विज्ञान से कहीं दूर

स्रोत: कुमार नरेंद्र सिंह: राष्ट्रीय सहारा

भारत में साइंस कांग्रेस अब केवल तमाशा बन कर रह गई है। सरकारी धन की अकथनीय बर्बादी की कहानी बन गई है इंडियन साइंस कांग्रेस। हाल ही में संपन्न हुई 106वीं इंडियन साइंस कांग्रेस में प्रस्तुत शोध-पत्रों की गुणवत्ता देखकर इस बात में कोई संदेह भी नहीं रह जाता। ऐसा नहीं है कि साइंस कांग्रेस की स्थिति हमेशा ऐसी ही रही है। पश्चिमी दुनिया से इतर भारत ही वह अकेला देश रहा है, जिसने आधुनिक विज्ञान को अपनाया। यह कहना भी कोई गलत नहीं होगा कि दुनिया के प्रथम गैर ह्वाइट वैज्ञानिक भारतीय ही रहे हैं। तब दुनिया भर के वेज्ञानिक स्वीकार करते थे कि भारत के वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक शोधार्थियों के पास सचमुच आधुनिक ज्ञान है, और वे शोधपरक सवाल करने में सर्वथा सक्षम थे।

लेकिन आज विज्ञान को कथा-कहानी और मिथक बनाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। मिथक को ही विज्ञान बताने की परिपाटी चल निकली है। दुर्भाग्य यह कि इस धत्कर्म में वर्तमान सरकार और उसके मुखिया नरेन्द्र मोदी स्वयं शामिल हैं। इस बार की इंडियन साइंस कांग्रेस में ऐसे-ऐसे दावे किए गए, जिन्हें देख-सुनकर कोई जादूगर भी चकरा जाए। ऐसे दावे करने वाले कोई विज्ञान के साधारण विद्यार्थी और शोधार्थी नहीं रहे हैं, बल्कि ऐसे लोग रहे हैं, जिनके कंधे पर विज्ञान-सम्मत शिक्षा प्रदान करने एवं उसे आगे बढ़ाने की महती जिम्मेदारी है। आंध्र विविद्यालय के वाइस चांसलर जी नागेश्वर राव और स्वतंत्र शोधकर्ता डॉ. के. जे. कृष्णा ने अपने-अपने शोध-पत्रों में कुछ ऐसे दावे किए जिनकी वैज्ञानिकता न केवल संदेहास्पद नजर आती है, बल्कि हास्यास्पद भी। नागेश्वर राव का दावा है कि कौरवों का जन्म स्टेम सेल तथा टेस्ट-टय़ूब तकनीक की सहायता से हुआ था।

राम और विष्णु के पास ऐसे अस्त्र-शस्त्र थे, जो भागते लक्ष्य का पीछा करने में सक्षम थे। इस कहानी के आधार पर उन्होंने दावा किया कि हजारों साल पहले हमारे देश में गाइडेड मिसाइल का विज्ञान था। इसी तरह उनका दावा है कि रावण के पास केवल पुष्पक विमान ही नहीं था, बल्कि 24 प्रकार के अन्य विमान भी थे और तब लंका में हवाई अड्डे भी थे। के. जे. कृष्णा इससे भी दो हाथ आगे जाकर दावा करते हैं कि न्यूटन और आइंस्टीन के फिजिक्स के सिद्धांत गलत हैं। इतना ही नहीं, वे तो यह भी कहते हैं कि जल्दी ही गुरु त्वाकर्षण तरंगों को ‘‘नरेन्द्र मोदी तरंग’ का नाम दिया जाएगा और गुरुत्वाकर्षण लेन्सिंग प्रभाव को ‘‘हर्षवर्धन प्रभाव’ का नाम दिया जाएगा।

इतना ही नहीं, इससे आगे जाकर कृष्णा हमें यह भी बताते हैं कि डायनोसॉर का अन्वेषण ब्रह्मा ने किया था, और वेदों में उसका जिक्र किया था। मजे की बात यह है कि ये दावे करने वाले तथाकथित वैज्ञानिकों ने अपने दावों के समर्थन में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी नहीं समझा, जबकि ऐसा करना उनकी नैतिक जिम्मेदारी थी। ऐसे दावों को सुन कर कोई अदना-सा आदमी भी हंसे बिना नहीं रह सकता, लेकिन राव और कृष्णा को अपने दावे हास्यास्पद नजर नहीं आए। क्या यही विज्ञान है? क्या ऐसे ही वैज्ञानिक सिद्धांतों से देश में विज्ञान आगे बढ़ेगा?

कथा-कहानी और मिथक को वैज्ञानिक तय के रूप में प्रस्तुत करना न केवल विज्ञान को क्षति पहुंचाता है, बल्कि मिथक की प्रेरित करने की शक्ति का भी नाश करता है। विज्ञान की प्रगति के लिए आलोचनात्मक दृष्टि आवश्यक होती है, और आवश्यक होता है विचारों का वैज्ञानिक आदान-प्रदान भी। लेकिन आज कोशिश हो रही है कि जो कहा जाए, उसे ज्यों का त्यों मान भी लिया जाए और वह भी बिना किसी साक्ष्य के। सवाल तो आयोजकों से भी किया जाना चाहिए कि बिना पत्र पढ़े और उसकी वैज्ञानिकता की जांच-पड़ताल किए बिना ही उसे क्योंकर पढ़ने दिया गया। जाहिर है कि आयोजकों की इसमें बड़ी भूमिका रही है। ऐसे आयोजक अपने लाभ और अपने संस्थान के प्रचार के लिए किसी भी तरह की साजिश में शामिल हो सकते हैं।

मालूम हो कि इस बार की इंडियन साइंस कांग्रेस का आयोजन लवली प्रोफेशनल स्कूल नामक एक निजी विविद्यालय में किया गया था। आयोजकों का दावा है कि इसमें 60 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों ने शिरकत की। लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि उनमें से किसी भी वैज्ञानिक ने कोई शोध-पत्र प्रस्तुत नहीं किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि आयोजकों को विज्ञान और वैज्ञानिकता से ज्यादा अपने संस्थान के प्रचार में दिलचस्पी थी।बहरहाल, कोई यह न समझे कि यह पहला मौका था, जब विज्ञान के नाम पर घटिया और अवैज्ञानिक शोध-पत्र पढ़े गए।

2015 में मुंबई में आयोजित इंडियन साइंस कांग्रेस में इसी तरह के दावे किए गए थे। तब दावा किया गया था कि प्राचीन भारत में हवाई जहाज का अस्तित्व था। इसके लिए बकायदा तब के हवाई जहाज के स्केच भी प्रस्तुत किए गए थे। यह अलग बात है कि बाद में उसे खारिज कर दिया गया था। इसी तरह 2016 में मैसूर में आयोजित साइंस कांग्रेस में दावा किया गया था कि बाघ के चमड़े पर बैठने से आयु नहीं बढ़ती है। दावा तो यहां तक किया गया था कि अगर कोई लगातार बाघ की छाल पर बैठे तो उसकी आयु पीछे की ओर लौटने लगती है। यही कारण है कि वेंकी रामकृष्णन ने साइंस कांग्रेस को एक सर्कस करार दिया था। दुर्भाग्य यह कि ऐसे अवैज्ञानिक दावों की शुरु आत स्वयं हमारे प्रधानमंत्री ने की थी, जिन्होंने गणोश के कटे सिर को हाथी के सिर से जोड़ने को प्लास्टिक सर्जरी का नायाब नमूना बताया था। इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान से लेकर साहित्य, दशर्न और तकनीकी में प्राचीन भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। लेकिन उसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है, और उसे सारी दुनिया के वैज्ञानिक मानते हैं।

आइंस्टीन ने भी कहा है कि प्राचीन भारत का योगदान यह है कि उसने हमें गणना करना सिखाया। स्टील बनाने और कपड़ा रंगने की तकनीक मूल रूप से भारत का ही योगदान है। लेकिन विज्ञान के नाम पर आस्था का प्रदशर्न करना और मिथक को विज्ञान बताना हमारे देश के लिए निश्चित रूप से घातक होगा। अन्यथा नहीं कि देश के अनेक वैज्ञानिकों ने इन दावों का मुखर विरोध किया है, और इंडियन साइंस कांग्रेस को इस आशय का पत्र भी लिखा है। सवाल उठता है कि क्या ऐसे ही दावों से भारत विश्व गुरु बनेगा? स्पष्ट है कि नहीं बनेगा। मिथक और विज्ञान में फर्क होता है, जनाब। उस फर्क को समझिए और वैज्ञानिकता को स्थापित करिए वरना विश्व गुरु बनने की वनिस्बत हम हास्य के पात्र बन कर रह जाएंगे।

 

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