परमाणु शस्त्र सबसे पहले प्रयोग न करने की नीति

स्रोत: द्वारा नितिन पई: बिजनेस स्टैंडर्ड

अब जबकि भारत ने भूमि, वायु, समुद्र और समुद्र की सतह के नीचे भी प्रतिरोधात्मक परमाणु हमले की क्षमता हासिल कर ली है तो उसे अपनी नाभिकीय नीति को लेकर एक नया रुख अपनाना चाहिए। मैंने कहा था, ' प्रतिरोध क्षमता की त्रयी पूरी करने के बाद अब आवश्यकता इस बात की है कि भारत की परमाणु हथियार संबंधी नीति की समीक्षा की जाए। अब जबकि हम विश्वसनीय दूसरी प्रहार क्षमता हासिल करने की स्थिति में हैं, ऐसे में हमारा ध्यान अंतरराष्ट्रीय परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था को लेकर चर्चा के बजाय एक ऐसी विश्व व्यवस्था कायम करने पर होना चाहिए जहां व्यापक संहार वाले इन हथियारों का इस्तेमाल न किया जाए।'

मैंने इसके आगे यह हिमायत भी की थी कि भारत चीन तथा अन्य परमाणु क्षमता संपन्न देशों के साथ मिलकर परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की नीति पर आगे बढ़े जहां दुनिया के सभी प्रमुख परमाणु क्षमता संपन्न देश यह घोषणा करें कि वे पहले हमला नहीं करेंगे। यह काम आसान नहीं है। जाहिर सी बात है केवल पहले इस्तेमाल न करने की बात ही परमाणु युद्घ न छिडऩे के लिए पर्याप्त नहीं है। परंतु इन सब बातों के बावजूद यही एकमात्र उपाय है जिसकी सहायता से चाही या अनचाही परमाणु त्रासदी को रोका जा सकता है।

भारत संभवत: एकमात्र ऐसा परमाणु क्षमता संपन्न देश है जो इस दिशा में पहल को आगे बढ़ा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत स्वयं पहले परमाणु हथियार न इस्तेमाल करने की नीति का समर्थक है। अगर इसे लेकर हमारी प्रतिबद्घता कमजोर पड़ती है तो विश्व स्तर पर इसका अगुआ बनने की हमारी क्षमता पर भी नकारात्मक असर होगा। यही वजह है कि पिछले दिनों मैंने हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित कुणाल सिंह के लेख को बहुत सावधानीपूर्वक पढ़ा। अत्यंत तार्किक ढंग से लिखे गए उस लेख में देश के पहले हथियार इस्तेमाल न करने के सिद्घांत को लेकर नए ढंग से बातें कही गई थीं।

सिंह देश के पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने की नीति की समीक्षा की तीन वजह बताते हैं। पहली, भारत को चीन की बढ़ती श्रेष्ठता से निपटने के लिए परमाणु हथियारों पर भरोसा करना होगा। दूसरा, पाकिस्तान द्वारा परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने के बाद भारत के लिए यह जरूरी है कि वह उनका इस्तेमाल रोकने के लिए अपनी ताकत का प्रदर्शन करे। तीसरा, भारत के पास तकनीकी पहुंच है जो उसके लिए हमलावर रुख को आसान बनाती है। 15 साल पहले हालात ऐसे नहीं थे जबकि यह सिद्घांत उस समय गढ़ा गया था।

जरा इनमें से हर दलील का परीक्षण करते हैं। पहली बात, चीन की पारंपरिक सैन्य बढ़त हकीकत है लेकिन इसका मुकाबला बिना परमाणु सिद्घांत को बदले भी किया जा सकता है। ऐसा भी नहीं है कि चीन की सारी सेना और उसकी सारी सैन्य शक्ति हमारे खिलाफ होगी क्योंकि उसके कई अन्य मजबूत शत्रु भी हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि हमें चीन के शत्रुओं के साथ तालमेल बनाकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह तमाम अन्य जगहों पर भी जूझता रहे। इसका एक अर्थ यह भी है कि हमें अपनी सेना के आधुनिकीकरण के काम को गंभीरता से लेना होगा। निष्क्रिय खरीद तंत्र को ठीक करना और बढ़ते राजकोषीय व्यय को कम करना हमारी शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए।

मेरे नजरिये में हम चीन की सैन्य तैयारियों से ऐसे तरीके से भी निपट सकते हैं।  इसके अलावा अगर मैं थोड़ी छूट लूं तो कह सकता हूं कि चीन के रणनीतिकार हमारी पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने की घोषणा पर यकीन ही नहीं करते। इससे पहले परमाणु सिद्घांत को लेकर एक स्तंभ में मैंने कहा था कि पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने की किसी पक्ष की घोषणा का यह अर्थ नहीं है कि उसका प्रतिद्वंद्वी भी चौंकाने वाला ऐसा हमला नहीं करेगा। किसी परमाणु हमले की स्थिति में जिस देश को यह हमला झेलना पड़ेगा उसे अभूतपूर्व नुकसान होगा। शायद यही वह डर है जो किसी देश को इन हथियारों का पहले इस्तेमाल करने से रोक सकता है। परमाणु प्रतिरोध का सार तत्त्व यही है।

दूसरी बात, क्या हमें पाकिस्तान की परमाणु हथियार इस्तेमाल में लाने की तैयारी की बहुप्रचारित बात का जवाब पहले हमले की तैयारी के साथ करना चाहिए? यह मानने की कोई वजह नहीं है कि पाकिस्तान का सैन्य-जिहादी गठजोड़ भारत की ऐसी किसी पहल के बाद सीमा पार आतंकवाद का इस्तेमाल करने से दूरी बनाएगा।  बल्कि अगर ऐसा हुआ तो आतंकवाद कहीं अधिक उपयोगी साबित होगा। अगर आतंकवादी हमले और परमाणु हमले के बीच का अंतराल कम होता है तो पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के लिए हमें ब्लैकमेल करना कहीं अधिक आसान हो जाएगा और यह बाकी दुनिया के लिए भी परेशान करने वाली बात होगी। ऐसी कोई परिस्थिति तैयार करने से बेहतर होगा कि हम अपनी मौजूदा स्थिति पर ही टिके रहें: यानी परमाणु हमले का व्यापक प्रतिरोध किया जाएगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पाकिस्तान अपने हथियारों को सामरिक कहता है या युद्घक, वह अगर उन्हें हमारे क्षेत्र में या हमारी सेना के खिलाफ इस्तेमाल करता है तो उसे इसका भीषण प्रतिरोध का सामना करना होगा।

तीसरी बात, नई तकनीक की उपलब्धता और देश के हथियार जखीरे का आधुनिकीकरण होने से सिद्घांत में बदलाव की कोई आवश्यकता उत्पन्न नहीं होती। पहले इस्तेमाल के हिमायतियों को यह पता है कि पहले इस्तेमाल करने की क्या लागत आ सकती है। उसके लिए कमांड और नियंत्रण का बुनियादी ढांचा विकसित करने और उसका प्रबंधन करने में काफी धन राशि की आवश्यकता हो सकती है। परंतु अभी भी इस बात को लेकर कुछ ही लोग चिंतित हैं कि इससे हथियारों की होड़ उत्पन्न होगी।

इस बीच राष्ट्रीय सुरक्षा बल्कि धरती की सुरक्षा को भी आनुपातिक रूप से जोखिम होगा। शीतयुद्घ के दौरान की अमेरिकी और सोवियत परमाणु नीति हमें यह चेतावनी देने के लिए पर्याप्त है कि आगे चलकर हम ऐसी परिस्थिति में पहुंच जाएंगे जहां परमाणु हथियार तो प्रचुर मात्रा में होंगे जबकि सुरक्षा कम से कमतर होती जाएगी। इसमें दो राय नहीं कि देश की सरकार को अपनी परमाणु हथियार नीति की नियमित और आधिकारिक समीक्षा करनी चाहिए। पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने की नीति को जारी रखने या उसे खारिज करने को लेकर अकादमिक बहस होती रहनी चाहिए। ऐसा करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। फिलहाल किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत यह बात काफी हद तक देश के हित में है कि हम ऐसी कूटनीति में निवेश करें जहां परमाणु हथियारों की प्रमुखता कम से कमतर होती जाए।

 

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