जलवायु परिवर्तन और भारत की अनूठी शक्ति

स्रोत: द्वारा अरुणाभ घोष: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

जोसेफ नाय सॉफ्ट पावर को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि, 'दूसरों की प्राथमिकता को प्रभावित करने और आकार देने की क्षमता का नाम ही सॉफ्ट पावर है।' सॉफ्ट पावर में तमाम अन्य संसाधनों के अलावा मूल्य, नीतियां और संस्थान भी शामिल हैं। पिछले दशक के दौरान भारत ने जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में इन संसाधनों का इस्तेमाल किया। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता की अपनी भूमिका तलाशने के क्रम में भारत ने तीन ब्योरे प्रस्तुत किए। पहला, उदाहरण की शक्ति, दूसरा प्रतिरोध की शक्ति और तीसरा संस्थागत नेतृत्व की शक्ति।

उदाहरण की शक्ति

लंबे समय तक भारत ने विकसित देशों से यह मांग की कि वह जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर अधिक से अधिक कदम उठाएं। उसने यह दलील भी दी कि उसे अधिक जलवायु अनुकूल तरीके अपनाने के लिए तकनीक और वित्तीय मदद की आवश्यकता है। उसकी यह मांग जायज रही और वर्ष 2008 से उसने अपनी नीतियों और बाजार के आकार का इस्तेमाल घरेलू स्तर पर बदलाव लाने के लिए करना शुरू कर दिया। ऊर्जा का किफायती इस्तेमाल एक महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार की योजना ने ऊर्जा के किफायती लक्ष्य तय किए। ऊर्जा बचत प्रमाणपत्रों की मदद ली गई। अन्य योजनाओं की बात करें तो उपकरणों के लिए सुपर-इफिशिएंट इक्विपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया। वातानुकूलकों और प्रशीतकों के लिए वैकल्पिक तकनीक तैयार करने के लिए राष्ट्रीय प्रशीतन कार्य योजना तैयार की गई। बाजार से जुड़ी अग्रिम प्रतिबद्धताओं ने एलईडी बल्ब का एक बड़ा बाजार तैयार किया। तीन साल के भीतर इनकी कीमतें 80 फीसदी तक गिर गईं और करीब 30 लाख बल्ब वितरित किए गए। अब यही काम किफायती पंखों, एयरकंडीशनर और बिजली चालित वाहनों के मामले में हो रहा है।

एक अन्य उदाहरण जीवाश्म ईंधन सब्सिडी सुधार और बेहतर लक्षित सब्सिडी वाली ऊर्जा पहुंच से संबंधित है। नवंबर 2014 से पहल योजना के तहत गरीब परिवारों की एलपीजी सब्सिडी को बैंक खातों में सीधे भेजा जा रहा है। जनवरी 2016 तक इसने 90 फीसदी उपभोक्ताओं को दायरे में ले लिया और दुनिया की सबसे बड़ी नकद हस्तांतरण योजना बन गई। गिव इट अप अभियान के तहत पहले ही साल करीब एक करोड़ परिवारों ने अपनी एलपीजी सब्सिडी त्याग दी। उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी की पहुंच सन 2014 के 56 फीसदी परिवारों से बढ़कर जनवरी 2018 तक देश के 80 फीसदी परिवारों तक हो चुकी थी। तमाम चुनौतियों के बावजूद सब्सिडी सुधार की इस चरणबद्ध योजना ने भारत की छवि में सुधार ही किया है।

सबसे बड़ी तेजी नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में आई। सन 2010 में जब राष्ट्रीय सौर मिशन की शुरुआत हुई और 2022 तक 22,000 मेगावॉट क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तय किया गया तब हमारी स्थापित क्षमता केवल 17.8 मेगावॉट थी। सन 2015 में नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को संशोधित कर 175,000 मेगावॉट किया गया और मार्च 2018 तक हम 69,000 मेगावॉट का आंकड़ा छू चुके हैं। एक ओर जहां कई यूरोपीय देशों ने उपभोक्ता सब्सिडी के जरिये नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दिया, वहीं भारत ने सौर ऊर्जा के लिए प्रतिस्पर्धी बोली अपनाई। इस समय भारत में इसकी दर दुनिया की सबसे कम दरों में से एक है। बाजार के अनुकूल और राजकोषीय रूप से मजबूत नीतियों का प्रदर्शन करके भारत ने यह धारणा ही उलट दी कि नवीकरणीय ऊर्जा बहुत महंगी होती है या वह केवल विकसित देशों की पहुंच में है।

प्रतिरोध की क्षमता

देश के सॉफ्ट पावर होने की दूसरी बात जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में प्रतिरोध में निहित हैं। इसके तहत समता और जलवायु के क्षेत्र में न्याय पर जोर दिया गया। अन्याय के प्रतिरोध का अपना मूल्य है। भारत ने सन 1970 के दशक से ही वैश्विक पर्यावरण राजनीति में इन तरीकों को अपनाना शुरू कर दिया था। सन 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित जलवायु शिखर वार्ता के नाकाम होने के बाद विकसित और विकासशील देशों के दायित्व का अंतर तेजी से समाप्त हुआ। भारत को यह तय करना था कि वह बात मान लेता है या जलवायु परिवर्तन से निपटने की अपनी योजनाओं के साथ सामने आता है। सन 2015 में जब पेरिस जलवायु वार्ता पास आई तो भारत अपनी महत्त्वाकांक्षी कार्बन उपयोग कटौती योजना के साथ योगदान का इच्छुक था। परंतु उसकी प्रतिरोध की ताकत के चलते जलवायु संबंधी न्याय का प्रावधान पेरिस समझौते में वापस जुड़ सका।

सन 2016 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन के तहत हाइड्रो फोलोरोकॉर्बन का इस्तेमाल कम करने की शुरुआत हुई। भारत ने इसके लिए तय वर्ष को और आगे खींचने की कोशिश की। उसने इस बात पर जोर दिया कि उसके और चीन के बीच के उत्सर्जन के स्तर को अलग-अलग किया जाए। यहां तक कि सन 2050 में भारत का एचएफसी उत्सर्जन विश्व के कुल उत्सर्जन का 7 फीसदी रहेगा जबकि चीन का स्तर वैश्विक स्तर के 31 फीसदी के बराबर रहेगा। अंतिम समझौते के मुताबिक चीन इस पर 2024 में पूर्ण नियंत्रण कर देगा जबकि भारत 2028 में। यह भी भारत की इस इच्छाशक्ति को दर्शाता हैकि वह बिना अंतर पर समझौता किए बहुपक्षीय समाधान चाहता है।

पेरिस और किगाली में भारत ने तीन बातों को साधने की कोशिश की। पहला उसे समझौता करने वाला समझा जाए न कि समझौता भंग करने वाला। दूसरा वह वृद्धि के मोर्चे पर लचीलापन रखे और समता के सिद्धांत पर प्रतिरोध समाप्त न हो तथा तीसरा जवाबदेही के स्तर पर न्याय हो और अंतर का ध्यान रखा जाए। प्रतिरोध भारत की स्थिति के केंद्र में था, वह कोई बाधा नहीं था। अब इस रुख का परीक्षण होगा क्योंकि पेरिस वार्ता वर्ष 2018 में जारी रहेगी।

नेतृत्व की शक्ति

भारत की कूटनयिक शक्ति और राजनीतिक नेतृत्व का बढिय़ा प्रदर्शन तब देखने को मिला जब उसने फ्रांस के साथ अंतरराष्टरीय सौर गठजोड़ किया। 30 नवंबर, 2015 को घोषित इस गठजोड़ के बाद आईएसए स्थिर गति से आगे बढ़ा है। नवंबर 2016 में उसके फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को हस्ताक्षर के लिए खोला गया। नवंबर 2017 तक 15 देश इस पर सहमति दर्ज करा चुके हैं यानी 6 दिसंबर तक आईएसए दुनिया के नवीनतम संधि आधारित अंतरसरकारी संस्थान के रूप में जन्म ले चुका है। मार्च 2018 में जब नई दिल्ली में उसकी स्थापना से जुड़ा सम्मेलन हुआ तो 61 देशों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए और 32 देशों ने उसे स्वीकार किया। जलवायु परिवर्तन पर भारत के कदम उसकी सॉफ्ट पावर का अच्छा प्रदर्शन है। उसने अपनी घरेलू नीतियों, अन्य विकासशील देशों की समझ आदि में बदलाव के साथ नेतृत्व किया है। यह सॉफ्ट पावर का अहम उदाहरण है। परंतु सच यही है कि सॉफ्ट पावर अभी भी कठोर जमीनी कदमों पर निर्भर है।

 

Print Friendly, PDF & Email