शराब की बढ़ती खपत और खतरे

स्रोत: द्वारा अभिजीत मोहन: जनसत्ता

विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह रिपोर्ट चिंताजनक है कि भारत में पिछले एक दशक में शराब की खपत दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है। रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि 2005 में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 2.4 लीटर थी, जो 2016 में बढ़ कर 5.7 लीटर हो गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि अगर खपत पर रोक नहीं लगी तो 2025 तक इसमें और अधिक इजाफा होने की संभावना है। अगर खपत बढ़ी तो फिर इसके गंभीर दुष्परिणाम भी भुगतने होंगे। और ऐसा इसलिए कि रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब पीने से 2016 में दुनिया में तकरीबन तीस लाख से अधिक लोगों की मौत हुई जिनमें एक बड़ी संख्या भारत के लोगों की है। गौर करें तो शराब सेवन से होने वाली मौत का यह आंकड़ा एड्स, हिंसा और सड़क हादसों में होने वाले मौतों के आंकड़े से कहीं ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक शराब के सेवन से सैकड़ों किस्म की बीमारियां हो जाती हैं। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक संभ्रान्त और स्वस्थ समाज के विकसित होने की राह में सबसे खतरनाक बनती समस्या पर नियंत्रण लगाने की दिशा में ठोस पहल की वकालत की है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेडरोस ने कहा है कि शराब की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने और वर्ष 2010 से 2025 के बीच इस वैश्विक खपत में दस प्रतिशत की कटौती का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए, ताकि एक स्वस्थ विश्व का निर्माण किया जा सके। उनकी मानें तो अल्कोहल पर ज्यादा से ज्यादा कर लगा कर और इससे संबंधित विज्ञापनों पर पाबंदी लगा कर लोगों के जीवन बचाने की दिशा में पहल की जा सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस रिपोर्ट पर गौर करें तो मौजूदा समय में करीब तेईस करोड़ से ज्यादा पुरुष और पांच करोड़ से ज्यादा महिलाएं शराब से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इनमें ज्यादतर संख्या भारत, यूरोप और अमेरिका में रहने वाले लोगों की है। आंकड़ों पर गौर करें तो आज की तारीख में भारत शराब की खपत के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। तुलनात्मक रुप से देखें तो भारत के मुकाबले यूरोप में प्रति लीटर शराब की खपत पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा दस लीटर है। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि जहां भारत में शराब की खपत में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, वहीं यूरोप में 2010 के मुकाबले शराब की खपत में दस फीसद तक की कमी आई है।

दरअसल भारत में शराब की बढ़ती खपत का मुख्य कारण युवाओं का इसके प्रति बढ़ता आकर्षण और शराब उद्योग का तेजी से फलना-फूलना है। विडंबना यह कि एक लोक कल्याणकारी राज्य होने के बावजूद सरकारें शराब की खपत पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं है। उसका मुख्य कारण भारी पैमाने पर राजस्व की प्राप्ति है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि अत्यधिक शराब के सेवन से सेहत और स्वास्थ्य पर खतरा मंडराना शुरू हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो शराब सेवन से लिवर सिरोसिस और कैंसर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों की मानें तो ज्यादा शराब पीने वाले लोगों में टीबी, एचआइवी और निमोनिया जैसी बीमारियों के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा ज्यादा मात्रा में नियमित सेवन से दिमाग को भी नुकसान पहुंचने की संभावना प्रबल होती है।

ऐसे में अगर शराब की खपत पर लगाम नहीं लगी तो भारत जैसे विकासशील देश में रोगियों की तादाद में वृद्धि होगी और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसे बिडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर जहां सरकार लोगों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए आयुष्मान स्वास्थ्य योजना जैसी कई कार्यक्रमों के जरिए लोगों के स्वास्थ्य सुधारने के लिए प्रयासरत है, वहीं दूसरी ओर शराब की खपत कम होने के बजाए बढ़ रही है। जबकि 2006 में सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि केंद्र व राज्य सरकारें संविधान के 47 वें अनुच्छेद पर अमल कर शराब की खपत घटाएं। लेकिन देखा जा रहा है कि सरकारें इस दिशा में ठोस कदम उठाने को तैयार नहीं है। हां, कुछ राज्यों ने जरुर शराबबंदी जैसे कठोर कदम उठाए हैं लेकिन देखा जा रहा है कि लोग चोरी-छिपे शराब पीने का तरीका निकाल लेते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि अल्कोहल को नियंत्रित करने वाले कानून भारत के संविधान के सातवें कार्यक्रम में राज्य सूची में शामिल किया गया है। लिहाजा भारत में शराब से संबंधित कानूनों में कोई समानता नहीं है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिन राज्यों में शराबबंदी हैं वहां भी इसका कड़ाई से पालन नहीं हो रहा है। देश में कई राज्य सरकारें ऐसी भी हैं जो शराब की खपत घटाने के बजाय खपत बढ़ाने की नीतियों पर काम कर रही हैं। दरअसल, कुछ राज्यों में शराब की बिक्री से बीस प्रतिशत से भी अधिक राजस्व की प्राप्ति होती है। जबकि वे इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि शराब लोगों के स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है और इससे घर-परिवार तहस-नहस हो रहा है। दूसरी ओर, शराब सेवन के कारण समाज में अपराध और बलात्कार जैसी घटनाएं भी बढ़ रही हैं। एक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करे और समाज में शांति और समृद्धि का वातारण निर्मित करे। लेकिन यह तभी संभव होगा जब समाज मानसिक रुप से स्वस्थ और नशामुक्त होगा।

यह स्वीकारने में हर्ज नहीं कि पिछले कुछ दशक में केवल व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक समारोहों में शराब सेवन का प्रचलन बढ़ा है और शराब के सेवन को बुराई के तौर पर देखने की प्रवृत्ति कमजोर हुई है। अब भारतीय समाज में शराब के सेवन को आनंद और खुशी से जोड़ दिया गया है। उसका कुपरिणाम यह है कि युवा वर्ग शराब सेवन की ओर तेजी से आकर्षित हुआ है। सामाजिक संगठनों की मानें तो युवाओं में शराब पीने के खतरों के प्रति जागरूकता का बेहद अभाव है। लिहाजा शराबखोरी के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि शराब से सर्वाधिक नुकसान गरीबों का हो रहा है। क्योंकि वे अपनी कमाई का तकरीबन आधा हिस्सा शराब पर उड़ा देते हैं। इससे न केवल उनका आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि स्वास्थ्य और सेहत भी बिगड़ती है।

जिन राज्यों में शराबबंदी कानून लागू है, वहां भी स्थिति अच्छी नहीं है। संगठित गिरोहों के जरिए शराब बिक्री का धंधा फलता-फूलता है। चूंकि इन संगठित गिरोहों को राजनीतिक और स्थानीय प्रशासन का संरक्षण हासिल होता है, लिहाजा उनके विरुद्ध कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती है। उसका परिणाम यह होता है कि इन राज्यों में देशी और जहरीली शराब की बिक्री रुकती नहीं है। देखा भी जाता है कि ऐसे राज्यों में अक्सर जहरीली शराब से मरने वाले लोगों की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। चूंकि अवैध शराब की कीमत कम और नशा ज्यादा होता है इसलिए इसे पीने वालों की तादाद कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है।

इसका सेवन करने वालों में अधिकांश गरीब, मजदूर और कम पढ़े-लिखे लोग होते हैं। उन्हें पता नहीं होता है कि वे शराब गटक रहे हैं या जहर। लिहाजा सेवन करने वालों का यकृत क्षतिग्रस्त हो जाता है और उन्हें मौत के मुंह में जाने में देर नहीं लगती। उचित होगा कि देश की सभी सरकारें ऐसे जहरीली शराब की भट्ठियों और उससे जुड़े शराब माफियाओं और उन्हें संरक्षण देने वाले स्थानीय प्रशासन के नेक्सस को तोड़े और उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई करे। धीरे-धीरे ही सही शराब उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को उत्पादन क्षमता घटाने के लिए कानून बनाएं। जब तक इस तरह की ठोस पहल नहीं होगी तब तक शराब की बढ़ती खपत पर रोक लगाना संभव नहीं होगा।

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