नहीं बढ़ी कार्यशील महिलाओं की तादाद

स्रोत: द्वारा श्यामल मजूमदार: बिजनेस स्टैंडर्ड

भारत में महिला श्रम भागीदारी की दर में भारी गिरावट आना चिंताजनक है, लेकिन इससे भी चिंताजनक बात ग्रामीण क्षेत्रों में और तेजी से गिरावट आना है। एक अन्य चिंताजनक पहलू यह है कि जो महिलाएं काम कर रही हैं, उनमें से भी ज्यादातर को कम पारिश्रमिक वाला रोजगार मिला हुआ है। इसके दोहरे प्रभाव हुए हैं। आम तौर पर उनका पारिश्रमिक काम के घंटों की तुलना में बहुत कम होता है, जिससे उनमें नौकरी को जारी रखने का उत्साह कम हो जाता है।  इन आंकड़ों को लेकर अचंभा नहीं करना चाहिए।

अमेरिकी जनसंख्या प्रभाग के एक अनुमान में कहा गया है कि भारत में महिला श्रम भागीदारी दर 14 एशिया-प्रशांत राष्ट्रों की सूची में केवल फिजी से अधिक है। बांग्लादेश जैसे देश भी भारत से काफी आगे हैं, जिसकी मुख्य वजह वहां संगठित परिधान उद्योग की अच्छी प्रगति है। बांग्लादेश में महिला कामगारों की आबादी में तेजी से सुधार आ रहा है। वहां निर्यात प्रसंस्करण जोनों में कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 72 फीसदी है। यह मलेशिया से अधिक और कोरिया तथा फिलिपींस के बराबर है।

भारतीय महिलाओं की कार्यबल में कम भागीदारी के लिए कई सामाजिक कारण भी जिम्मेदार हैं। समाज में महिलाओं से परिवार की देखभाल करने की उम्मीद की जाती है। ऐसे में जो महिलाएं नौकरी करने की कोशिश करती हैं, उन्हें अन्य महिलाओं और परिवार के विरोध का सामना करना पड़ता है।  इसके अलावा भी कई कारण हैं। महिलाओं को न्याय दिलाने के क्षेत्र में काम करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन- साक्षी के सर्वेक्षण के मुताबिक 80 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके कार्यस्थल पर यौन शोषण होता है। वहीं, 53 फीसदी ने कहा कि पुरुषों और महिलाओं को कार्यस्थल पर समान अवसर नहीं मिलते हैं।

भारत में एक प्रमुख कमी यह है कि आर्थिक गतिविधियों में उच्च शिक्षित महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। इससे यह साफ है कि शिक्षा का प्रसार बढऩे के बावजूद भारत में कार्यशील महिलाओं की तादाद में इजाफा नहीं हुआ। इस अनुसंधान ने दिखाया है कि महिला कार्यबल की भागीदारी और शिक्षा के स्तर में नकारात्मक संबंध है क्योंकि शिक्षा के स्तर में बढ़ोतरी के बाद कार्यबल की भागीदारी घटती है। इसलिए अशिक्षित महिलाओं के शिक्षित महिलाओं की तुलना में नौकरी करने की ज्यादा संभावना होती है। इसकी वजह यह है कि देश में जिस तरह की आर्थिक वृद्धि की प्रकृति है, उससे उन क्षेत्रों में बहुत से रोजगारों का सृजन नहीं हुआ है जिनमें महिलाओं को आसानी से रोजगार मिल सके।

उदाहरण के लिए उच्च शिक्षा में महिलाओं के नामांकन का हिस्सा 38 फीसदी है, लेकिन उनकी कार्यबल में भागीदारी यहां तक कि शहरी भारत में भी काफी कम है। इसकी वजह महिलाओं को दी जाने वाली नौकरियों का स्तरहीन होना और भारत का सामाजिक ढांचा है। उदाहरण के लिए साक्षी सर्वेक्षण में दर्शाया गया है कि विनिर्माण में दो-तिहाई महिलाएं उत्पादन ऑपरेटर या मैनुअल वर्कर के रूप में काम कर रही हैं। सेवा क्षेत्र में भी महिलाएं लिपिक, बिक्री एवं सेवा जैसे रोजगार में हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से महिलाओं के पेशे माना जाता है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अध्ययन एक रोचक नजरिया पेश करता है। अपर्याप्त रोजगार पैदा होने के बावजूद परिवारों की आय बढ़ी है। इससे महिलाओं की प्राथमिकता में बदलाव आया है, जिससे सहायक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी में कमी आने के आसार हैं। इसके लिए मुख्य वजह अन्य आय प्रभाव है। अगर महिलाओं की खुद की आमदनी के अलावा परिवार की आय अधिक है तो महिलाओं के श्रम बल में शामिल होने के कम आसार होते हैं।  हालांकि शहरी इलाकों में हालात बेहतर हैं। लेकिन भारत में कनिष्ठ से लेकर मध्यम स्तर तक के पदों पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व में भारी गिरावट आई है।

यह रुझान अन्य एशियाई देशों से अलग है, जहां ऐसी गिरावट मध्यम से उच्च स्तर के पदों पर आती है। इससे उच्च पदों पर कर्मचारियों की आपूर्ति प्रभावित होती है। आंकड़े दर्शाते हैं किघर पर बच्चे की देखभाल की व्यवस्था न होने के कारण एक-तिहाई महिला कर्मचारी फिर से नौकरी शुरू नहीं कर पाईं। इससे यह अवधारणा खारिज हो जाती है कि कार्यबल में शामिल होने या बाहर होने के महिलाओं के फैसले पर संगठनों का नियंत्रण होता है। कार्यस्थल पर उदार नीतियों या अवकाश में बढ़ोतरी से उन महिलाओं को कुछ मदद मिल सकती है,जो अपने करियर की महत्त्वाकांक्षा रखती हैं। इससे ऐसे देश में बहुत मदद मिलेगी, जहां 78 फीसदी योग्य महिला स्नातक संगठित कार्यबल का हिस्सा न बनने का फैसला करती हैं।

बिडंबना यह है कि चीन में कुल आबादी में कुशल महिलाओं का प्रतिशत कम है, लेकिन फिर भी उनके कार्यबल में शामिल होने की ज्यादा संभावना होती है। इसकी वजह यह है कि चीन में महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी की दर भारतीय महिलाओं से दोगुनी है।  चीन की कंपनियों के लिए इस बदलाव को सहज बनाने के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि 9 से 5 बजे तक के काम के घंटों से इतर विकल्प तलाशने होंगे या कर्मचारियों के बच्चों के लिए दिन में देखभाल की सुविधा देनी होगी। इसके अलावा परिवार से संबंधित कुछ फायदे देने होंगे। इनमें काम के समय में लचीलापन, घर से काम, परिवार के लिए छुट्टी और साझा नौकरी आदि को शामिल किया जा सकता है। सबसे अहम बात यह है कि इसके लिए सोचने के नजरिये में यह बदलाव लाना होगा कि कोई भी रोजगार स्त्री या पुरुष विशेष के लिए नहीं हो सकता।

 

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