टिकाऊ आर्थिक वृद्धि के लिए बड़ा मोलभाव

स्रोत: द्वारा अरुणाभ घोष: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

भारत ऐतिहासिक रूप से अपनी आर्थिक प्रगति के साथ समानता का संतुलन साधने की कोशिश करता रहा है। राजनीतिक दल आगामी आम चुनावों की तैयारी में लग चुके हैं। ऐसे में अपने संभावित प्रतिनिधियों से हमारा सवाल है: आर्थिक वृद्धि तेज करने, रोजगार सृजन और अवसर बढ़ाने के साथ क्या हम इसे सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय रूप से सतत और वर्तमान एवं भावी पीढिय़ों के लिए न्यायसंगत भी बना सकते हैं?

हमारे अंतर्विरोधों के मूल में यही प्रश्न है। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही बड़ी अर्थव्यवस्था भारत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी चौथे स्थान पर है, तीव्र शहरीकरण के साथ वायु गुणवत्ता बेहद खराब हुई है और जल संकट भी बढ़ा है। विनिर्माण की आकांक्षा भी ध्वस्त हो रही है क्योंकि हम तमाम तकनीकी मोर्चों पर पिछड़ रहे हैं और स्वच्छ ऊर्जा में निवेश की व्यापक संभावनाएं जोखिम की अनवरत धारणा की चपेट में हैं।

टिकाऊ विकास का मुद्दा हमारे राजनीतिक एजेंडे, नीतिगत प्रतिक्रिया, औद्योगिक गतिविधियों, उपभोक्ताओं की पसंद या नागरिकों की मांग में अनवरत शामिल नहीं रहा है। ऐसे में एक नए तरह का जबरदस्त मोलभाव करना जरूरी है: वृद्धि के नए वाहक के तौर पर संपोषणीयता पर दांव लगाइए और उसके बदले में संसाधनों एवं बाह्य जगत की कीमत तय करने एवं उन पर रियायत देने में समानता को सुनिश्चित कीजिए। 

संसाधन सक्षमता में मौके का फायदा उठाने के लिए भविष्य के उद्योगों, आकांक्षा स्तर बढ़ाने और स्वच्छ ऊर्जा के बारे में पुनर्विचार की जरूरत है। भारत अपने सभी नागरिकों तक ऊर्जा पहुंचाने और स्वच्छ ऊर्जा को लेकर महत्त्वाकांक्षी रहा है। नवीकरणीय बिजली की उत्पादन क्षमता 72,000 मेगावाट से अधिक है और अकेले सौर बिजली की क्षमता 24,000 मेगावाट से अधिक हो चुकी है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट ऐंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की तरफ से किए गए एक सर्वे के मुताबिक वर्ष 2015 से अब तक 11.8 करोड़ लोगों तक बिजली पहुंचाई जा चुकी है और 16 करोड़ लोगों को रसोई गैस कनेक्शन भी मिले हैं। 

फिर भी ऐसी आकांक्षा का दायरा सीमित है। अगर अगले दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में 2.5-2.8 लाख करोड़ डॉलर की वृद्धि हो जाती है तो इस बढ़ोतरी का एक-तिहाई हिस्सा इस पर निर्भर करेगा कि भारत अपना कार्बन उपभोग कितना कम करता है और संसाधन- सक्षम वृद्धि को किस हद तक अपनाता है?  सीईईडब्ल्यू के इस अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 2050 तक भारत के कार्बन डाई-ऑक्साइड उत्सर्जन में बिजली एवं उद्योग जगत की हिस्सेदारी क्रमश: 40 और 32 फीसदी तक पहुंच जाएगी। बिजली क्षेत्र में नवीकरणीय संसाधनों का हिस्सा बढऩे से औद्योगिक उत्सर्जन अहम बना रहेगा। वैश्विक तापन को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का एक रास्ता औद्योगिक ईंधन मिश्रण में बिजली की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 55 फीसदी पहुंचाना भी है। फिलहाल इसकी हिस्सेदारी 20 फीसदी से भी कम है।

लेकिन ऊर्जा की अधिक जरूरत वाले विनिर्माण क्षेत्र के लिए हम इतनी बिजली कहां से लाएंगे? सीईईडब्ल्यू और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) यह परीक्षण कर रहे हैं कि नवीकरणीय ऊर्जा से मिला हाइड्रोजन क्या स्टील उत्पादन के लिए एक विकल्प हो सकता है? प्रारंभिक विश्लेषण से पता चलता है कि इसका परिचालन व्यय मौजूदा तकनीकों के समान ही है लेकिन प्रति टन स्टील उत्पादन पर पूंजी व्यय परंपरागत प्रक्रिया की तुलना में तिगुना अधिक है। संसाधनों का कम इस्तेमाल करते हुए औद्योगिक विकास करना मूल्य वृद्धि एवं नए बाजार बनाने के नए तरीके अपनाने में केंद्रीय भूमिका में होगा।

हमें तकनीकों, संस्थानों और लोगों पर बड़े दांव लगाने की जरूरत है। सीमित संसाधनों के मद्देनजर यह समझने लायक है कि उन्नत लेकिन बिना जांची-परखी तकनीकों में संरक्षणवाद अंतर्निहित हो सकता है। मसलन, स्टील, मेथेनॉल या अमोनिया के लिए 'हरित हाइड्रोजन' को अपनाने के लिए स्पष्ट नीतिगत निर्देशों की जरूरत होगी। लेकिन हमें निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक धन के भी मिश्रण के नए तरीके खोजने होंगे।

इस बड़े मोलभाव का दूसरा पक्ष दुनियावी चीजों पर कर लगाएगा लेकिन साम्यता संबंधी आग्रहों से सहमत नहीं होगा। जहां अतिविषम घटनाओं से पर्यावरणीय अधोगति, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव या ढांचागत नुकसान होता है, वहीं आर्थिक गतिविधियों की सामाजिक लागत काफी बड़ी होती है। प्रदूषण फैलाने वालों को कीमत चुकानी चाहिए और निम्न पर्यावरणीय फुटप्रिंट वाले उत्पाद एवं सेवाएं लेने वाले उपभोक्ताओं को अधिक कीमत देनी चाहिए। वर्ष 2017 तक स्वच्छ पर्यावरण उपकर के रूप में 400 रुपये प्रति टन कोयले के हिसाब से राशि राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा एवं पर्यावरण कोष में जमा होती थी। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद इसकी जगह जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर ने ले ली है जिससे राज्यों को कर राजस्व में हुई क्षति की भरपाई होती है। क्या इन संसाधनों का गलत आवंटन होगा या वे टिकाऊ एवं न्यायसंगत वृद्धि को बल दे पाएंगे?

सीईईडब्ल्यू और अंतरराष्ट्रीय सतत विकास संस्थान का नवीनतम शोध बताता है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा के लिए सब्सिडी 2014 से छह गुना बढ़ी है लेकिन तेल, गैस एवं कोयला आधारित ऊर्जा को 2016-17 में नवीकरणीय ऊर्जा एवं इलेक्ट्रिक वाहनों की तुलना में तिगुनी सब्सिडी मिली। समानता से हासिल होने वाले नतीजे लक्षित कर एवं सब्सिडी को बेहतर कर सकते हैं। 'गिवइट अप' अभियान के तहत 1 करोड़ परिवारों ने एलपीजी सिलिंडर पर मिलने वाली सब्सिडी अपनी इच्छा से छोड़ी लेकिन यह संख्या चालू गैस कनेक्शनों के 5 फीसदी से भी कम है। आय-संबंधी शर्तों के चलते एलपीजी सब्सिडी से बाहर किए गए लोग सक्रिय कनेक्शनों के महज एक फीसदी हैं। संपन्न परिवार बिजली पर मिलने वाली सब्सिडी का भी लाभ अब तक उठा रहे हैं।

केरोसिन सब्सिडी में किए गए सुधार दिखाते हैं कि समानता एवं स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच बहाल करने से पूरक उद्देश्य पूरा होते हैं। ऊर्जा पहुंच को मिले प्रोत्साहन ने केरोसिन पर होने वाली अंडर-रिकवरी को वर्ष 2013-14 के बाद से 75 फीसदी तक कम कर दिया है। वैसे केरोसिन रोशनी के लिए अब भी 20 फीसदी ग्रामीण परिवारों का स्रोत बना हुआ है। सीईईडब्ल्यू सर्वे के दौरान 84 फीसदी परिवारों ने बताया कि वे केरोसिन पर कम सब्सिडी के बदले में सौर लालटेन पर सब्सिडी लेना अधिक पसंद करेंगे। यह तथ्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की तरफ उनके झुकाव को इंगित करता है।

फ्रांस में ईंधन कर को लेकर फैले हालिया दंगे बताते हैं कि ऊर्जा एवं आर्थिक बदलाव कम विकल्पों वाले वंचितों पर अधिक भार नहीं डाल सकते हैं। नागरिकों को भी यह समझने की जरूरत है कि कार्बन टैक्स या ईंधन उपकर का इस्तेमाल किसलिए होता है और उनसे किन लाभों की अपेक्षा की जा सकती है? टिकाऊ नीतियों में समानता को समाहित करने की जरूरत है। क्या हमारी राजनीति इतना बड़ा मोलभाव कर पाएगी?

 

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