कोख के धंधे पर लगाम

स्रोत: द्वारा सुधीर कुमार: जनसत्ता

लोकसभा ने सरोगेसी नियमन विधेयक-2016 को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक में देश में सरोगेसी के नियमों को तय करने, व्यावसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह पाबंदी लगाने और सरोगेट माताओं के शोषण को रोकने के साथ-साथ उनके हितों की रक्षा करने संबंधी अनेक प्रावधान किए गए हैं। फिलहाल जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे देशों में व्यावसायिक सरोगेसी पूरी तरह प्रतिबंधित है। कृत्रिम रूप से संतान-जनन की सरोगेसी तकनीक आधुनिक विज्ञान की विशिष्ट खोज है। यह तकनीक उन दंपतियों के लिए आशा की अंतिम किरण साबित हुई है, जिन्हें किसी कारणवश जीवन में संतान सुख प्राप्त नहीं हो पाता है।

सरोगेसी का सामान्य अर्थ ‘किराए की कोख’ से है। यह सरोगेट बच्चे की इच्छा रखने वाले दंपति और एक महिला (सरोगेट मदर) के बीच एक तरह का समझौता है जिसमें महिला अपनी कोख किराए पर देने के लिए राजी होती है। इस प्रक्रिया में सरोगेसी क्लिनिक मध्यस्थता की भूमिका निभाते हैं। सरोगेसी विधि आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक पर आधारित होती है। इसके तहत सरोगेसी अपनाने वाले पुरुष के शुक्राणु और महिला के अंडाणु का कृत्रिम तरीके से निषेचन कराया जाता है और फिर निषेचित अंडे को ‘सरोगेट मदर’ के गर्भाशय में रख दिया जाता है। इस तरह शिशु का जन्म वास्तविक माता से इतर एक अन्य महिला की कोख से होता है।

भारत में सरोगेसी का प्रचलन 2002 से है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे पहली बार 2008 में कानूनी मान्यता दी थी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि केवल डेढ़ दशक में भारत अंतरराष्ट्रीय जगत में सरोगेसी का बड़ा केंद्र बन गया। सरकार के मुताबिक देश में सरोगेसी का सलाना कारोबार लगभग दो अरब डॉलर का है। देश में गुजरात और महाराष्ट्र सरोगेसी के मामले में शीर्ष दो राज्य हैं। भारत में सरोगेसी तकनीक का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भारत में होने वाली सरोगेसी का लगभग आधा हिस्सा विदेशी दंपतियों का होता है।

भारत में सरोगेसी तकनीक दुनिया के अन्य देशों की तुलना में पांच से दस गुना तक सस्ती है और यहां अच्छे डॉक्टरों से लैस विश्वस्तर के आइवीएफ केंद्र भी हैं। वहीं, देश में गर्भ धारण करने के लिए कमजोर वर्ग की असहाय महिलाएं भी आसानी से उपलब्ध हैं और यहां इस संबंध में कठोर कानून के न होने की वजह से सरोगेसी के प्रति विदेशियों में गजब का आकर्षण बना हुआ है। विदेशी भारत में सरोगेसी को चिकित्सा पर्यटन के तौर पर देखते रहे हैं। लेकिन अन्य देशों की तरह अब यहां भी विदेशियों के लिए सरोगेसी अपनाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनने की तैयारी है। इससे भारत को सरोगेसी का हब बनने से रोका जा सकेगा और सरोगेट माताओं के शोषण पर भी रोक लग सकेगी।

सरोगेसी नियमन विधेयक-2016 के कानून बन जाने के बाद देश में किसी महिला को व्यावसायिक उद्देश्य से सरोगेट मदर बनने का कानूनी अधिकार नहीं होगा। हां, महिलाएं किसी जरूरतमंद विवाहित निसंतान दंपति के लिए परोपकार के तहत कोख किराए पर दे सकती हैं। नए प्रस्तावित कानून के मुताबिक सरोगेसी धारण करने वाली महिलाएं जीवन में एक ही बार ऐसे गर्भ धारण कर सकती हैं। अत्यधिक लाभ की आशा में यह गर्भ धारण पहले चार से पांच बार तक किया जाता था, जिससे महिलाएं शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती थीं। लेकिन अब एक महिला अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बार ऐसे गर्भ को धारण कर सकती है। सिर्फ यही नहीं, सरोगेट महिला बनने के लिए उसका विवाहित होना और एक स्वस्थ्य बच्चे की मां होना भी जरूरी होगा। वहीं, सरोगेसी का लाभ उठाने वाले दंपति की शादी को पांच वर्ष होना जरूरी है।

अर्थात सरोगेसी अपनाने वाले दंपति में से महिला की उम्र तेईस से पचास साल के बीच होनी चाहिए, जबकि पुरुषों के लिए यह आयु छब्बीस से पचपन वर्ष रखी गई है। सरोगेसी का लाभ वही दंपति उठा सकते हैं, जिन्हें पहले से कोई संतान नहीं हो और एक दंपति को केवल एक सरोगेट बच्चे को रखने का अधिकार होगा। ऐसे दंपति के पास जिला मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र होना जरूरी है, जिससे यह स्पष्ट हो जाए कि दंपति में से कोई एक बच्चा पैदा करने में असमर्थ है। सरोगेसी से जुड़े नियमों के उल्लंघन के लिए दस वर्ष की सजा और दस लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। यह सजा अपंग बच्चों को जन्म के बाद उसे अपनाने से इंकार करने वालों और अंडाणु या शुक्राणु के गैर-कानूनी रूप से वितरण या विक्रय करने वालों के लिए भी निर्धारित की गई है।

इसके साथ ही, वे दंपति जो केवल शौक के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, उन पर भी रोक लगाई जानी है। अब केवल निसंतान दंपति इस तकनीक का लाभ प्राप्तकर सकेंगे। एकल अभिभावक, लिव इन रिलेशनशिप और समलैंगिक जोड़े भी इस सुविधा से वंचित रहेंगे। प्रस्तावित कानून की एक खास बात यह भी है कि भारत में सरोगेसी लाभ से विदेशियों को पूरी तरह अलग कर दिया जाएगा। कानून बनने के तीन महीने के भीतर सरोगेसी नियमन के लिए स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में एक बोर्ड का गठन किया जाएगा। बोर्ड क्लीनिक का निरीक्षण भी करेगा। इस तरह क्लीनिक की मनमानी और सरोगेट माताओं के शोषण पर भी रोक लगाई जा सकेगी।

सरोगेसी तकनीक का एक स्याह पक्ष यह भी रहा है कि इससे कोख बेचने वाली महिलाओं को शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विडंबना है कि अपनी कोख बेच कर दूसरों को संतान सुख देने वाली महिलाओं को इसके एवज में उचित पैसा भी नहीं दिया जाता। चूंकि, ऐसी अधिकांश महिलाएं निम्न आय-वर्ग से ही संबंधित होती हैं, इसलिए भी वे आर्थिक व शारीरिक शोषण की शिकार होती हैं। उदाहरण के तौर पर क्लिनिक से संबद्ध डॉक्टर और बिचौलिए सरोगेसी विधि अपनाने वाले दंपतियों से अच्छी-खासी रकम तो वसूल लेते हैं, लेकिन तमाम कष्ट सह कर बच्चे को जन्म देने वाली औरतों को कम कीमत पर ही राजी कर लेते हैं। सरोगेट माताओं को नौ महीने क्लिनिक से संबद्ध किसी हॉस्टल में अपने परिजन से दूर रहना पड़ता है। कई बार सरोगेट महिलाएं पेट में पल रहे बच्चे से भावनात्मक रूप से जुड़ जाती हैं, जिससे बच्चे के जन्म के बाद के दिनों में वे अकेलापन महसूस करती हैं।

सरोगेसी तकनीक वर्तमान युग की आवश्यकता है। बदलती जीवनशैली और भाग-दौड़ भरी जिंदगी लोगों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रही हैं। कभी-कभी अन्य कारणों से भी कुछ महिलाएं संतान सुख से वंचित रह जाती हैं। शहरों में लोगों को इस तकनीक के बारे में आवश्यक जानकारी तो है, लेकिन शिक्षा, जागरूकता और पैसे के अभाव के कारण इसकी पहुंच हमारे गांवों तक नहीं हो पाई है। आलम यह है कि मां न बन पाने की स्थिति में गांवों में स्त्रियों को ‘अपशकुन’ की संज्ञा दी जाती है एवं मानसिक रूप से उन्हें प्रताड़ित भी किया जाता है। अत: सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा संतान-जनन की इस नवीन प्रणाली की खूबियों को गांवों में जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है। देश की बहुसंख्य आबादी को कम खर्च पर इस सुविधा का लाभ दिलाने के लिए अगर सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर व निजी अस्पतालों के द्वारा एक छोटी-सी भी पहल की जाती है तो इससे लाखों वंचित महिलाएं संतान सुख को प्राप्त कर पाएंगी और उनका दांपत्य व पारिवारिक जीवन खुशहाल हो पाएगा।

 

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