हिंदी बनाम अंग्रेजी

स्रोत: द्वारा ज्योति सिडाना: जनसत्ता

ब्रितानी शासन के दौरान लार्ड मैकाले ने 1835 में जारी भारतीय शिक्षा के घोषणापत्र के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया था कि पश्चिमी शिक्षण पद्धति भारतीय शिक्षण पद्धति से श्रेष्ठ है। इसलिए उन्होंने इसे भारत में लागू करने का प्रस्ताव रखा। इस घोषणापत्र ने न केवल अंग्रेजी को उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू किया, बल्कि अंग्रेजी भाषी अभिजन और हिंदी माध्यम टाइप लोगों के बीच विभाजन भी कर दिया, परिणामस्वरूप उनमें क्रमश: श्रेष्ठता और हीनता की भावना घर कर गई। तब से यह सिलसिला अनवरत जारी है।

हाल ही में एक सर्वे के अनुसार सिविल सेवा परीक्षा में पिछले कुछ सालों से हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जबकि अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों के प्रतिशत में वृद्धि देखी जा सकती है। 2013 में हिंदी माध्यम से सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले 17 प्रतिशत थे, जबकि 2014 में यह संख्या 2.11 प्रतिशत, 2015 में 4.28 प्रतिशत, 2016 में 3.45 प्रतिशत और 2017 में 4.06 प्रतिशत रही थी। पिछले साल यानी 2018 में चयनित उम्मीदवारों की संख्या मात्र 2.16 प्रतिशत है।

ये आंकड़े हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को हाशिए पर धकेलते नजर आते हैं। इस पर व्यापक चिंतन की आवश्यकता है और यह चिंतन अनेक कारणों की तरफ इशारा करता है। पहला, कहीं यह हिंदी भाषा या क्षेत्रीय भाषा के प्रति पूर्वाग्रह का तो परिणाम नहीं है, और अगर ऐसा है तो यह क्षेत्रवाद और भाषावाद की समस्याओं के उभार का संकेत है, जो काफी खतरनाक है। दूसरा, हिंदी क्षेत्र की शिक्षा प्रणाली ऐसी हो गई है कि विद्यार्थी परीक्षा में पास नहीं हो पा रहे हैं।

ऐसा देखा जाता है कि अंग्रेजी माध्यम के बच्चे बहुत स्पष्टवादी होते हैं, वे परीक्षा में अंक पर अधिक ध्यान देते हैं, उन्हें उच्च शिक्षा में और बाहरी दुनिया में तुलनात्मक रूप से प्रदर्शन का अधिक व ज्यादा बेहतर मौका मिलता है। आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि 2016 में 377 में से 280, 2017 में 369 में से 287 और 2018 में 370 में से 280 विद्यार्थी विज्ञान विषय (इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, मेडिसिन, फार्मेसी और शुद्ध विज्ञान से थे) से थे।

समाज विज्ञान या मानविकी से 55 और बाकी 35 प्रबंधन व वाणिज्य विषय से थे। तीसरा, जैसा कि इन आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सिविल सेवा परीक्षा में विज्ञान और टेक्नोलॉजी के विद्यार्थी ज्यादा आ रहे हैं और क्योंकि इन विषयों का माध्यम अंग्रेजी होता है, संभवत: इसलिए प्रतियोगी परीक्षा में भी अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। लेकिन समाज विज्ञान और साहित्य जैसे विषय हाशिए पर जा रहे हैं अथवा जानबूझ कर उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है, क्योंकि समाज विज्ञान के विद्यार्थी के दिमाग में कहीं न कहीं विचार और आलोचना का पक्ष जिंदा रहता है, जबकि विज्ञान-तकनीकी के विद्यार्थी ऐसा नहीं कर पाते, वे समाज और व्यवस्था को भी उस रूप में नहीं समझते जो कि समाज विज्ञान का विद्यार्थी समझ सकता है।

समाज या व्यवस्था के साथ उनका न कोई जुड़ाव होता है और न वे कोई विरोध करते हैं और राज्य को भी ऐसे ही नौकरशाह चाहिए जो व्यवस्था का विरोध न करें, बल्कि उसके हर फैसले में उसके साथ खड़े रहें। संभवत: यह भी एक कारण हो सकता है समाज विज्ञान और मानविकी के विषयों को हाशिए पर रखने का। चौथा, प्रतियोगी परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने वाले शिक्षकों में तो भाषा के माध्यम के प्रति पूर्वाग्रह नहीं है कि वे अंग्रेजी माध्यम की कॉपी को ज्यादा अच्छा या उच्च स्तरीय मानते हों और उन्हें अधिक अंक देते हों, जबकि हिंदी / क्षेत्रीय भाषा को कम आंकते हों। यहां एक सवाल मन में उठता है कि जो हिंदी भाषी या क्षेत्रीय भाषी नहीं हैं तो वे किस तरह नौकरशाह बन कर वहां की समस्याओं को समझ पाएंगे, क्योंकि नौकरशाह तो जनता और प्रशासन / राज्य के बीच मध्यस्थ की भूमिका का निर्वाह करता है। भारत जैसे बहु-भाषी राष्ट्र में जहां अधिकांश नागरिक हिंदी या क्षेत्रीय भाषा को अपनी संचार भाषा के रूप में प्रयुक्त करते हैं, वहां बिना इन भाषाओं को समझे समस्याओं का समाधान करना या विकास कार्य करना कैसे संभव है?

पांचवां, अंग्रेजी भाषा के अधिकांश राष्ट्रीय समाचार पत्र तो लोगों तक पहुच रहे हैं, लेकिन हिंदी भाषा के राष्ट्रीय समाचार पत्र कितना पहुंच रहे हैं और वे लोगों की समझ और सामान्य ज्ञान को विकसित करने में कितनी भूमिका निभा रहे हैं, यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। समाचार पत्र सभी प्रतियोगी परीक्षाओं का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं, लेकिन इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले विद्यार्थी अधिकांशत: अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़ते हैं या पढ़ने के लिए बाध्य होते हैं। हिंदी के पत्रों में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मुद्दे तुलनात्मक रूप से कम शामिल होते हैं, उनमें सूचनाएं तो मिल जाती हैं पर विश्लेषणात्मक एवं उच्च स्तरीय लेखों का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसी तरह अधिकांश उच्च स्तरीय प्रतियोगी पत्रिकाएं भी अंग्रेजी में ही उपलब्ध होती हैं। वे हिंदी के खबर चैनल नहीं देखते, बल्कि अंग्रेजी के देखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि वहां विस्तृत विश्लेषण होता है, तार्किक बहस होती है और बकवास कम दिखाई जाती है। इन सब पक्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा व्यवस्था में और प्रतियोगी परीक्षा में भाषा की भूमिका और भाषा के परिणाम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उस समय मैकाले ने अंग्रेजी भाषा के पक्ष में तर्क देते हुए कहा था कि इसका मकसद भारतीयों की ऐसी पीढ़ी तैयार करना है जो खून और रंग से भारतीय हो, लेकिन पसंद, आचार-विचार, बुद्धिमत्ता और राय से अंग्रेज हो। तो क्या आज स्वतंत्र भारत में भी हम ऐसी ही पीढ़ी तैयार करने के इच्छुक हैं जो बंधुआ-मस्तिष्क रखती हो, जिसे सिर्फ फैसलों और आदेशों का पालन करना और करवाना है। सवाल है कि यह कैसे तय होता है कि हिंदी या क्षेत्रीय भाषा का विद्यार्थी ज्ञानी, योग्य या कुशल नहीं हो सकता? क्या समाज विज्ञान और मानविकी विषयों की उपेक्षा समाज, संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था के विभिन्न पक्षों की भी उपेक्षा को नहीं दर्शाती? टेक्नोलॉजी यानी एंड्रायड फोन और कंप्यूटर में तो हिंदी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को स्थान मिलने लगा है, क्योंकि ऐसा करने से उनका बाजार विस्तृत हुआ है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था या प्रतियोगी परीक्षा में इनकी उपेक्षा हमारे समक्ष अनेक सवाल खड़े करती है। दूसरी सभी भाषाओं की तरह अंग्रेजी भाषा भी एक संपर्क भाषा है तो अन्य भाषाओं के साथ इसकी तुलना या उनके बीच श्रेष्ठता व हीनता के सवाल खड़े करना कहां तक उचित है।

किसी भी भाषा का व्यक्ति समान रूप से ज्ञान, कुशलता, दक्षता और अच्छे व्यक्तित्व का धनी हो सकता है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। अंग्रेजी या पश्चिमी भाषाओं का भी ज्ञान होना जरूरी है, ताकि हम वैश्विक ज्ञान प्राप्त कर सकें और उसका अपने जीवन में उपयोग कर सकें। पर भाषा के नाम पर लोगों को बांटना या उनमें श्रेष्ठता-निम्नता पैदा करना केवल भाषावाद या क्षेत्रवाद को ही बढ़ावा देगा। भाषा चेतना का प्रतीक होती है, इसलिए जितनी भाषाए सीखेंगे, उतना ही ज्यादा चेतना का विस्तार होगा। इसलिए विद्यार्थियों को बहुभाषायी ज्ञान होना चाहिए। लेकिन भाषा को राष्ट्रवाद का पर्याय नहीं बनाया जा सकता, अन्यथा यह सामाजिक विभाजन उत्पन्न करेगी।

 

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