प्राथमिक शिक्षा और सवाल

स्रोत: द्वारा अरविंद कुमार सिंह: जनसत्ता

देश में शिक्षा का अधिकार कानून और सर्वशिक्षा अभियान जैसी योजनाएं लागू होने के बाद भी प्राथमिक शिक्षा की सेहत सुधर नहीं रही है। हाल में जारी एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि देश भर में आठवीं कक्षा के अट्ठाईस फीसद छात्र ऐसे हैं जो कक्षा दो का पाठ तक नहीं पढ़ पाते हैं। इस मामले में जम्मू-कश्मीर की हालत सबसे खराब है, जबकि उत्तर प्रदेश दूसरे और हरियाणा तीसरे स्थान पर है। रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के स्कूलों में स्थिति अन्य राज्यों के मुकाबले बेहतर है।

अच्छी बात यह है कि देश में बेटियों की पढ़ाई को लेकर जागरूकता बढ़ी है। पिछले साल किए गए व्यापक सर्वे के आधार पर बनाई गई यह रिपोर्ट बताती है कि बेटियों के स्कूल न जाने की तादाद में भारी कमी आई है। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2006 में स्कूल न जाने वाली लड़कियों (11 से 14 साल) की संख्या दस फीसद से ज्यादा थी जो घट कर 2018 में सिर्फ चार फीसद रह गई है। लेकिन मध्यप्रदेश में स्कूल न जाने वाली लड़कियों की तादाद पहले से अधिक हुई है। गौर करें तो आज भी लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा की परिधि से बाहर हैं। उचित होगा कि इस तथ्य की पड़ताल हो कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं जा रहे हैं।

एक अप्रैल 2010 से लागू छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून में बच्चों को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान किया गया है। बच्चे स्कूल जाएं, इसके लिए बाल श्रम रोकथाम एवं नियमन कानून 1986 में चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मजदूरी को निषिद्ध बनाया गया है। इसके अलावा बच्चे अधिक से अधिक शिक्षित हों, इसके लिए सर्वशिक्षा अभियान चलाया जा रहा है। इसके लागू होने के बाद से तकरीबन तेरह लाख बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा गया है। लेकिन अभी भी पचास लाख से अधिक बच्चे प्राथमिक शिक्षा की परिधि से बाहर हैं जो प्राथमिक शिक्षा की बदहाली को रेखांकित करता है।

भारत में प्राथमिक शिक्षा किस कदर बदहाल है, इसका खुलासा संयुक्त राष्ट्र की ‘एजुकेशनल फॉर ऑल ग्लोबल मॉनिटरिंग 2013-14’ की एक रिपार्ट से भी हुआ था, जिसमें कहा गया था कि भारत में निरक्षर युवाओं की तादाद अट्ठाईस करोड़ से ज्यादा है। यह आंकड़ा दुनिया के निरक्षर युवाओं की कुल तादाद का तकरीबन सैंतीस फीसद है। रिपोर्ट में प्राथमिक शिक्षा की बदहाली के अनेक कारण गिनाए गए थे, लेकिन शिक्षा पर होने वाले खर्च में भारी असमानता को भी इसके लिए जिम्मेदार माना गया था। कुछ साल पहले एक रिपोर्ट में सामने आया था कि केरल में प्रति व्यक्ति शिक्षा पर खर्च लगभग बयालीस हजार रुपए है, वहीं बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में छह हजार या इससे भी कम है।

स्कूली शिक्षा को लेकर पिछले साल हुए सर्वे में पता चला कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में गरीबी के कारण सत्तर फीसद और मध्यप्रदेश में पिच्यासी फीसद गरीब बच्चे पांचवीं तक ही शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं। प्राथमिक शिक्षा की खराब गुणवत्ता का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि महाराष्ट्र के महज चवालीस फीसद और तमिलनाडु के सिर्फ तिरपन फीसद बच्चे ही दो अंकों वाले घटाने के सवाल हल करने में सक्षम हैं। यानी आधे से अधिक बच्चे गणित विषय में बेहद कमजोर हैं।

भाषा पर भी इनकी पकड़ कमजोर मिली। चार में से एक बच्चा एक वाक्य तक नहीं पढ़ सकता। कुछ राज्यों में लड़कियों का स्तर लड़कों से बेहतर जरूर पाया गया, लेकिन यह संतोषजनक नहीं है। इसलिए कि विद्यालयों में लड़कियों के नामांकन की दर अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली यह बात सामने आई कि देश में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के तमाम प्रयासों व दावों के बाद भी कोई उल्लेखनीय सफलता हाथ नहीं लगी। वह भी तब जब संविधान में बच्चों को अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा का अधिकार हासिल है और पिछले कुछ सालों में इस पर तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं।

हालांकि मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा ‘शिक्षा का अधिकार’ की तीसरी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि स्कूलों की संख्या और स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई है। लेकिन ये आंकड़े तब तक नाकाफी हैं, जब तक कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता है। आज प्राथमिक शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। किंतु यह तभी संभव होगा जब विद्यालयों को समुचित संसाधन उपलब्ध कराए जाएं और साथ ही प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती की जाए, ताकि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा सके।

आज प्राथमिक विद्यालय अव्यवस्था के शिकार हैं। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के आठ साल बाद भी सरकारी स्कूलों में पेशेवर शिक्षकों की भारी कमी है। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत राज्यों को स्कूलों में दक्ष एवं पेशेवर शिक्षकों को नियुक्त करने के एक महत्त्वपूर्ण मानदंड को पूरा करने के लिए पहले तीन वर्ष का समय दिया गया और अब इसे दो वर्ष और बढ़ा दिया गया। लेकिन अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हुए। देश में सरकारी, स्थानीय निकाय और सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षकों के पैंतालीस लाख पद हैं। लेकिन स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल सहित आठ राज्यों में ही शिक्षकों के पांच लाख से अधिक पद रिक्त हैं।

अकेले उत्तर प्रदेश में डेढ़ लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है। विडंबना तो यह कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत नियुक्त शिक्षकों में लाखों अप्रशिक्षित शिक्षक हैं और न्यूनतम योग्यता नहीं रखते। लेकिन किसी तरह उनसे काम चलाया जा रहा है। जबकि शिक्षा अधिकार कानून में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और हर स्कूली छात्र को प्रशिक्षित शिक्षकों से पढ़ाने का प्रावधान है। मालूम हो कि एक मामले में देश की शीर्ष अदालत भी छात्रों को प्रशिक्षित शिक्षकों से ही पढ़ाने का निर्देश दे चुकी है।

यहां ध्यान देना होगा कि प्राथमिक शिक्षा की बदहाली के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। कई कारण हैं जिनमें से एक शिक्षकों का स्कूलों से गायब होना भी है। उचित होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें शिक्षा की बदहाली के लिए जिम्मेदार कारणों की ईमानदारी से पड़ताल कर उसे दूर करें। शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की भी जरूरत है। यूनेस्को की रिपोर्ट में सुझाया गया था कि 2015 और इसके बाद की योजनाओं में कुल सरकारी खर्च का बीस फीसद हिस्सा शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। लेकिन हकीकत है कि आज इस मद में चार फीसद से अधिक खर्च नहीं हो पा रहा है।

प्राथमिक शिक्षा को सुधारने के लिए शिक्षक-छात्र अनुपात को भी कम करना होगा। कई स्कूलों में पचास से साठ छात्रों पर एक शिक्षक है। ग्रामीण इलाकों में तो हालात और बदतर हैं। ज्यादातर स्कूलों की इमारतें बेहद जर्जर हैं और उन्हीं में छात्रों को बिठाया जाता है। उनकी जान जोखिम में होती है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंत्री, सरकारी अफसर और सरकारी खजाने से तनख्वाह पाने वाले हर व्यक्ति के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य किया था। उम्मीद की गई थी कि सरकार इसे लागू किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि इस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दे दी गई। अगर आदेश का पालन हुआ होता तो निस्संदेह सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की तस्वीर बदलती। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि प्राथमिक शिक्षा की सेहत कैसे सुधरेगी।

 

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