पाक-चीन को चाबहार का झटका

स्रोत: द्वारा राहुल लाल: जनसत्ता

सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण ईरान के दक्षिण-पूर्व तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह के संचालन की जिम्मेदारी भारत ने संभाल ली है। चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत, ईरान और अफगानिस्तान व्यापार व पारगमन गलियारों के मार्गों पर राजी हो गए हैं। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के कारण चाबहार बंदरगाह भारत के लिए बेहद अहम है। इसे सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन के लिए भारत का करारा जवाब माना जा रहा है। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद पूरे मध्य-पूर्व, मध्य एशिया और यूरोप से भौगोलिक तौर पर अलग हुए भारत ने इस दूरी को पाटने की दिशा में अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। भारत, ईरान और अफगानिस्तान तीनों देशों की चाबहार समझौते के क्रियान्वयन संबंधी समिति की पिछले दिनों चाबहार में पहली बैठक हुई थी। इसी दौरान ईरान ने संचालन की कमान भारत को सौंप दी।

इस बंदरगाह के विकास के लिए हालांकि 2003 में ही समझौता हो गया था। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सामरिक और कारोबारी दोनों ही लिहाज से महत्त्वपूर्ण है। इसके बनने के बाद समुद्री रास्ते से होते हुए भारत ईरान में दाखिल हो जाएगा और इसके जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक के बाजार भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के खुल जाएंगे। भारत की पहुंच यूरोपीय देशों के बाजार तक बनने का रास्ता साफ हो जाएगा। इस तरह भारत अब बिना पाकिस्तान गए ही अफगानिस्तान और उससे आगे रूस और यूरोप से जुड़ जाएगा।

कांडला और चाबहार बंदरगाह के बीच की दूरी दिल्ली-मुंबई के बीच की दूरी से भी कम है। इसलिए इस समझौते से भारत को पहले वस्तुएं ईरान तक तेजी से पहुंचाने और फिर नए रेल व सड़क मार्ग के जरिए अफगानिस्तान ले जाने में मदद मिलेगी। ईरान के दक्षिणी तट पर सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक तौर पर उपयोगी है। यह फारस की खाड़ी के बाहर है और भारत के पश्चिमी तट से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

भारत के ईरान से अच्छे व्यापारिक रिश्ते रहे हैं। चीन के बाद भारत ईरान के तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार है। चाबहार बंदरगाह से ईरान के मौजूदा सड़क नेटवर्क को अफगानिस्तान में जरांज तक जोड़ा जा सकता है, जो बंदरगाह से 883 किलोमीटर दूर है। भारत पहले ही ईरान-अफगानिस्तान सीमा पर जरांज से डेलाराम की 218 किलोमीटर लंबी सड़क को आतंकी साए में बना चुका है। साथ ही, चाबहार से जाहेदान तक रेल मार्ग बिछाने के लिए भारत को जापान ने आर्थिक मदद का भरोसा दिया है। भारत द्वारा निर्मित जरांज-डेलाराम रोड के जरिए अफगानिस्तान के गारलैंड हाईवे तक आवागमन आसान हो जाएगा। इस हाईवे से अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों- हेरात, कंधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ तक सड़क के जरिए पहुंचना आसान होता है।

पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह के जरिए चीन ने भारत को घेरने की कोशिश की थी। चीन को लगता था कि वह ग्वादर के जरिए यूरोप के देशों तक भारत की पहुंच को रोकने में कामयाब रहेगा, लेकिन ईरान में चाबहार के जरिए भारत ने भी चीन की मंशा को नाकाम कर दिया। भारत की भू-राजनीतिक स्थिति बहुत विशिष्ट है। भारत एशियाई वृत्त चाप के केंद्र में स्थित है, जहां से समूचे एशिया की राजनीति को संचालित और प्रभावित किया जा सकता है। यही कारण है कि ट्रंप ने एशिया यात्रा के दौरान ‘एशिया प्रशांत’ के स्थान पर ‘इंडिया-प्रशांत क्षेत्र’ शब्द का प्रयोग किया।

अमेरिका के साथ मिल कर हिंद महासागर में तो भारत सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में है, पर भूमिबद्ध मध्य एशिया और पूर्व एशिया से भारत का संपर्क चीन और पाकिस्तान की घेराबंदी के कारण प्राय: अवरुद्ध ही रहा। मध्य एशिया, जहां खनिज और ऊर्जा के प्रचुर भंडार हैं, में रूस और चीन की उपस्थिति प्रमुखता से रही, लेकिन भारत की मौजूदगी नगण्य रही। भारत की ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति’ इसी स्थिति से उबरने की नीति है। ग्वादर बंदरगाह चीन को मध्य-पूर्व एशिया में प्रवेश की सुविधा देता है।

ग्वादर बंदरगाह पर बढ़ती हलचलें भारत के लिए शुभ नहीं हैं, क्योंकि चीन यहां अपना सागरीय सामरिक संचालन केंद्र भी विकसित कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए चाबहार बंदरगाह के महत्त्व को समझा जा सकता है। चाबहार बंदरगाह ग्वादर बंदरगाह से महज 72 किलोमीटर की दूरी पर है, उसकी सामरिक भू-राजनीतिक स्थिति ग्वादर से बेहतर है। मध्य एशिया से भौतिक रुप से सक्रिय जुड़ाव की भारत की इच्छा को तब बल मिला जब क्षेत्र के दो प्रमुख देश तुर्कमेनिस्तान और कजाखस्तान ने हाल ही में एक रेलमार्ग का उद्घाटन किया जो ईरान से जोड़ता है।

चाबहार बंदरगाह से भारत के मध्य एशिया संपर्क का अवरोध तो टूटेगा ही, हिंद महासागर में भारत को घेरने की चीन की नीति और उसके एकतरफा ‘वन बेल्ट वन रोड’ को थोपने के प्रयासों को झटका भी लगेगा। भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक सांस्कृतिक संबंधों की नई शृंखला शुरू होगी। इससे इस क्षेत्र में पाकिस्तान और चीन का दबदबा थमेगा। इसमें यदि मध्य एशिया के देशों को जोड़ लें तो फिर यह प्रस्तावना और भी लुभावनी हो जाती है।

चाबहार केवल ग्वादर से भू-राजनीतिक सामरिक दृष्टि से ही बल्कि कई मामलों में श्रेष्ठ है। ग्वादर बंदरगाह से निर्गत व्यापारिक मार्ग एक अशांत क्षेत्र से शुरू होते हुए एक अशांत क्षेत्र में ही प्रवेश करता है। ग्वादर बंदरगाह मकरान तट पर स्थित है जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत का हिस्सा है और अशांत भी है। चीन की योजना के अनुसार ग्वादर बंदरगाह से निर्मित व्यापारिक मार्ग चीन के काशगर तक जाता है। यह इलाका भी आतंकी गतिविधियों से त्रस्त है। ऐसे में व्यापार लाभ और संपर्क-संचार की मंशा इतनी आसानी से पूरी होने वाली नहीं है। परंतु भूमि एवं समुद्र, दोनों पर स्थित चाबहार बंदरगाह, ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले न केवल अधिक सुरक्षित है, बल्कि चाबहार बंदरगाह अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के सुप्रसिद्ध मियामी की उसी अक्षांश पर स्थित होने के कारण आदर्श पर्यावरणीय और व्यापारिक परिवेश निर्मित करता है, जो भारत के लिए लाभप्रद हैं।

अमेरिका और ईरान के उतार-चढ़ाव भरे संबंध ईरान के चाबहार बंदरगाह की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगा देते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु समझौता खत्म कर दिया था। इसका असर भारत पर पड़ना स्वाभाविक था। अब ईरान के साथ कारोबार करने वाली कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां प्रतिबंध के दायरे में आ गई हैं। लेकिन भारत के विशेष आग्रह पर अमेरिका ने चाबहार बंदरगाह को ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों से मुक्त कर रखा है। यह भी भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है।

चाबहार के अस्तित्व में आने के बाद पाकिस्तान की शिकायती प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि इससे पाकिस्तान को काफी झटका लगा है। गौरतलब है कि चाबहार बंदरगाह के रास्ते भारत से अफगानिस्तान को 11 लाख टन गेहूं की पहली खेप अक्टूबर, 2017 में भेजी गई थी। चाबहार से गेहूं की पहली खेप अफगानिस्तान पहुंचने का असर पाकिस्तान पर यह पड़ा कि अफगानिस्तान ने इसके बाद पाकिस्तान से गेहूं खरीदना काफी कम कर दिया। इससे पेशावर की आटा मिलें बंद होने का सिलसिला शुरू हो गया। अफगानिस्तान भारतीय गेहूं को तजाकिस्तान की मिलों में पिसवा रहा है। हाल ही में भारत और ईरान ने फरजाद बी गैस फील्ड पर वार्ता तेज करते हुए दीर्घावधि रणनीतिक साझेदारी विकसित करने पर भी सहमति जताई है। भारत के लिए चाबहार के दरवाजे खुलना चीन और पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका है।

 

Print Friendly, PDF & Email