उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार की दरकार

स्रोत: द्वारा नितिन पई: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

पिछले 25 वर्षों से मैं प्रवेश परीक्षाओं को नजरअंदाज करता रहा हूं  लेकिन हाल ही में मेरा इनसे सामना हो ही गया। मेरे सहयोगियों ने चीन की वार्षिक राष्ट्रीय कॉलेज प्रवेश परीक्षा 'गावकाव' के कुछ सवाल दिखाए थे। अब मैं गावकाव और उसकी खामियों पर हो रही बहस से परिचित भी हो चुका हूं। इस परीक्षा का मकसद प्रतिभावान छात्रों का चयन करना होता है। हालांकि जब मैंने इस प्रवेश परीक्षा के सवालों को देखा तो मैं उनके लिए तैयार नहीं था।

कुछ दिनों पहले प्रकाशित रिपोर्ट 'क्या दुनिया की सबसे कठिन परीक्षा है गावकाव' में कई उदाहरण दिए गए थे। एक उदाहरण आपके सामने रख रहा हूं: 'जून और अगस्त के बीच एक क्रूज जहाज फुच्यान प्रांत से मुंबई होते हुए वेनिस के लिए रवाना होता है। शी चिनफिंग की 21वीं सदी के लिए तैयार समुद्री रेशम मार्ग रणनीति के अंग के तौर पर उसे यह यात्रा करनी है। सफर के दौरान उसे किस तरह के अनुभव होंगे?' एक और उदाहरण कुछ यूं है: 'थॉमस एडिसन अगर 21वीं सदी में लौटकर आते हैं तो मोबाइल फोन देखने के बाद उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी?'

इसी तरह गणित के प्रश्न-पत्र में मैंने बुनियादी अंकगणित पर आधारित एक सवाल देखा था लेकिन उसे हल करने के लिए छात्र को अनुकूल मानसिक नजरिये का भी इस्तेमाल करना होगा। इस परीक्षा में छात्रों को चीनी भाषा और गणित के अलावा एक विदेशी भाषा (अंग्रेजी, रूसी, जापानी या फ्रेंच) और विज्ञान या मानविकी लेना अनिवार्य होता है। परीक्षा में पूछे गए कई सवालों को हल करने के लिए तर्कशक्ति एवं उसके अनुप्रयोग की जरूरत होती है, केवल पाठ्यक्रम के दोहराव से बात नहीं बनेगी।

अब जरा इस पर गौर कीजिए। चीन में हरेक छात्र को किसी भी तरह के कॉलेज में प्रवेश लेने के लिए यह परीक्षा पास करना जरूरी होता है। केवल उत्कृष्ट या पेशेवर पाठ्यक्रम चलाने वाले कॉलेज ही नहीं, किसी भी कॉलेज में प्रवेश के लिए यह जरूरी है। यहां तक कि अब विदेशी विश्वविद्यालयों ने भी गावकाव परीक्षा में मिले अंकों के आधार पर प्रवेश देना धीरे-धीरे शुरू कर दिया है।

इसकी तुलना में भारत में होने वाली प्रवेश परीक्षाएं मुख्यत: छात्रों की स्मरण शक्ति, गति एवं तकनीकी दक्षता का परीक्षण करती हैं। हमारे बच्चे जैसे ही हाई स्कूल में पहुंचते हैं, चार साल बाद होने वाली इस प्रवेश परीक्षा के लिए उनकी तैयारी शुरू हो जाती है। इंजीनियरिंग या मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं के लिए अब तो कोचिंग कक्षाओं का सिलसिला भी जोर पकडऩे लगा है। जब मैं हाई स्कूल में था तो उस समय हम इतिहास, नागरिकशास्त्र, भूगोल एवं भाषा की कक्षाओं में किसी तरह खुद को घसीटते थे क्योंकि वे विज्ञान एवं गणित के 'महत्त्वपूर्ण' विषयों से हमारा ध्यान भटकाते थे।

इसका नतीजा वह संकुचित शिक्षा है जिसका दायरा विश्वविद्यालय स्तर पर भी व्यापक नहीं हो पाता है क्योंकि इंजीनियरिंग या मेडिकल (और कुछ हद तक लॉ) कॉलेजों में दूसरे विषयों के लिए बहुत कम झुकाव या समय होता है। विज्ञान, कला या मानविकी विषयों में व्यापक शिक्षा का विकल्प चुनने वाले छात्र प्राय: खुद को निम्न गुणवत्ता वाले कॉलेजों में पढऩे के लिए अभिशप्त पाते हैं जहां वे कम और अक्सर गलत बातें ही सीखते हैं।

इन सभी बातों का मतलब यह है कि चीन के अधिक युवाओं को बेहतर शिक्षा मिलेगी और आने वाले दशकों में वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पद्र्धा भी कर पाएंगे। इसी के साथ चीन में अंग्रेजी सीखने वाले युवाओं की तादाद बढ़ रही है (भले ही भारतीय नेता इसे नीची निगाह से देख रहे हैं) जिसका मतलब है कि महज कुछ वर्षों में ही भारत को अंग्रेजी की वजह से मिली हुई प्रतिस्पद्र्धात्मक बढ़त खत्म हो जाएगी।

हालांकि अगले दो दशकों में जनांकिकी स्तर पर हम चीन के बराबर हो जाएंगे, भारत की तुलना में चीन की बड़ी आबादी  बुजुर्ग होने लगेगी, तंग श्याओ फिंग के दौर को शी चिनफिंग पलट दें और चीजें धीमी रफ्तार से चलने लगें। लेकिन 20 साल का समय काफी लंबा होता है। यह साफ नहीं है कि भारत की केंद्रीय एवं राज्य सरकारों को हालात के तकाजे का अहसास है या नहीं। भारत में 1992 के बाद जो कुछ भी हुआ उसकी बुनियाद दशकों पहले निवेश के जरिये रख दी गई थी। अगर आईआईटी, आईआईएम, अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज और अंग्रेजी की अच्छी शिक्षा के इंतजाम नहीं होते तो भारत आईटी, बीपीओ, बायोटेक और सेवा क्षेत्रों में कामयाबी के रथ पर सवार होकर अपनी अंतरराष्ट्रीय धाक नहीं जमा पाया होता।

आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में किए गए निवेश ने ही वह चक्र चलाया जिसने भारत को तीन दशकों तक अनवरत समृद्धि का दौर दिखाया। हमें भविष्य के लिए भी इसी तरह का रणनीतिक निवेश पिछले दशक में करना चाहिए था। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया और अब भी नहीं कर रहे हैं। हमारे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय खुद को छलने वाली रट्टामार पढ़ाई, पुराने हो चुके पाठ्यक्रम, उपस्थिति की अनिवार्यता, प्रवेश पत्र और सरकारी शिक्षकों के जाल में ही उलझे हुए हैं। देश भर में नेता शिक्षा को केवल अपने वैचारिक, दलगत या उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं का भार उठाने वाले माध्यम के तौर पर ही देखते हैं। हालांकि नेताओं के अपने बच्चे अंग्रेजी माध्यम के प्रतिष्ठित स्कूलों में पढऩे के बाद विदेशी विश्वविद्यालयों में चले जाते हैं।

हमें ध्यान रखना होगा कि किसी भी देश की ताकत का आधार उसकी मानव पूंजी होती है। क्या हम वाकई में यह सोचते हैं कि हम इसी तरह चलते रहने पर भी चीन से मुकाबला कर सकते हैं? तकनीक और सेवा क्षेत्र में हम चैंपियन रहे हैं लेकिन जैसे ही चीन बुनियादी बदलाव लाने में पश्चिमी देशों से हाथ मिला लेता है तो हम इस आपूर्ति शृंखला में लगातार नीचे की ओर खिसकते जाएंगे। फुटबॉल भी हमें यही गुर सिखाता है, गेंद जिधर जा रही है उसी तरफ दौडऩा सही होता है न कि गेंद जहां मौजूद है। क्वांटम कंप्यूटिंग, संज्ञानात्मक विज्ञान और जीनोमिक्स ऐसे प्रमुख विषय हैं जो भविष्य की रूपरेखा तय करेंगे। लेकिन इन क्षेत्रों में हम अनमने ढंग से निवेश कर रहे हैं जिससे हम बहुत पीछे हैं।

चलते-चलते: वर्ष 2018 की गावकाव परीक्षा का एक सवाल: 'दूध हमेशा वर्गाकार थैलियों में मिलता है, मिनरल वाटर हमेशा गोलाकार बोतलों में रखा जाता है और शराब की गोल बोतल भी आम तौर पर वर्गाकार बॉक्स में ही रखी जाती हैं। गोल एवं वर्ग के इस गहन दर्शन पर एक निबंध लिखिए।'

 

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