के साथ दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग गहरा और मजबूत होता गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि विमानवाहक पोत और पनडुब्बियों की तैनाती भी बिना किसी हिचक के होने लगी। एक दशक पहले जापान को भी इस सैन्य अभ्यास का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया गया और फिर ऑस्ट्रेलिया भी इसका अंग बन गया। उस समय पहली बार 'क्वाड' (चौकड़ी) शब्द का इस्तेमाल किया गया।

चीन ने बड़ी नौसैनिक शक्तियों की इस गुटबंदी के खिलाफ एतराज जताया था। यहां तक कि भारत भी इस धारणा को लेकर कुछ संकोच रखता था। इस वजह से कई वर्षों तक 'मालाबार' तीन देशों के नौसैनिक अभ्यास का ही सालाना आयोजन बना रहा। एक साल इसका आयोजन हिंद महासागर की बंगाल की खाड़ी में होता रहा तो अगले साल पूर्वी एशिया के समुद्र में तीनों नौसेनाएं अभ्यास करती रहीं। इसी अवधि में भारत-अमेरिका और भारत-जापान संपर्क में राजनीतिक संपर्क भी तेज हुए। दोनों पक्षों के रक्षा एवं विदेश मंत्रियों की बैठक (2 प्लस 2) भी हर साल होने लगी।

ऐसे में यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि इन देशों के इस तरह से एक-दूसरे से जुडऩे की क्या जरूरत पड़ गई? बाहरी प्रेक्षकों के लिए यह सवाल प्रासंगिक है। आखिर भारत कई अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर रक्षा सहयोग करता है और आसियान जैसे बहुपक्षीय समूहों के साथ के भी सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है। वह दूसरे समूहों ब्रिक्स, आरआईसी और एससीओ का भी हिस्सा रहा है। लेकिन इनमें से किसी भी समूह के सामरिक निहितार्थ भारत-अमेरिका-जापान समूह की तरह नहीं हैं।

भारत और अमेरिका के लिए इस पहलू को हर कोई देख सकता है। अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र प्राथमिक चिंता का विषय रहा है और अगर हिंद महासागर भारत के लिए प्राथमिकता रखता है तो प्रशांत क्षेत्र से जुड़े मामले भी अहमियत रखते हैं। इसकी वजह यह है कि भारत का आधे से भी अधिक कारोबार समुद्र के इसी रास्ते से होता है और यह बढ़ ही रहा है। दुनिया के दो बड़े लोकतांत्रिक देश बड़े व्यापारिक साझेदार हैं और अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की अच्छी-खासी आबादी भी है। भारत के उलट अमेरिका का चीन के साथ कोई सीमा विवाद नहीं है लेकिन व्यापार के मोर्चे पर दोनों देशों में गहरे मतभेद रहे हैं। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर एवं पूर्वी चीन सागर में चीन का आक्रामक रुख और अमेरिका के बरक्स खुद को महाशक्ति के तौर पर खड़ा करने की उसकी चाहत भी है।

इस स्थिति में भारत और अमेरिका का रक्षा सहयोग में करीबी आना काफी मायने रखता है। आज के समय में अमेरिका भारत को सैन्य साजोसामान आपूर्ति करने के मामले में सबसे आगे है। इस द्विपक्षीय संबंध में कोई कमजोरी नजर नहीं आती है। हालांकि रूस और ईरान को लेकर अमेरिकी नीतियों के चलते उन देशों के साथ हमारे स्वस्थ रिश्ते को कायम रख पाना कभी-कभी मुश्किल भी हो जाता है। हालांकि हालिया घटनाएं बताती हैं कि ये चुनौतियां ऐसी नहीं है कि उनसे पार न पाया जा सके। कुल मिलाकर, दोनों देशों के सामरिक हित काफी स्पष्ट हैं।

अमेरिका का सैन्य सहयोगी और अपने आप में एक बड़ी आर्थिक शक्ति जापान भी इसका हिस्सा बन जाता है। हालांकि भारत और जापान के बीच कारोबार भी बहुत अधिक नहीं हुआ है और न ही इनका रक्षा सहयोग मालाबार अभ्यास से आगे बढ़ पाया है और सैन्य उपकरणों के आदान-प्रदान में भी तब्दील नहीं हुआ है। फिर भी सामरिक मुद्दे इनके रिश्ते को अलग ही श्रेणी में रखते हैं। मसलन, जापान अपनी तेल जरूरतों के लिए खाड़ी देशों से हिंद महासागर के रास्ते होने वाले आयात पर निर्भर है। तेल लाने वाले जहाज चीन के प्रभाव वाले दक्षिण चीन एवं पूर्वी चीन सागर से होकर गुजरते हैं। इस इलाके में जापान अपने हितों की रक्षा अमेरिकी समर्थन से कर सकता है लेकिन हिंद महासागर क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा के लिए उसे भारत की मदद की जरूरत है।

इसके अलावा भारत की ही तरह जापान का भी चीन के साथ पूर्वी चीन सागर में सीमा विवाद चल रहा है। जापान के साथ कारोबारी रिश्ता परवान चढऩे के बावजूद चीन उसे एक विरोधी देश के तौर पर ही देखता है। इन दोनों कारणों से जापान के लिए भारत हिंद-प्रशांत मामलों में एक उपयोगी साझेदार बन जाता है। इसके साथ अगर दक्षिणी चीन सागर में भारत के निहित हितों और जापान की अहम सामुद्रिक क्षमता को भी ध्यान में रखें तो दोनों देशों के साझा हित पूरी तरह साफ हो जाते हैं। वैसे जापान की गिनती अब भी अमेरिका जैसे सामरिक साझेदार के तौर पर नहीं की जा सकती है लेकिन उसमें इस त्रिकोणीय संबंध को सशक्त करने की पूरी क्षमता है। ऐसे में इस पूर्वी एशियाई देश को भी अपने साथ रखना वांछनीय है।

इस चौकड़ी का चौथा हिस्सा ऑस्ट्रेलिया है। हालांकि अभी तो वह केवल औपचारिक तौर पर ही इस समूह का हिस्सा है। ऑस्ट्रेलिया के साथ हमारा कारोबार बहुत अधिक नहीं है। वह चीन का सबसे बड़ा कोयला आपूर्तिकर्ता देश है और उसका चीन के साथ किसी भी तरह का सीमा या अन्य विवाद भी नहीं है। हालांकि ऑस्ट्रेलिया अमेरिका का सैन्य सहयोगी देश है लेकिन भारत के नजरिये से देखें तो ऑस्ट्रेलिया और भारत के हितों में समान बातें बहुत कम हैं। जहां तक निर्बाध समुद्री परिवहन का सवाल है तो वह कारोबार के लिए नौवहन पर निर्भर किसी भी देश का बुनियादी हित होता है।

केवल इतने भर से ऑस्ट्रेलिया के साथ भरोसेमंद सामरिक रिश्ते भारत के लिए अपरिहार्य नहीं हो जाते हैं। हालांकि ऑस्ट्रेलिया हिंद महासागर क्षेत्र में एक अहम नौसैनिक ताकत है और उसके साथ संबंध रखना जरूरी है लेकिन उतने भर से वह इस चौकड़ी में बड़ी भूमिका निभाने का हकदार नहीं बन जाता है।  लेकिन भारत, अमेरिका और जापान की स्थिति एकदम अलग है। ये देश वर्ष 2030 तक न केवल दुनिया की शीर्ष चार में से तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होंगे बल्कि हरेक भागीदार देश को यह लगता है कि दूसरे देश उसके सामरिक हितों को बढ़ाने में मददगार हो सकता है। इनमें से हरेक देश के लिए चीन की बढ़ती शक्ति आकांक्षाएं चिंता का विषय हैं।

निस्संदेह, इस गठबंधन को लेकर जाहिर की गई खामियों के आने वाले वर्षों में दूर हो जाने की संभावना है। और इस रिश्ते को आगे संवारने की भी जरूरत होगी। 'क्वाड' गठजोड़ आगे जारी रह सकता है लेकिन एक सामरिक जरूरत के तौर पर अभी इस अवधारणा का वक्त नहीं आया है।

 

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