लोकतंत्र का अर्थविधान

स्रोत: द्वारा आलोक पुराणिक: राष्ट्रीय सहारा

दस करोड़ परिवार ‘‘आयुष्मान भारत’ की स्कीम से लाभान्वित होंगे, दस करोड़ असंगठित क्षेत्र के कामगार पेंशन योजना का लाभ उठाएंगे, 12 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से साल के छह हजार रु पये दिए जाएंगे, कर योग्य आय की सीमा बढ़ाने का फायदा यानी पांच लाख तक की आय को कर मुक्त रखने का फायदा करीब तीन करोड़ को मिलेगा-इस आशय के बयान अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल के बजट भाषण में दिखे। दस करोड़ कामगार, 12 करोड़ किसान, तीन करोड़ कर योग्य आय सीमा बढ़ाने से लाभान्वित-करीब पच्चीस करोड़ लोग सीधे इस बजट से लाभान्वित होंगे, ऐसा दावा बजट करता है।

पच्चीस करोड़ लाभान्वित वोटों में तब्दील हो जाएं, ऐसी शुभकामना अंतरिम वित्त मंत्री की रही होगी। यह शुभकामना किस हद ठोस परिणाम लाएगी, यह देखने के लिए कुछ समय इंतजार करना होगा। पर एक बात साफ है कि इस बजट के अर्थविधान में साफ तौर पर लोकतंत्र का अंकगणित झांक रहा है। खेती किसानी का राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद में भले ही योगदान बीस प्रतिशत से कम हो, पर लोक सभा चुनाव और विधानसभा चुनाव परिणामों को तय करने में गांवों का योगदान जबरदस्त रहता है। सरकारें वोटों से बनती हैं। इसलिए चुनी हुई सरकार को उन क्षेत्रों के प्रति भी अतिशय संवेदनशील होना होगा, जहां से वोट बहुतायत में आते हैं।

‘‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ के तहत 2019-20 के लिए 75000 करोड़ रुपये रखे गए हैं। इस स्कीम में दो हेक्टेयर तक जमीन रखने वालों को किसानों को साल में छह हजार रुपये दिए जाएंगे। इस स्कीम का फायदा छोटे किसानों को होगा। यह घोषणा साफ करती है कि किसानों का इस अर्थविधान में क्या अर्थ है। करीब 75000 हजार करोड़ रुपये की रकम को इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि मोटे तौर पर जीएसटी संग्रह प्रति माह करीब एक लाख करोड़ रुपये का रहता है। लोकतंत्र में इन दिनों किसानों के हितों को लेकर, बेरोजगारों के हितों को लेकर एक प्रतिस्पर्धा चल रही है। विपक्ष के नेता कहते हैं कि हरेक को एक निश्चित आय मिलनी चाहिए। विपक्षी नेता की पार्टी के भूतपूर्व वित्त मंत्री कहते हैं कि ऐसा करना संभव है। पर वह नहीं बताते कि वह जब खुद केंद्र सरकार के वित्तमंत्री थे, तो वह ऐसा क्यों ना कर पाए?

अपने एक साक्षात्कार में पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने कहा कि ‘‘आय गारंटी स्कीम’ के लिए वह करीब तीन लाख करोड़ रु पये का प्रावधान करना चाहेंगे। तीन लाख करोड़ का तो नहीं, करीब 75000 करोड़ का इंतजाम पीयूष गोयल कर चुके हैं किसानों के लिए। अब साफ तौर पर किसान और बेरोजगार एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक कंस्टूचुएंसी के तौर पर चिह्नित हो रहे हैं और चूंकि इनके पास वोट हैं, इसलिए इनकी अनदेखी कर पाना अब संभव नहीं है। यों अरविंद केजरीवाल कह सकते हैं कि जितनी रकम किसान के खाते में केंद्र सरकार पूरे साल में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव कर रही है, उस रकम के दोगुने से भी ज्यादा यानी 14000 रुपये तो दिल्ली में अकुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी है। अकुशल मजदूर को दिल्ली में 14000 महीना मिलना चाहिए, यह बात भले ही कानून कहता हो, पर यह अलग सवाल है कि यह मजदूरी मिल कितनों को पाती है। यही सवाल आने वाले वक्त में पूछा जाएगा कि छोटे किसानों के खाते में प्रस्तावित रकम कितनी कुशलता से ट्रांसफर हो गई।

तेलंगाना में मुख्यमंत्री केसी राव एक कामयाब ट्रांसफर स्कीम चलाने में इसलिए सफल हुए कि उन्होंने पहले अपने राज्य की जमीनों के रिकार्ड दुरुस्त करवा लिये थे। यानी छह हजार सालाना ट्रांसफर की घोषणा पर अभी बहुत होमवर्क होना बाकी है। पर इस घोषणा के गहरे चुनावी निहितार्थ हैं। कुल मिलाकर 6000 रुपये के सालाना ट्रांसफर के प्रस्ताव से भाजपा राजनीतिक लाभांश अर्जित कर सकती है। असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने फिक्र दिखाई है। घोषणाओं के मुताबिक दस करोड़ असंगठित क्षेत्र के कामगारों को तीन हजार प्रति माह की पेंशन मिलेगी, अगर असंगठित कामगार 18 साल की उम्र में पेंशन स्कीम में आकर सिर्फ 55 रु पये प्रति माह का भुगतान करें या 29 साल की उम्र में पेंशन स्कीम में आकर सिर्फ 100 रु पये प्रति माह का भुगतान करें।

यह घोषणा अर्थव्यवस्था के उस वर्ग की चिंता करती है, जिसका रिकार्ड आम तौर पर कहीं ना होता। दिहाड़ी पर काम करने वाला यह वर्ग अर्थव्यवस्था के हाशिये पर रहता है। अगर इस प्रस्ताव का ठोस अनुवाद कार्यान्वन में हो गया, तो केंद्र सरकार उस काम का क्रेडिट ले सकती है, जो मूलत: करना तो लेफ्टी या लेफ्ट समर्थित सरकारों को चाहिए था, पर किया उसे भाजपा की सरकार ने। यह सरकार सिर्फ अपने उद्योगपति मित्रों के लिए ही कुछ करती है, ऐसे आरोप इस सरकार पर लगातार लगते रहे हैं। पांच लाख रुपये तक की आमदनी कर मुक्त होगी और कर बचत करने वाले छह लाख पचास हजार रुपये की आमदनी कर मुक्त रख पाएंगे। पांच लाख रुपये सालाना आय का मतलब करीब 42000 रुपये प्रति माह कमाने वाले भी कर मुक्त रह पाएंगे।

मुखर मध्य वर्ग के लिए यह खासी राहत है और सरकार के लिए भी। मुखर मध्य वर्ग की आवाज मीडिया में जल्दी और ज्यादा जगह पा जाती है। मोटे तौर पर 42000 प्रतिमाह की वेतन स्लैब में निजी क्षेत्र के बहुत कर्मचारी आ जाते हैं। उन्हें कर से राहत मिलेगी। मोटे तौर पर सरकार को यह राहत देने से करीब 18500 करोड़ का नुकसान होगा। यह भी लोकतंत्र का अर्थविधान है कि कर योग्य आय सीमा को बढ़ाने के लिए सरकार चुनावी साल में ही तत्पर दिखी है, यद्यपि इस सीमा को बढ़ाने की मांग तो हर बजट से पहले की जाती रही हैं। पर पिक्चर अभी बाकी है दोस्त, नई सरकार बनेगी वह अंतिम बजट पेश करेगी।

कुल मिलाकर ये सारी घोषणाएं बतौर ट्रेलर ही देखी जानी चाहिए इसलिए इन बजट प्रस्तावों पर अंतिम तौर पर खुशी नहीं मनाई जानी चाहिए। अगली सरकार क्या करे क्या नहीं करे, यह अभी साफ नहीं है। बस साफ यह है कि लोकतंत्र में कोई भी सरकार लगातार उस वर्ग को नाराज किए हुए नहीं रख सकती है, जिसके पास वोट हैं। किसान, कामगार, मध्य वर्ग ये सब वर्ग राजनीति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और चुनावी साल में इनका गणित अर्थविधान के लिए भी कितना अहम है यह कल के बजट ने दिखा दिया है।

 

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