डिजिटल लत और बढ़ता संकट

स्रोत: द्वारा शशांक द्विवेदी: जनसत्ता

सूचना तकनीक और इंटरनेट ने विकास में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन अब इसके भारी दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं, मसलन इंसान तकनीक का गुलाम बनता जा रहा है। बच्चों का बचपन इंटरनेट की गिरफ्त में आ चुका है। बाजार ने बच्चों के लिए भी इंटरनेट पर इतना कुछ दे दिया है कि वे पढ़ाई के अलावा और भी बहुत कुछ इंटरनेट पर कर रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली पुलिस और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की ‘बिहेवियर एडिक्शन यूनिट’ ने मिल कर एक सर्वे किया था।

इसमें यह चौंकाने वाला यह तथ्य सामने आया कि स्कूलों में पढ़ने वाले हर पांच में से एक छात्र प्रोब्लेमेटिक इंटरनेट यूजर यानी ‘पीआइयू’ का शिकार है। इंटरनेट गेमिंग, सर्फिंग या सोशल नेटवर्किंग साइटों के दीवाने बच्चों की इंटरनेट के प्रति ऐसी लत इनकी पढ़ाई और सामाजिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। सर्वे के मुताबिक सैंतीस फीसद छात्र अपने मिजाज और पढ़ाई के दबाव से ध्यान हटाने के लिए इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं। इस सर्वे में दिल्ली के पच्चीस नामी स्कूलों के कुल 6291 छात्रों ने हिस्सा लिया था। इनमें कक्षा छह से लेकर बारहवीं तक के छात्रों को शामिल किया गया था। सर्वे छात्रों के इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदत को लेकर था। पिछले दिनों फ्रांस की संसद ने एक कानून बना कर देश के प्राथमिक और जूनियर हायर सेकंडरी स्कूलों में बच्चों के मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी।

इसके बाद दुनियाभर में इस पर बहस शुरू हो गई। कई लोग स्कूल में मोबाइल के फायदे गिना रहे हैं, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्ट को आधार बना कर स्कूल में बच्चों के सेलफोन के इस्तेमाल पर पाबंदी का बिल खुद पेश किया और सांसदों से इसके लिए समर्थन मांगा था। फ्रांस जैसे विकसित देश के इस कदम से भारत में भी कुछ लोग ऐसी पाबंदी के कानून की बात कर रहे हैं, क्योंकि यहां स्कूलों में मोबाइल फोन के दुरुपयोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं। स्कूली बच्चों के यौन शोषण से तैयार अश्लील वीडियो क्लिप से इंटरनेट संसार भरा पड़ा है। असल में कम उम्र के बच्चे क्लास में फोन लेकर बोर्ड और पुस्तकों के स्थान पर मोबाइल पर ज्यादा ध्यान देते हैं। वे एक-दूसरे को संदेश भेज कर बातें करते हैं या फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। इससे उनके सीखने और याद रखने की गति तो प्रभावित हो ही रही है, स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है। अब वे खेल के मैदान में पसीना बहाने के बजाय आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं।

इससे उनमें मोटापा, आलस्य, आंखें कमजोर होना, याददाश्त कमजोर होने जैसे भी प्रभाव दिखने लगे हैं। पहले बच्चे गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग या तथ्य को अपनी स्मृति में रखते थे, लेकिन अब वे हर काम के लिए सर्च इंजन का उपयोग कर लेते हैं। इसलिए भारत में कम से कम आठवीं कक्षा तक मोबाइल प्रतिबंधित करने की बात उठती रही है। डिजिटल लत की वजह से लोग अपनी वास्तविक समस्याओं से कट रहे हैं, मौलिक चिंतन और मौलिक सोच कम हो रही है, साथ ही लोगों का सामाजिक दायरा भी कम हो रहा है। भारत में भी बंगलुरु, दिल्ली सहित कई शहरों में ऐसे केंद्र खोले जा रहे हैं। इन केंद्रों पर जिंदगी को ऑफलाइन बनाने पर काम किया जाता है। इंटरनेट की लत एक ऐसी मनोस्थिति है, जब लोग घंटों आनलाइन गेम, नेट सर्फिंग या सोशल साइटों पर समय बिताने लगते हैं और इंटरनेट नहीं मिलने पर बेचैन या अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं।

असल में युवा वर्ग सूचनाओं के बोझ से दबा जा रहा है और उसके खुद के सोचने और समझने की क्षमता लगातार कम होती जा रही है, साथ ही काम में मौलिकता अभाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। मशहूर लेखक निकोलस कार ने मानव मन-मस्तिष्क पर इंटरनेट के प्रभाव विषय पर अपनी चर्चित पुस्तक ह्यद शैलोजह्ण में कहा है, ‘इंटरनेट हमें सनकी बनाता है, तनावग्रस्त करता है, हमें उस ओर ले जाता है जहां हम इस पर ही निर्भर हो जाएं।’ भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। बेरोजगारी के इन भयावह आंकड़ों के बावजूद युवाओं में बड़े पैमाने पर बेचैनी नहीं दिखती तो इसकी एक वजह सोशल मीडिया और डिजिटल लत भी है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे शरीर के किसी हिस्से में दर्द होने पर दर्द का जड़ से इलाज करने के बजाय फौरी राहत के तौर पर दर्द की दवा या इंजेक्शन देकर मरीज को रहत दी जाए। लेकिन सच्चाई है कि यह राहत भी अस्थायी है और जैसे ही कुछ घंटों में दवा का असर कम होगा फिर से मूल समस्या उभर आएगी। आज युवाओं को एक सोची-समझी रणनीति के तहत बुनियादी चिंताओं और समस्याओं से दूर किया जा रहा है या कहें कि उन्हें वास्तविक समस्यायों का एहसास भी होने नहीं दिया जा रहा है।

डिजिटल लत की वजह से एक पीढ़ी के रूप में भी हम अपने जीवन पर से नियंत्रण खो रहे हैं। भारत में बेहद सस्ती दरों पर उपलब्ध डाटा की वजह से कम आय वर्ग वाले लोगों के पास भी स्मार्टफोन उपलब्ध है, जिसका सदुपयोग होने के बजाय दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। एक सर्वे के अनुसार करीब बानवे प्रतिशत गरीब किशोर इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं और पैंसठ फीसद के पास स्मार्टफोन है। वहीं, अच्छी कमाई वाले घरों के सनतानवे प्रतिशत बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनहत्तर फीसद के पास स्मार्टफोन है। कई बार ऐसी लत के शिकार लोगों को पता भी नहीं चलता कि वे कब और कैसे इसकी गिरफ्त में आ गए।

बिना मोबाइल या फोन के एक पूरा दिन बिताने की कल्पना अब बहुत मुश्किल लगती है, कुछ के लिए तो शायद असंभव! लेकिन हाल में ही पोलैंडवासियों ने ‘डे विदआउट सेलफोन’ अभियान के तहत पूरा दिन बिना मोबाइल के बिताया। वहां लोगों को वास्तविक दुनिया से परिचित कराने और फोन पर संदेशों के आदान-प्रदान की जगह आमने-सामने बैठ कर रिश्तेदारों व दोस्तों से बात करने का मौका देने के लिए यह अभियान चलाया गया। इसमें पोलैंडवासी खूब रुचि दिखा रहे हैं। असल में पोलैंड के ज्यादातर नौजवान कक्षाओं के साथ-साथ खाना खाते और सिनेमा देखते वक्त भी फोन का इस्तेमाल करते हैं। इस वजह से देश में फोनोलिज्म यानी फोन की लत की बीमारी में इजाफा हुआ है, ऐसे में इस तरह के अभियान की पहल की गई।

आज सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि युवाओं के अलावा कम उम्र के बच्चे भी अब डिजिटल लत के शिकार हो रहें हैं। वैसे तो साइबर लत की समस्या पूरी दुनिया में फैली हुई है, लेकिन दुनिया में युवाओं की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह समस्या ज्यादा गंभीर है। अब समय आ गया है जब इसका समाधान तलाशा जाए नहीं तो यही मानव संसाधन सबसे ज्यादा दिग्भ्रमित होगा। कुल मिला कर साइबर लत से छुटकारा पाने के लिए सरकार के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर पहल करनी होगी और यह प्रण लेना होगा कि छोटे बच्चों को घर और स्कूल में मोबाइल फोन से दूर रखा जाए। भारत में भी ‘डे विदआउट सेलफोन’ जैसे अभियान चलाने की जरूरत है।

 

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