नस्लवाद और गांधी का नजरिया

स्रोत: द्वारा रामचंद्र गुहा: हिंदुस्तान

क्या मोहनदास करमचंद गांधी नस्लवादी थे? यह सवाल घाना में गांधी की प्रतिमा हटाने के कारण एक बार फिर से सुर्खियों में है। जिस याचिका के बाद मूर्ति हटाई गई, उसमें गांधी के कई बयानों का जिक्र किया गया था। हालांकि गांधी के ये बयान खासतौर से दक्षिण अफ्रीका में उनके शुरुआती दिनों के हैं। एक वयस्क परिपक्व गांधी अफ्रीका और अफ्रीकियों के संदर्भ में, नस्ल और नस्लवाद के बारे में क्या राय रखते थे या क्या कहते थे, इसे पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया गया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनी शुरुआती युवावस्था में गांधी नस्लवादी थे। वह सभ्यताओं के पदानुक्रम में विश्वास रखते थे। उनकी नजर में यूरोपीय श्रेष्ठ थे, और उसके बाद भारतीय। इस क्रम में अफ्रीकी निश्चित तौर पर सबसे नीचे थे। उन्होंने अफ्रीका के मूल निवासियों के बारे में कृपा-भाव और अपमानजनक भाषा में भी बात की है। मगर जीवन के 35वें वर्ष तक आते-आते उनका यह रुख बदलने लगा था कि अफ्रीकी भारतीयों से कमतर होते हैं। इसकी झलक मई 1908 में जोहानिसबर्ग वाईएमसीए में गांधी के एक आकर्षक (और उपेक्षित) भाषण में मिलती है। वह जिस विषय पर उस परिचर्चा में बोल रहे थे, वह था- क्या एशियाई और अश्वेत नस्लें साम्राज्य के लिए खतरा हैं

हो सकता है कि उस कार्यक्रम में गांधी एकमात्र अश्वेत न हों, लेकिन वह उसमें अकेले अश्वेत वक्ता जरूर थे। विषय के विरोध में बोलते हुए उन्होंने बताया कि अफ्रीकी और एशियाई कामगारों ने किस तरह से साम्राज्य के विस्तार में मदद की है। उन्होंने पूछा था कि ‘हिन्दुस्तान के बिना ब्रिटिश साम्राज्य के बारे में भला कोई सोच सकता है? इसी तरह, अफ्रीकियों के बिना दक्षिण अफ्रीका भी भयानक उजाड़ दिखेगा।’ उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘श्वेतों का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वे इन नस्लों को अपने साथ समान रूप से आगे बढ़ाएं, उन्हें आजाद संस्थान मुहैया कराएं और उन्हें स्वतंत्र इंसान बनाएं’। यानी 1908 तक गांधी की साफ सोच थी कि अफ्रीकी और भारतीयों को यूरोपीय लोगों के साथ समान आधार पर रखा जाना चाहिए।

अगले वर्ष जर्मिस्टन में एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा भी कि यदि नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अफ्रीकी अहिंसक प्रतिरोध करते हैं, तो ‘मूल बाशिंदे से जुड़ा कोई भी सवाल शायद ही अनसुलझा रह पाएगा’। जाहिर है, जैसे-जैसे अफ्रीका में गांधी के दिन बीत रहे थे, वह नस्लवाद से दूर हो रहे थे। 1910 में उन्होंने एक टिप्पणी की, ‘सिर्फ नीग्रो यहां के मूल निवासी हैं... गोरों ने इस जमीन पर जबरन कब्जा जमाया है और अपने हित में उन्होंने इनका इस्तेमाल किया है’। तब तक, गांधी के अखबार इंडियन ओपिनियन में अफ्रीकियों के खिलाफ गोरी हुकूमत के भेदभाव की खबरें छपनी भी शुरू हो गई थीं।

ऐसी ही एक रिपोर्ट में प्रिटोरिया के एक हाईस्कूल की वार्षिक परीक्षा का जिक्र है। दरअसल, पहले अफ्रीकी छात्रों को अपने गोरे साथियों के साथ बैठकर परीक्षा देने की अनुमति थी। मगर उस साल टाउन हॉल में, जहां परीक्षाएं आयोजित की गई थीं, उन्हें जाने से रोक दिया गया। इसे लेकर एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि किसी भी अफ्रीकी या अश्वेत को बिल्डिंग में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी। अपने अहिंसक प्रतिरोध के लिए गांधी को यह उचित वक्त लगा। उन्होंने लिखा, ‘इस तरह के देशों में अश्वेतों को बेहद मुश्किल परिस्थितियों में रखा जाता है। हमें लगता है कि सत्याग्रह के अलावा इसका कोई समाधान नहीं है।’

सन् 1914 में गांधी भारत जरूर लौट आए। मगर नस्ल को लेकर उनकी सोच प्रगतिशील दिशा में विकसित होती रही। 1920 के दशक में प्रकाशित अपनी किताब सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका  में गांधी ने अफ्रीकी मजहब की रक्षा की बात कही है। यूरोपीय मिशनरियों के दावे के संदर्भ में गांधी ने लिखा है कि अफ्रीकियों को ‘सच और झूठ का अंतर बखूबी पता है’। दरअसल, गांधी यह मानते थे कि भारतीय और यूरोपीय लोगों की तुलना में अफ्रीकियों ने कहीं ज्यादा सत्य को अपने जीवन में उतारा है।

अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के नेताओं और अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के संपर्क में गांधी लगातार रहे। 1936 में हॉवर्ड थुअमन (जो भविष्य में मार्टिन लूथर किंग के मेंटोर बने) गांधी से मिलने सेवाग्राम आए। थुअमन ने लिखा है कि महात्मा गांधी ने कैसे उनसे तमाम बातें पूछीं- उन्होंने ‘अफ्रीकी नीग्रो के बारे में लगातार व व्यावहारिक सवाल किए, दासता के बारे में पूछा और यह भी जानना चाहा कि आखिर कैसे हम गुजारा करते हैं’? गांधी हैरान थे कि दमन से बचने के लिए शोषितों ने इस्लाम नहीं अपनाया था। थुअमन गांधी की जिज्ञासा से काफी ज्यादा प्रभावित हुए। उन्होंने लिखा है, गांधी ‘मताधिकार, गैर-कानूनी ढंग से जान लेने, भेदभाव, सरकारी स्कूलों की शिक्षा, चर्च और उनके कामकाज जैसे तमाम मसलों को जानना चाहते थे।’

इसके दस साल बाद, दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों के एक प्रतिनिधिमंडल ने गांधी से मुलाकात की। उन्होंने उन लोगों से विभाजनकारी राजनीतिक सोच को दरकिनार करने को कहा। गांधी के शब्द थे कि उन्हें ‘जूलुओं और बैंतुओं (दोनो अफ्रीका की जनजातियां हैं) के साथ भी उठना-बैठना’ चाहिए।’ गांधी ने कहा, ‘यह वक्त ‘एशियाइयों के लिए एशिया’ या ‘अफ्रीकियों के लिए अफ्रीका’ जैसे नारों का नहीं, बल्कि पृथ्वी की तमाम शोषित नस्लों के एक होने का है’। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट पढ़ते हुए अपने अखबार के लिए व्हाइट मैन्स बर्डन नामक लेख भी लिखा। इसमें उन्होंने लिखा है, ‘गोरों का असली काम संरक्षा का स्वांग रचकर अश्वेतों पर शासन करना नहीं है... यह समय गोरों का हर इंसान को अपने बराबर समझने का है’।

हालांकि घाना में जो याचिका दायर की गई, उसमें गांधी के 1906 तक के बयानों का ही जिक्र किया गया। गांधी के बाकी के चार दशकों का जीवनकाल एकदम छोड़ दिया गया है। क्या ऐसा अनजाने में हुआ या फिर इसके पीछे कोई दुराग्रह है? इसका जवाब तो कोई नहीं जानता, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य इस विषय पर बिल्कुल स्पष्ट हैं। इसीलिए मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे अफ्रीकी मूल के महानतम नेताओं ने भी महात्मा गांधी को नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अपने संघर्ष में एक आदर्श के रूप में देखा।

 

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