तकनीक के विकास में हम कहां हैं

स्रोत: द्वारा विनोद वार्ष्णेय: जनसत्ता

भारत के मीडिया में विज्ञान की दिशा और दशा पर चर्चा कम होती है। उसका ध्यान सतत रूप से राजनीतिक मसलों पर रहता है, उसमें भी जोर प्रतिद्वंद्वी आरोपबाजी पर ज्यादा होता है। नतीजा यह कि आर्थिक प्रगति और सामाजिक विकास सुनिश्चित करने के लिए जितना जोर राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास पर दिया जाना चाहिए, उतना नहीं दिया जाता, और न ही जनता द्वारा उसकी मांग की जाती है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में उपलब्धियों को छोड़ दें, तो वैश्विक संदर्भ में भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकीय विकास की स्थिति धरातल पर उतनी सुदृढ़ नहीं, जितनी कि भारत जैसे बड़े देश की होनी चाहिए।

कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। मसलन, भारत विश्व में वैज्ञानिक प्रतिद्वंद्विता के नजरिये से कहां है? नोबेल पुरस्कार एक विश्व-प्रतिष्ठित विश्वसनीय पैमाना है जो आधारभूत विज्ञान में हासिल की गई उल्लेखनीय वैज्ञानिक उपलब्धियों के नजरिये से किसी देश की वैज्ञानिक ताकत बतलाता है। इस मामले में देश की उपलब्धि सबके सामने है। प्रकाश विकीर्णन (लाइट स्कैटरिंग) संबंधी खोज के लिए भौतिकीविद सर सीवी रमन को 1930 में मिले नोबेल पुरस्कार के बाद से 88 साल बीत गए, पर देश में वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाला कोई भी भारतीय वैज्ञानिक इस उपलब्धि को हासिल नहीं कर पाया।

इस बारे में सवाल उठाने पर देश के लगभग हर नामी-गिरामी वैज्ञानिक का एक ही उत्तर होता है: देश में मूलभूत अनुसंधान के लिए न उपयुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर है, न वांछित परियोजनाएं हैं, न उनके लिए धन। दूसरा तर्क होता है कि देश के सभी बड़े वैज्ञानिकों का जोर देश में अनुसंधान का आधारभूत ढांचा खड़ा करने और विज्ञान व टेक्नोलॉजी के जरिये फौरी समस्याओं के समाधान में लगा रहा। काफी हद तक दोनों बातें सही हैं। लेकिन कुछ तथ्य ऐसे हैं जो इशारा करते हैं कि वर्तमान समय में बीमारी की जड़ कुछ और ही है।

देश ने सर सीवी रमन के अलावा अभी तक केवल दो और भारतीय वैज्ञानिकों को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया है; उनमें से एकमात्र जीवित प्रो सीएन आर राव का कहना है कि चालीस-पचास साल पहले देश में पचास प्रतिशत वैज्ञानिक अनुसंधान विश्वविद्यालयों में होते थे। लेकिन धीरे-धीरे हमारे विश्वविद्यालयों में अनुसंधान के लिए धन कम होता गया है। वैसे भी देश में वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय अनुसंधान पर विश्वविद्यालयों तथा निजी और सरकारी क्षेत्र की प्रयोगशालाओं में सकल खर्च बहुत कम किया जाता है- नवीनतम आंकड़ों के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.69 प्रतिशत। वैज्ञानिक न जाने कब से मांग करते आ रहे हैं कि इसे कम से कम दो प्रतिशत तक लाया जाए लेकिन कोई भी सरकार इस दिशा में कुछ कर नहीं पाई।

सरकारी वैज्ञानिक तो अधिक धन की मांग करने की हिम्मत नहीं कर सकते, लेकिन भारतीय विज्ञान कांग्रेस जैसे प्रतिष्ठित मंच पर भी अब इसकी चर्चा से परहेज किया जाता है। फिर कोई आश्चर्य नहीं कि अनुसंधान पत्रों के नजरिये से वैश्विक विज्ञान में भारत का योगदान महज दो-तीन प्रतिशत है, जबकि चीन की हिस्सेदारी लगभग अमेरिका के बराबर, पंद्रह प्रतिशत हो गई है जो पहले भारत जितनी ही (एक प्रतिशत) हुआ करती थी। तो क्या फिर ऐसे ही बनेगा भारत विश्वगुरु? प्रोफेसर राव का कहना है कि अकेले धन की कमी की ही बात नहीं।

यह सांस्कृतिक-सामाजिक मुद्दा भी है। उनके अनुसार हमारे समाज के प्रतिष्ठा मानकों में विज्ञान और वैज्ञानिक को वह दर्जा हासिल नहीं, जो होना चाहिए। राव एक और महत्त्वपूर्ण बात अकसर अपने हर व्याख्यान में कहते हैं कि हमारे वैज्ञानिक उतनी मेहनत नहीं करते जितनी कि उन्हें करनी चाहिए। इस सबका नतीजा देश की आर्थिक स्वायत्तता पर भी पड़ रहा है। लगभग हर नए उद्योग के लिए हमें विदेशी पेटेंटेड टेक्नोलॉजी पर निर्भर करना पड़ता है। बेशक भारत रुपये की खरीद-शक्ति के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है लेकिन वैश्विक नवाचार सूचकांक (ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स) में भारत का स्थान साठवां है।

अगर हमारे देश की प्राथमिकता आधारभूत विज्ञान न होकर मौजूदा औद्योगिक जरूरतों पर केंद्रित है तो हमें कम से कम उस अनुसंधान में कामयाब होकर दिखाना चाहिए। इस क्षेत्र में कामयाबी का पैमाना पेटेंट होता है। विनिर्माण के मामले में अगर हमारी प्रतिस्पर्धा चीन से है तो यह पूछना ही होगा कि पेटेंट के मामले में हम अपने इस पड़ोसी देश की तुलना में कहां हैं? वर्ष 2016 में देश और विदेश में कार्यरत समस्त भारतीय वैज्ञानिकों या उनकी कंपनियों ने केवल 25,845 आवेदन किए। इसकी तुलना में चीन ने बारह लाख से अधिक (12,57,439) आवेदन किए। इसी साल देश में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को 1,115 तो विदेश में कार्यरत भारतीयों को 5,551 पेटेंट मिले। इसकी तुलना में चीन में रह कर अनुसंधान करने वालों को 3,02,136 और विदेश में रहने वाले चीनियों को 20,348 पेटेंट मिले।

विदेशों में पेटेंट हासिल करने के लिए 152 देशों के बीच पेटेंट सहयोग संधि (पीसीटी- ‘पेटेंट कोआॅपरेशन ट्रीटी’) लागू है, जिसकी वजह से एक ही मूल आवेदन के आधार पर विभिन्न देशों में पेटेंट हासिल करना सुगम हो जाता है। चीनियों ने पीसीटी के तहत 2017 में 48,882 आवेदन किए और भारतीयों ने कुल 1,603 आवेदन। पेटेंट वैज्ञानिक को या पेटेंटधारी कंपनी को विशिष्ट मालिकाना अधिकार देता है। उस आविष्कृत प्रक्रिया या उत्पाद को एक निश्चित अवधि तक किसी अन्य के इस्तेमाल करने पर पेटेंट रोक लगाता है।

मसलन अगर किसी भारतीय कंपनी के पास अपना प्रोडक्ट पेटेंट या प्रोसेस पेटेंट है तो कोई भी अन्य कंपनी न उस प्रोसेस को अपना सकती, न वह उस प्रोडक्ट का उत्पादन कर सकती है। एक तरह से यह आर्थिक स्वायत्तता और प्रतिस्पर्धा के लिए जरूरी होता है। भारत के वैज्ञानिक इस बात में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं कि उनका अनुसंधान जल्दी से जल्दी प्रकाशित हो जाए और उनका नाम हो जाए और नौकरी में तरक्की मिल जाए। लेकिन इसका दूरगामी नुकसान बहुत-से वैज्ञानिक समझते नहीं। अगर भारत के अनुसंधानकर्ता पेटेंट की जरूरत को समझें और अनुसंधान करने के समय से ही इस बात को ध्यान में रखें कि अनुसंधान को पहले वे पेटेंट कराएंगे और उसके बाद उसे प्रकाशित करेंगे तो उन्हें दूरगामी फायदा होगा।

वर्ष 2013 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘विज्ञान प्रौद्योगिकी और नवप्रवर्तन नीति, 2013’ जारी की थी तो इसका घोषित लक्ष्य था 2020 तक भारत को विश्व की पांच सबसे बड़ी वैज्ञानिक शक्तियों में एक बनाना। वर्तमान सरकार भी नव-प्रवर्तन के मामले में काफी जोर देती रही है। निजी क्षेत्र की कंपनियां अनुसंधान और विकास में अधिक शिरकत करें, इसके लिए कई वित्तीय व कर संबंधी रियायतें प्रदान की जाती रही हैं।

नतीजा यह कि देश में फिलवक्त अनुसंधान करने वाली संस्थाओं की संख्या पांच हजार से भी ऊपर है। इनमें कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और गैर-लाभकारी अनुसंधान संस्थाओं व कंपनियों की अपनी प्रयोगशालाएं भी शामिल हैं। इनमें दो लाख से ज्यादा वैज्ञानिक अनुसंधान में कार्यरत हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ‘टाइफेक’ संस्था के अंतर्गत ‘पेटेंट फैसिलिटेशन सेंटर’ कार्यरत है। विभिन्न राज्यों और अनुसंधान परिषदों में इसी तरह के ‘पेटेंट फैसिलिटेशन सेंटर’ हैं। इसके बावजूद भारत का पेटेंट कार्यालय जितने पेटेंट मंजूर करता है उनमें से केवल सत्रह प्रतिशत भारतीयों के नाम होते हैं। बाकी पेटेंट विदेशियों को मिलते हैं। आखिर क्यों? देश की आर्थिक स्वायत्तता की खातिर समस्त राजनीतिक दलों, विचारकों और शिक्षाविदों को इस पर ध्यान देना चाहिए।

 

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