सोना उगलता ई-कचरा

स्रोत: द्वारा प्रमोद भार्गव: जनसत्ता

दुनियाभर में वस्तुओं के ‘उपयोग करो और फेंको’ कचरा संस्कृति के विरुद्ध शंखनाद हो गया है। दरअसल पूरी दुनिया में इलैक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा) बड़ी एवं घातक समस्या के रूप में पेश आ रहा है। पृथ्वी, जल और वायु के लिए यह कचरा प्रदूषण का बड़ा सबब बन गया है। इससे निजात के लिए यूरोपीय संघ और अमेरिका के पर्यावरण संगठनों ने इलैक्ट्रॉनिक उपकरण और उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की मनमानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वे ‘राइट टू रिपेयर’ यानी मरम्मत करने के अधिकार की मांग कर रहे हैं। कालांतर में यह मांग भारत सहित पूरी दुनिया में फैलने की उम्मीद है। भारत को तो विकसित देशों ने ई-कचरा नष्ट करने का डंपिंग ग्राउंड माना हुआ है। इस कचरे को नष्ट करने के जैविक उपाय भी तलाशे जा रहे हैं, लेकिन इसमें अभी बड़ी सफलता नहीं मिली है।

अमेरिका एवं यूरोप के कई देशों के पर्यावरण मंत्री विनिर्माण कंपनियों को इस मकसद के प्रस्ताव भेज चुके हैं कि उपकरणों के निर्माता ऐसे इलैक्ट्रॉनिक उपकरण बनाएं, जो लंबे समय तक चलें और खराब होने पर उनकी मरम्मत की जा सके। भारत में भी कई गैर-सरकारी स्वयंसेवी संगठनों ने इस आवाज में अपनी आवाज मिलाना शुरू कर दी है। दरअसल, दुनिया के विकसित देश अपना ज्यादातर कचरा भारतीय समुद्र में खराब हो चुके जहाजों में लाद कर बंदरगाहों के निकट छोड़ जाते हैं। इससे भारतीय तटवर्ती समुद्रों में कचरे का अंबार लग गया है। इस ई-कचरे में कंप्यूटर, टीवी, स्क्रीन, स्मार्टफोन, टैबलेट, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, इंडेक्शन कुकर, एसी और बैटरियों जैसे उत्पाद और उपकरण ज्यादा होते हैं।

इस अभियान के बाद अमेरिका में अठारह राज्य मरम्मत के अधिकार (राइट टू रिपेयर) का कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं। एक शोध के मुताबिक 2004 में घरेलू कामकाज की साढ़े तीन फीसद इलैक्ट्रॉनिक मशीनें पांच साल बाद खराब हो रही थीं। 2012 में इस खराबी का अनुपात बढ़ कर 8.3 फीसद हो गया। पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) केंद्रों पर दस फीसद से ज्यादा ऐसे उपकरण आए, जो पांच साल से पहले ही खराब हो गए। यूरोप में बिकने वाले कई लैंपों में बल्ब बदलने का विकल्प नहीं है। नतीजतन बल्ब खराब होने पर पूरा लैंप बदलना पड़ता है। कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल के निरंतर नए-नए मॉडल आने और उनमें नई सुविधाएं उपलब्ध होने से भी ये उपकरण अच्छी हालत में होने के बावजूद उपयोग के लायक नहीं रह जाते। लिहाजा ई-कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2018 में दुनियाभर में पांच करोड़ टन ई-कचरा इकट्ठा हुआ। इस कचरे को एक जगह जमा किया जाए तो माउंट ऐवरेस्ट से भी ऊंचा पर्वत बन जाएगा या साढ़े चार हजार एफिल टावर बन जाएंगे।

ई-कचरा पैदा करने में भारत दुनिया का पांचवां बड़ा देश है। भारतीय शहरों में पैदा होने वाले ई-कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर और उसके सहायक यंत्र होते हैं। ऐसे कचरे में चालीस फीसद सीसा और सत्तर फीसद भारी धातुएं होती हैं। कई लोग इन्हें निकाल कर आजीविका भी चला रहे हैं। आज ई-कचरा, जिसमें बड़ी मात्रा में प्लास्टिक के उपकरण भी शामिल हैं, नष्ट करना भारत समेत दुनिया के देशों के लिए मुश्किल हो रहा है। इस ई-कचरे या ई-वेस्ट को जैविक रूप से नष्ट करने के उपाय तलाशे जा रहे हैं। इस कचरे का दूसरा सकारात्मक पहलू सोना व अन्य उपयोगी धातुएं उगलना भी है।

ई-कचरे से ढाई अरब रुपए से ज्यादा का सोना हाल ही में निकाला गया है। दुनिया की सबसे बड़ी स्मार्टफोन निर्माता कंपनी ने अपने ही कबाड़ में बदले स्मार्टफोन और कंप्यूटरों से सोने का खजाना ढूंढ़ निकाला है। कंपनी ने इस बेकार हो चुके कचरे को पुनर्चक्रित करके बड़ी कमाई करने में सफलता हासिल की है। इस काम से कंपनी ने करीब दो सौ चौंसठ करोड़ रुपए सोने के रूप में तो कमाए ही, साथ ही करीब छह अरब रुपए का इस्पात, एल्युमीनियम, ग्लास और अन्य धात्विक तत्व निकालने में कामयाबी हासिल की है। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी का ऐसा प्रयास हमारी केंद्र व राज्य सरकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनना चाहिए कि युवाओं को ई-कचरे से सोना एवं अन्य धातुएं निकालने की तकनीक सिखाएं और स्टार्टअप के तहत इस कचरे को पुनर्चक्रित करने के संयंत्र लगाने के लिए प्रोत्साहित करें।

इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन और उनके नष्ट होने की प्रक्रिया निररंतर चलने वाली है। अगर ऐसे संयंत्र देश के कोने-कोने में लग जाते हैं तो इनके संचालन में कठिनाई आने वाली नहीं है। अब गांव-गांव में स्मार्टफोन और कंप्यूटर उपयोग में लाए जा रहे हैं। इसलिए बेकार हो चुके उपकरणों के रूप में कच्चा माल भी स्थानीय स्तर पर ही मिल सकता है और पुनर्चक्रण के बाद जो सोना-चांदी, इस्पात, जस्ता ,तांबा, पीतल, एल्युमीनियम आदि धातुएं निकलेंगी उनके खरीददार भी स्थानीय स्तर पर ही मिल जाएंगे। इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों के विशेषज्ञों का मानना है कि औसतन एक स्मार्टफोन में तीस मिली ग्राम सोना होता है। यह फोन के सर्किट बोर्ड और अंदरूनी कलपुर्जों में होता है। ऐसे में समस्या बन रहा ई-कचरा युवाओं के लिए रोजगार के नए दरवाजे खोल सकता है। इसलिए इस कचरे को एक रोजगार उपलब्ध कराने वाले संसाधन के रूप में देखने की जरूरत है।

औसतन एक टन ई-कचरे के टुकड़े करके उसे यांत्रिक तरीके से पुनर्चक्रित किया जाए तो लगभग चालीस किलो धूल या राख जैसा पदार्थ तैयार होता है। इसमें अनेक कीमती धातुएं समाहित रहती हैं। इन धातुओं के पृथक्करण की प्रक्रिया में हाथों से छंटाई, चुंबक के प्रयोग से विलगीकरण, विद्युत-विच्छेदन, सेंट्रीफ्यूजन और उलट ऑस्मोसिस जैसी तकनीकें शामिल हैं। लेकिन ये तरीके मानव शरीर और पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले हैं, इसलिए इसके लिए बायो-हाइड्रो मैटेलर्जिकल तकनीक कहीं ज्यादा बेहतर है। इसके लिए ई-कचरे को बारीक पीस कर उसे जीवाणुओं के साथ रखा जाता है। बैक्टीरिया में मौजूद एंजाइम कचरे में उपस्थित धातुओं को ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं कि उनमें गातिशीलता पैदा हो जाती है। बायो-लीचिंग नाम की इस विधि में जीवाणु कुछ विषेश धातुओं को अलग करने में मदद करते हैं।

यदि ई-कचरे को पेड़ की छाल की तरह छीलन में बदल कर पांच-दस ग्राम प्रति लीटर की सांद्रता में घोल कर बैक्टीरिया थोयोबेसिलस, थायोऑक्सीडेंस और थायोबेसिलस फेरोऑक्सीडेंस के साथ रखा जाए तो कुछ तांबा, जस्ता, निकल और एल्युमीनियम नब्बे फीसद से अधिक निकाले जा सकते हैं। इसी प्रकार से एस्पराजिलस नाइजर और पेनिसिलियम सिंप्लिसिसिमम नामक फफूंदों की मदद से पैंसठ फीसद तक तांबा और टिन अलग किए जा सकते हैं। इसके अलावा कचरे के छीलन की सांद्रता सौ ग्राम प्रति लीटर रखी जाए तो एल्युमीनियम, निकल, सीसा और जस्ते में से भी पनच्यानवे फीसद धातु को अलग किया जा सकता है।

ये सभी धातुएं ऐसी हैं, जिन्हें उद्योग आसानी से खरीद सकते हैं। पुनर्चक्रित प्रक्रिया के लिए भौतिक-रासायनिक और ऊष्मा आधारित तकनीकें भी उपलब्ध हैं, किंतु जैविक तकनीक की तुलना में इनकी सफलता कम आंकी गई है। हालांकि भारत में ई-कचरे के पुनर्चक्रण के संयंत्र दिल्ली, मेरठ, बंगलुरु, मुंबई, चेन्नई और फिरोजाबाद में लगे हुए हैं। लेकिन जिस अनुपात में ई-कचरा पर्यावरणीय संकट बना हुआ है, उस अनुपात में ये संयंत्र ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। इसलिए ई-कचरे के पुनर्चक्रण संयंत्र लगाने की जबावदेही ई-कचरा उत्पादन कंपनियों को भी सौंपने की जरूरत है। यदि पुनर्चक्रण के ये संयंत्र बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं तो ई-कचरे का निपटारा तो होगा ही, साथ ही पृथ्वी, जल और वायु प्रदूषण मुक्त रहेंगे।

 

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